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Feb 4, 2010

जुल्फों को आप यूँ ना-चन्दन का पलना १९६७

धर्मेन्द्र को फिल्मों में अक्सर रफ़ी के गीत परदे पर होंठ हिलाने
के लिए मिले। रफ़ी की आवाज़ धीरे धीरे उनके पसंदीदा हो गयी।
ये बात और है कि सन ७० के बाद वे किशोर कुमार के गीत ज्यादा
गाते नज़र आये। लेकिन ६० के दशक में वे रफ़ी के गीत ही परदे पर
गाते दिखे । ये एक फिल्म है सन १९६७ की -चन्दन का पलना जो
महमूद की फिल्म है। इसमें धर्मेन्द्र के साथ मीना कुमारी प्रमुख
भूमिकाओं में हैं। इसके अलावा महमूद और मुमताज़ की जोड़ी है
मनोरंजन के लिए। ६० के दशक के उत्तरार्ध में जो काम रवि और
मदन मोहन कर रहे थे-रफ़ी के लिए रोमांटिक गीत बनाने का,
वही आर दी बर्मन के जिम्मे भी आया जब उनको एक गीत धर्मेन्द्र
के लिए कम्पोज़ करना पड़ा। इस गीत में आपको अलग ही अंदाज़
मिलेगा। जानकार संगीत प्रेमियों के लिए -ऐसा लगेगा कि
तीसरी मंजिल नाम की गाडी पर "आपको प्यार छुपाने की
बुरी आदत है" गाया जा रहा है।


इस गीत को मैंने सर्वप्रथम सन ७५ के आसपास सुना था।
उसके बाद शायद इसको सुनने का मौका मिला सन ८२ में एक रफ़ी
के भक्त के संग्रह से । आप भी इसका आनंद उठाइए , ये एक युगल
गीत है जिसमे रफ़ी का साथ दिया है आशा भोंसले ने। ये एक नवाबी
गीत है जिसमे जगह जगह "आप" शब्द का उपयोग किया गया है।
आशा भोंसले का "एक पैगिया " अंदाज़ के क्या कहने।



गीत के बोल:

जुल्फों को आप यूं ना, संवारा करो
जुल्फों को, आप यूं ना, संवारा करो
इश्क वरना किसी दिन बहक जायेगा
नज़रों से, आप यूं ना इशारा करो
हुस्न वरना किसी दिन, बहक जायेगा

नज़रों से, आप यूं ना इशारा करो

जहाँ भी जब भी, नज़र आते हो
ग़ज़ब करते हो, सितम ढाते हो
तो कौन कहता है, के आप छुप छुप के, नज़ारा करो
तो कौन कहता है, के आप छुप छुप के, नज़ारा करो

जुल्फों को, आप, यूं ना संवारा करो
इश्क वरना किसी दिन, बहक जायेगा

नज़रों से, आप यूं ना इशारा करो

आ आ, आ आ, आ

तुम्हारे लिए तो मुहब्बत होगी
हमारे लिए वो क़यामत होगी
जो प्यार करना है, तो रंज भी ख़ुशी से, गवारा करो
जो प्यार करना है, तो रंज भी ख़ुशी से, गवारा करो

नज़रों से आप यूं ना इशारा करो
हुस्न वरना किसी दिन बहक जायेगा

जुल्फों को आप यूं ना संवारा करो

ये हालत देखो हुई जाती है
ना चैन आता है हाय ना नींद आती है
जो हाल है हमारा वो हाल ना हमारा खुदा ना करो
जो हाल है हमारा वो हाल ना हमारा खुदा ना करो

जुल्फों को आप यूं ना संवारा करो
इश्क वरना किसी दिन बहक जायेगा
नज़रों से आप यूं ना इशारा करो
हुस्न वरना किसी दिन बहक जायेगा

जुल्फों को आप यूं ना संवारा करो

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Dec 12, 2009

निर त त ढंग -चंदन का पलना १९६७

शास्त्रीय संगीत का इस्तेमाल हिन्दी फिल्मों में कई बार हास्य कलाकारों
के ऊपर फिल्माए गए गीतों में किया गया है। तोड़ी और टांग तोड़ी की सीमाओं
के बीच झूलते ये गीत आम श्रोता को आनंदित करते हैं। शुद्ध शास्त्रीय संगीत
प्रेमियों को कैसा लगता है ये सब सुनकर, अंदाज़ा लगना मुश्किल है। आम श्रोता
तो छोटी मोटी तान सुनकर ही वाह वाह करने पर तुल जाता है। ये गीत मन्ना डे
और रफ़ी की जुगलबंदी है। आनंद उठाइए। संगीत है राहुल देव बर्मन का।

फ़िल्म में ये गीत महमूद और धुमाल पर फिल्माया गया है। इस फ़िल्म में
महमूद ने एक बंगाली युवक की भूमिका निभाई है। इस गीत के बोल लिखना
मेरे बस के बाहर है, धन्यवाद् :P । गाने के अंत में विलायती युवती सी दिखती हुईं
मुमताज़ प्रकट होती हैं और वो भी इस संगीतमय कसरत में शामिल हो जाती हैं।
गीत के बोल किसी बुन्दादीन महाराज ने लिखे हैं।

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