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Nov 14, 2019

भूरी भूरी आँखों वाला-अर्जुन १९८५

हिंदी गीतों में ज़रूरी नहीं जो गीत में कहा जा रहा है
वो सच हो और ऑथेंटिक हो. मान लीजिए गीतकार ने
लिखा-भूरी भूरी आँखों वाली एक लड़की है. निर्देशक ने
कहा-गीत तो लड़की को गाना है तो गीतकार लिख देता
है-भूरी भूरी आँखों वाला एक लड़का है. इतना एडजस्टमेंट
तो बरसों से बॉलीवुड में चला आ रहा है.

नायक नायिका में से किसकी आँखें भूरी है ये तो आप
समझिये, हम तो आपको गाना सुनवाए देते हैं. फिल्म
अर्जुन के लिए इसे लता मंगेशकर ने जावेद अख्तर के
बोलों पर गाया है जिसकी तर्ज़ तैयार की है पंचम ने.
खैर गीत की उल्लेखनीय बात है इसकी मेंडोलिन जो
गाने के अंत में स्टीरियो के दो चैनलों में अलग अलग
बीट में बज कर कानों में गुदगुदी पैदा करती है.




गीत के बोल:


सा गा प रे ला ला ला रे गा सा
हो ओ ओ ओ ओ ओ
भूरी भूरी आँखों वाला एक लड़का हैं
सपने देखने से जाने क्यों घबराता हैं
भूरी भूरी आँखों वाला एक लड़का हैं
सपने देखने से जाने क्यों घबराता हैं
गुमसुम गुमसुम खोया खोया सा रहता हैं
सपने देखने से जाने क्यों घबराता हैं
हो भूरी भूरी आँखों वाला एक लड़का हैं
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

मेरी आँखों में है कितने सारे सपने
रंग बिरंगे मीठे मीठे प्यारे सपने
हो मेरी आँखों में हैं कितने सारे सपने
रंग बिरंगे मीठे मीठे प्यारे सपने
दीवाने तू भी आँखों में सपने रख ले
बन के चमकेंगे राते में सारे सपने

हो भूरी भूरी आँखों वाला एक लड़का हैं
सपने देखने से जाने क्यों घबराता हैं

तू माने न माने ऐसा दिन आयेगा
जब दुनिया के चहरे से ग़म धुल जायेगा
फूल खिलेंगे रंग हसेंगे आँचल आँचल
आँगन आँगन गूंजेगी खुशियो की पायल

हो भूरी भूरी आँखों वाला एक लड़का हैं
सपने देखने से जाने क्यों घबराता हैं
गुमसुम गुमसुम खोया खोया सा रहता हैं
सपने देखने से जाने क्यों घबराता हैं
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
………………………………………………
Bhoori bhoori aankhon wala ek ladka-Arjun 1985

Artists: Dimple Kapadia, Sunny Deol

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Jun 5, 2018

मामैया केरो केरो-अर्जुन १९८५

अर्जुन श्रीकृष्ण संवाद से एक और फिल्म याद आई जो सन
१९८५ की ही फिल्म है नाम है अर्जुन. सनी देवल नायक हैं
इस फिल्म के और उनके साथ साइड किक के रूप में तीन
अन्य कलाकार भी हैं. राजनीति के दुश्चक्रों पर आधारित है
ये फिल्म और इसमें बतलाया गया है किस तरह से युवा
पीढ़ी की ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में बर्बाद की जाती है और
ज़रूरत खत्म होने के बाद उन्हें अम् की गुठली की तरह चूस
के फ़ेंक दिया जाता है.

नायक इन सब स्थितियों से संघर्ष करता है और अर्जुन की
आँख की तरह अपने उद्देश्य और लक्ष्य पर कायम रहता है और
फ़िल्मी फार्मूलों के हिसाब से अंत में विजय उसकी ही होती है.

जावेद अख्तर के बोल हैं और आर डी बर्मन का संगीत. इसे
शैलेन्द्र सिंह और साथियों ने गाया है. अब ये इजिप्ट की राजधानी
वाले मामा है या केरोसीन वाले या आप पता लगाइये.




गीत के बोल:

हे मामैया केरो केरो
केरो मामा केरो मामा
मामैया केरो केरो
केरो मामा केरो मामा
दुनिया माने बुरा तो गोली मारो
गोली मारो
डर के जीना हैं कोई जीना यारो
गोली मारो
दुनिया माने बुरा तो गोली मारो
हो डर के जीना हैं कोई जीना यारो
गोली मारो
यारों पे सदा जान करो फिदा
दुश्मन को ये बता दो दुश्मनी हैं क्या
दुनिया माने बुरा तो गोली मारो
गोली मारो
डर के जीना हैं कोई जीना यारो
गोली मारो
यारों पे सदा जान करो फ़िदा
दुश्मन को ये बता दो दुश्मनी हैं क्या
मामैया केरो केरो
केरो मामा केरो मामा
मामैया केरो केरो
केरो मामा केरो मामा

