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May 3, 2016

आज मौसम बड़ा बेईमान-लोफर १९७३

मन जब प्रफुल्लित होता है तो वो पहाड पे चढ जाने को हो
जाता है, उछलने लगता है, कूदने लगता है. जैसे आज की पीढ़ी
का नायक ऊंची पहाड़ी पे चढ के, जोर लगा के, नाक के सुर से
गाता है वैसे ही कल्पना करें ७० के दशक में क्या होता होगा?

उस समय के संगीतकार को अगर पहाड पर चढाना होता तो वो
रफ़ी से गाना गवा लेता, ज्यादा ऊंची छोटी पे चढाना होता तो
महेंद्र कपूर से. बस उस समय का गाने वाला गले से गाता था.

एक रफ़ी का गाया ऊंचे स्केल वाला गीत जिसे गुनुगुनाने में अच्छे
अच्छों को पसीना आ जाता है. फिल्म का नाम है लोफर जिससे
एक गीत आप पहले सुन चुके हैं इधर.



गीत के बोल:

आज मौसम बड़ा बेईमान है
बड़ा बेईमान है, आज मौसम
आने वाला कोई तूफान है
कोई तूफान है, आज मौसम

क्या हुआ है, हुआ कुछ नहीं है
बात क्या है, पता कुछ नहीं है
मुझसे कोई खता हो गयी तो
इसमें मेरी खता कुछ नहीं है
खूबसूरत है तू, रुत जवान है
आज मौसम बड़ा बेईमान है
बड़ा बेईमान है, आज मौसम

काली काली घटा डर रही है
ठंडी आहें हवा भर रही है
सबको क्या क्या गुमा हो रहे हैं
हर कली हमपे शक कर रही है
फूलों का दिल भी कुछ बदगुमान है
आज मौसम बड़ा बेईमान है
बड़ा बेईमान है, आज मौसम

ऐ मेरे यार, ऐ हुस्नवाले
दिल किया मैंने तेरे हवाले
तेरी मर्ज़ी पे अब बात ठहरी
जीने दे चाहे, तू मार डाले
तेरे हाथों में अब मेरी जान है

आज मौसम बड़ा बेईमान है
बड़ा बेईमान है, आज मौसम
आने वाला कोई तूफान है
कोई तूफान है, आज मौसम
.....................................................................
Aaj mausam bada beimaan hai-Loafer 1973

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Jan 28, 2016

जाने जाना जाओ कल फिर आना-समाधि १९७२

फिल्म समाधि का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत हम सुन चुके है
-काँटा लगा. अब सुनते हैं एक और चर्चित गीत जिसका कि
इन्स्ट्रुमेन्टल वर्ज़न ज्यादा लोकप्रिय हुआ था. ये है धर्मेन्द्र
और जा भादुडी पर फिल्माया गया गीत जिसे किशोर ने
गाया है.
फिल्म में धर्मेन्द्र की दोहरी भूमिका है. यह दूसरी पीढ़ी है
जिसका फिल्म के टाइटल से कोई लेना देना नहीं है. रोमांस
हो रहा है इस गीत में. काफी रंग बिरंगा गीत है. कारें कई
तरह की हैं, नायक नायिका के ड्रेसेज़ भी रंग बिरंगे हैं. उस
समय कोस्ट्यूम डिजाइनर पर कोई ध्यान नहीं देता था. ये
तय है उस कोस्ट्यूम डिजाइनर का भविष्य उज्जवल अवश्य
हुआ होगा.

गीत मजरूह का है और संगीत आर डी बर्मन का. गीत की
सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि इसमें धर्मेन्द्र ने डांस करने
की पुरजोर कोशिश की है.



