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Dec 24, 2019

हसीनों की दुनिया-बेरहम १९८०

लता मंगेशकर के गीत के बिना हिंदी फिल्म संगीत
की गाथा हमेशा अधूरी रहती है अतः एक गीत और
सुन लेते हैं आज.

८० के दशक में माला सिन्हा पर कोई गीत फिल्माया
गया हो आश्चर्य सा लगता है.

वर्मा मलिक का लिखा हुआ गीत है जिसे लक्ष्मी प्यारे
ने धुन से संवारा है. लक्ष्मी प्यारे ने लता मंगेशकर से
तकरीबन ६०० से ऊपर गाने गवाए जो उल्लेखनीय है
और आंकड़ों के मामले में सबसे ज्यादा है किसी भी
संगीतकार के लिए.



गीत के बोल:

कहने को हम जवानियों के ख्वाब है
नाज़-ओ-अदा में खेलते शबाब हैं
रंग है बहार हैं गुलाब हैं
जवाब नहीं है कोई लाजवाब हैं
लेकिन

हसीनों की दुनिया खुदगर्ज़ है
हसीनों की दुनिया खुदगर्ज़ है
इतना कहना मेरा फर्ज है
आदाब अर्ज़ है आदाब अर्ज़ है
आदाब अर्ज़ है
हसीनों की दुनिया खुदगर्ज़ है
इतना कहना मेरा फर्ज है
इतना कहना मेरा फर्ज है
आदाब अर्ज़ है आदाब अर्ज़ है
आदाब अर्ज़ है

जो इक बार दिल इनसे टकरायेगा
वो इनको बरसों भुला पायेगा
इन्हें प्यार करना बड़ा है गुनाह

इन्हें प्यार करना बड़ा है गुनाह
खुदा ही बचाये खुदा की पनाह
खुदा ही बचाये खुदा की पनाह
बड़ा बोझ है ये बड़ा क़र्ज़ है
इतना कहना मेरा फर्ज है
आदाब अर्ज़ है आदाब अर्ज़ है
आदाब अर्ज़ है

ये नज़रें हैं खंजर ये क़ातिल अदा
लुट जाओगे इनसे बचना ज़रा
बचना ज़रा बचना ज़रा
है फितरत मेरी ये के लिखा सितम
रहमदिल के परदे में है बेरहम
किसी से ना इनको कोई गर्ज़ है
इतना कहना मेरा फर्ज है
आदाब अर्ज़ है आदाब अर्ज़ है
आदाब अर्ज़ है
………………………………………………….
Haseeno ki duniya-Beraham 1980

Artists: Mala Sinha, Sanjeev Kumar

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Dec 23, 2019

या हुस्न रहे या-बेरहम १९८०

फ़िल्मी कव्वाली सुने बहुत दिन हो गए. अधिकांश
में हुस्न और इश्क मसला होता है. एक और सुन
लेते हैं आज.

परदे पर इसे कादर खान और मौसमी चटर्जी गा रहे
हैं. शत्रुघ्न सिन्हा, रीना रॉय और कष्टों मुखर्जी भी
नज़र आयेंगे.

बोल वर्मा मलिक के हैं और संगीत लक्ष्मी-प्यारे का.
आशा भोंसले और महेंद्र कपूर ने इसे गाया है.

टी वी चैनलों पर चर्चा के साथ गाजे बाजे वाले भी
होना चाहिए तो मनोरंजन भरपूर होगा. वाद कब पाद
में तब्दील हो जाता है पता ही नहीं चलता.





गीत के बोल:

हो हो हो हो हो ओ ओ ओ ओ ओ
हो हो हो हो हो ओ ओ ओ ओ ओ
आ आ आ आ आ हो हो हो हो हो

हुस्न एक उलटी राह है
हुस्न एक झूठी चाह है
हुस्न तो एक गुनाह है
हुस्न करता कबाब है

इस हुस्न के नखरे नाज़-ओ-नज़ाकत
हुस्न के नखरे नाज़-ओ-नज़ाकत
इस हुस्न के नखरे ओ नखरे
हुस्न के नख़रे नाजो नजाकत
रोज रोज अब कौन सहे
हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा खत्म करें
या हुस्न रहे या इश्क़ रहे
हम आज ये किस्सा ख़तम करें

खुद धोखा दग़ा फ़रेब करें
खुद धोखा दग़ा फ़रेब करें
खुद धोखा दग़ा फ़रेब करें
इलज़ाम ये हुस्न पे देता रहे
हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा खत्म करें
या हुस्न रहे या इश्क़ रहे
हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा ख़तम करें

एक दिन देखा
हो एक दिन देखा दर्द का मारा
इक आशिक मस्ताना
जंगल जंगल मारा मारा
फिरता था दीवाना
फिरता था दीवाना

मुझको देख के कहने लगा
हो मुझको देख के कहने लगा
अरे सुन ले मेरा अफ़साना
हर आशिक़ के घर घर में
पैगाम मेरा पहुंचाना
के हुस्न को इतना लूटो मारो
के हुस्न को इतना लूटो मारो
सारी उम्र ही रोता रहे

हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा खत्म करें

हमारी भी सुनो
हमारी भी सुनो
लैला की जब कब्र पे चल कर
इक हसीना आई
रो के लिपट के कहने लगी
आहे रो के लिपट के कहने लगी
आहे रो के लिपट के कहने लगी
ए लैला तेरी दुहाई
कैसे बदला लूं इनसे
आहे कैसे बदला लूं इनसे
हर आशिक़ है हरजाई
तो कब्र से लैला की रूह ने
यही आवाज़ लगाईं
निकल पड़ो अब तान के सीना
दोनों में से एक रहे

हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा खत्म करें
या हुस्न रहे या इश्क़ रहे
हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा ख़तम करें

इनका हर दौर देखा इनका हर तौर देखा
आहे इनका हर दौर देखा इनका हर तौर देखा
हो सलमा या सुलेखा है सब धोखा ही धोखा
इनका हर दौर देखा इनका हर तौर देखा
यहाँ से और वहां से पूछ लो तुम जहां से
वफ़ा के देते झांसे ख़ासे पलट देते है पासे
तरन्नुम इनके झूठे तबस्सुम इनके झूठे
तकल्लुम इनके झूठे मरासिम इनके झूठे
आहे छलावा है छलवा भुलावा है भुलवा
इनकी उल्फ़त का दावा दिखावा है दिखावा

तुम बन ठन के न निकलो
तो ये दिल न फिसले
एक बार मरम्मत होगी
तो फिर दिल न मचले

इश्क़ हुस्न का दुश्मन है
इश्क़ हुस्न का दुश्मन है
कोई इसके भरोसे न रहे

हम आज ये किस्सा खत्म करें
अरे क्या बात है
हम आज ये किस्सा खत्म करें
या हुस्न रहे या इश्क़ रहे
हम आज ये किस्सा खत्म करें
हम आज ये किस्सा खत्म करें
…………………………………………….
Ya husn rahe ya-Beraham 1980

Artists: Kadar Khan, Mausmi Chatterji

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Dec 22, 2019

तकदीर के कलम से-बेरहम १९८०

फिलोसॉफी पर कुछ ज्यादा बातें हो रही हैं कुछ दिन
से. सिलसिले को आगे बढाते हुए एक गाना सुनते हैं
फिल्म बेरहम से. वर्मा मलिक की रचना है और इस
गीत का संगीत तैयार किया है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल
ने.

मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ वाला ये गीत लोकप्रिय तो
नहीं मगर प्रेरणादायी है और मधुर है, इसे एक बार
अवश्य सुनना चाहिए. टी वी के न्यूज़ चैनलों पर ढेर
सारी खिड़कियों से आती आवाजें जो थोड़ी देर के बाद
भौं-भौं में तब्दील हो जाती हैं उनसे जो सर दर्द होता
है उसे दूर करने में प्रेरणादायी गीत बहुत सहायक होते
हैं.




गीत के बोल:

तक़दीर के कलम से कोई बच न पायेगा
तक़दीर के कलम से कोई बच न पायेगा
पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आयेगा
मालिक ने जो लिख दिया है वो मिट न पायेगा
पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आयेगा
वो पेश आयेगा

चाहने से कभी आरज़ू के फूल न खिले
ख़ुशी के चार दिन भी ज़िंदगी में न मिले
देखिये ये प्यार कितना मजबूर है
मज़िल से पास आ के भी मज़िल से दूर है
एक नज़र भर के भी ना तू देख पायेगा
पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आयेगा
वो पेश आयेगा

किस्मत बिना कोई किसी को पा नहीं सके
और प्यार को सीने से भी लगा नहीं सके
मिलाने से पहले ही यहाँ दिल टूट जाते हैं
सफ़र से पहले हमसफ़र भी छूट जाते है
तक़दीर तुझपे हँसेगी तू रो न पायेगा
पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आयेगा
वो पेश आयेगा

तक़दीर के कलम से कोई बच न पायेगा
पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आयेगा
वो पेश आयेगा
वो पेश आयेगा
……………………………………………….
Taqdeer ke kalam se-Beraham 1980

Artist:

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May 16, 2017

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का-बेरहम १९८०

जिगर मुरादाबादी की रचना सुनते हैं आशा भोंसले की
आवाज़ में. फिल्म का नाम है बेरहम.ये सन १९८० की
फिल्म है. फिल्म ज्यादा नहीं चली और ये गीत भी कुछ
ज्यादा नहीं बजा मगर इस रचना को कई कलाकार गा
चुके हैं अपने अपने अंदाज़ में.

इस गीत की तर्ज़ बनाई है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने.



गीत के बोल:

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फ़ैले तो ज़माना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना ही समझ लीजे
ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना ही समझ लीजे
ये इश्क़ नहीं आसाँ
एक आग का दरिया है
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
क्या हुस्न ने समझा है
हम ख़ाकनशीनों की
हम ख़ाकनशीनों की ठोकर में ज़माना है

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का

आँसू तो बहुत से हैँ आँखों में जिगर लेकिन
बिन जायें तो मोती है बिन जायें तो मोती है
बिन जायें तो मोती है रह जायें तो दाना है

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का
…………………………………………………….
Is lafz-e-mohabbat ka-Beraham 1980

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