जब चल पड़े हम तो रुकते नहीं
आंधी के आगे भी झुकते नहीं
जब चल पड़े हम तो रुकते नहीं
आंधी के आगे भी झुकते नहीं
सर झुकाए जो हांर जाये जो
वो आदमी भी कोई आदमी हैं क्या
दुनिया माने बुरा तो गोली मारो
गोली मारो
डर के जीना हैं कोई जीना यारो
गोली मारो
यारों पे सदा जान करो फ़िदा
दुश्मन को ये बता दो दुश्मनी हैं क्या

घर ने जो दिल से निकाला हुए
इन रास्तो ने हैँ पाला हमे
घर ने जो दिल से निकाला हुए
इन रास्तो ने हैँ पाला हमे
मुस्कुरा के हम झेलते हैं ग़म
रोके जिसे वो कोई ज़िन्दगी है क्या
दुनिया माने बुरा तो गोली मारो
गोली मारो
डर के जीना हैं कोई जीना यारो
गोली मारो
यारों पे सदा जा करो फ़िदा
मामैया केरो केरो
केरो मामा केरो मामा
मामैया केरो केरो
केरो मामा केरो मामा
………………………………………………………
Mamaiya kero kero-Arjun 1985

Artists: Sunny Deol, Raja Bundela

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Jun 22, 2015

बड़े अरमानों से रखा है बलम-मल्हार १९५१

क्या समय था साहब, लाजवाब था, गीत बनाने में बहुत
मेहनत की जाती, जो नतीजा निकलता वो शानदार होता.
हिंदी फिल्मों का सुनहरा दौर यूँ ही नहीं कहा जाता उस
समय को.

अक्सर आपको किसी गीत की एक पंक्ति ही याद रह जाती.
ऐसा ही कुछ वाकया सन १९५१ की फिल्म मल्हार के एक
गीत के साथ है. इसके अंतरे में एक पंक्ति है-मेरी नैया को
किनारे का इंतज़ार नहीं. अब ये याद रह गयी इत्तेफाक है,
मगर कई बार जीवन में कई नौकाएं किनारे पर नहीं लग
पाई. अब ऐसी लाइन पसंद आएगी तो और क्या होने वाला
है ?

मुफलिसी और फ़ाकाकशी में जिंदगी गुज़ारने से तो अच्छा होता
किसी बड़े उद्योगपति की लड़की से इश्क फ़रमाया होता, इस
गीत के सारे भाव जाग्रत हो जाते. कमबख्त अंतरे की दूसरी
लाईन याद नहीं हुई-तेरा आँचल है तो पतवार भी दरकार नहीं,
नहीं तो नैया क्या जहाज़ भी पार हो जाता और लग जाता
किनारे पे.

जीवन में हर एक बात का कोई मतलब ज़रूर होता है.
समय बलवान है और समय पर ही पता चल पाता है कि
क्या हुआ, कैसे हुआ और क्यूँ हुआ. जब ये कसरत हो जाती
है तब गीता का सार याद आता है.

अब रोमांटिक गीत के समय बेफजूल की फिलासफी झाडना
अच्छी बात नहीं है इसलिए हम चुपचाप ये गीत सुनेंगे जो
इन्दीवर साहब ने बड़ी तबियत से लिखा है और उतनी ही
कोम्पिटिटिव तबियत से रोशन साहब ने इसकी तर्ज़ बनायीं
है. गायको को आप पहचान ही जायेंगे. न पहचान पायें तो
टैग देख लें पोस्ट के.

गीत में अर्जुन और शम्मी आपको दिखलाई देंगे. अर्जुन साहब
का तो पता नहीं मगर शम्मी को आपने कई फिल्मों में चरित्र
भूमिकाएं निभाते देखा होगा.




गीत के बोल:

बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम,
ओ बलम तेरी कसम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम,
हो पहला कदम
जुदा न कर सकेंगे हमको ज़माने के सितम
हो ज़माने के सितम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम
हो पहला कदम

ले उठा प्यार भी अंगडाई है, दिल भी जहां
अजी ऐसे में लिए जाते हो तुम बोलो कहाँ
दूर दुनिया की निगाहों से कहीं जायेंगे हम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम
हो पहला कदम

तेरी दो आँखों में दीखते हैं मुझको दोनों जहाँ
इन्हीं में खो गया दिल मेरा कहो ढूंढूं कहाँ
चंद घटता हो घटे अपनी मोहब्बत न हो कम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम
हो पहला कदम

मेरी नैया को किनारे का इंतज़ार नहीं
तेरा आँचल हो तो पतवार भी दरकार नहीं
तेरे होते हुए क्यूँ हो मुझे तूफ़ान का गम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम
हो पहला कदम
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Bade armanon se rakha hai-Malhar 1951

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