गीत के बोल:

जाने जाना जाओ कल फिर आना
यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना
जाने जाना जाओ कल फिर आना
यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

अब याद रखना राह ये दिलबर
लूटा है इस पे तुमने बहार में
कब तक यहीं पर आँख बिछाए
बैठा रहूँगा मैं इंतज़ार में
जाओ करो न बेक़ल
दिल रहा है मचल
बाक़ी बातें होंगी कल
अभी क्या कहूँ
जाने जाना जाओ कल फिर आना
यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

थोड़ी अभी तो नज़र झुकाओगी
थोड़ा अभी शरमाओगी तुम
पहला ही दिन है अपने मिलन का
दो चार दिन में खुल जाओगी तुम
इसे कहते हैं प्यार सिखाऊँगा
मैं यार हूँ तुम्हारा दावेदार
आगे क्या कहूँ

जाने जाना जाओ कल फिर आना
यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

पागल कहो तुम हँस कर मुझको
या दिल ही दिल में दीवाना समझो
पर ये तुम्हारी ऐसी अदा है
अपने किसी को बेगाना समझो
न समझ में हो कम न उमर में
हो कम अब तुमसे सनम
मैं भी क्या कहूँ

जाने जाना जाओ कल फिर आना
यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना
.................................................................................
Jaana jaana jao kal fir aana-Samadhi 1972

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Jan 14, 2016

मेरी जान मेरी जान कहना मानो--दो चोर १९७२

सुनिए फिल्म दो चोर से एक मधुर गीत। धर्मेन्द्र एक
समय बड़े हैंडसम व्यक्ति माने जाते थे और उनकी
गिनती दुनिया के सबसे खूबसूरत लोगों में होती थी.
फिल्मों में नायक पहले भी अपने कसरती बदन का
प्रदर्शन करते थे, धर्मेन्द्र उनमे से एक प्रमुख कलाकार
हैं।

बहुत कम गीत ही आपको ऐसे मिलेंगे जिसमे नायक
और नायिका की सेहत दुरुस्त मिले। इस फिल्म में हीरो
हीरोईन दोनों सेहतमंद हैं। वैसे दक्षिण भारत के नायक
नायिका उत्तर भारत के नायक नायिकाओं की अपेक्षा
ज्यादा सेहतमंद और खाते पीते घर के नज़र आते हैं.

गीत में नायक निवेदन कर रहा है या सलाह दे रहा है
ये गीत सुन के पता लगाइये. गीत मजरूह ने लिखा है
और इसकी धुन बनायीं है राहुल देव बर्मन ने. गायक
को आप पहचानते हैं-योड्लिंग के भारतीय महाराजा.

गीत के बहाने आपको बम्बई की चौपाटी की मैरीन ड्राइव
का खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलेगा. धन्यवाद टूरिज़म
फ्रेंडली हिंदी सिनेमा. बिन घुँघरू के पायल नहीं बजा करती
है-इस गीत का सन्देश.



गीत के बोल:

मेरी जान मेरी जान कहना मानो
मेरी जान मेरी जान कहना मानो
हो दुश्मन है जहाँ रुत पहचानो
कटेगी न ये डगर बिना एक हमसफ़र
फिर क्यूँ बंदे को अपना ही जानो
मेरी जान मेरी जान कहना मानो

कोई भी गाडी दुनिया में
एक पहिये से नहीं चलती
चले नहीं जिंदगी बिन साथी के
देखो तुम्हारी पायल भी
घुँघरू से नहीं बजती
बजती हैं तालियाँ दो हाथों से
मेरे संग आ जाओ बुरा मत मानो
हो मेरी जान मेरी जान कहना मानो

मैं भी नहीं कुछ तुमसे कम
तुम जो नहीं रुकने वाले
ढंग मेरे हाथ में हैं और भी
तुमको हंसा के छोडूंगा
तोड़ के होंठों के ताले
समझ लो मैं हूँ सनम दिल का चोर भी
अपना जैसा मुझे भी जानो
हो मेरी जान मेरी जान कहना मानो
हो दुश्मन है जहाँ रुत पहचानो
कटेगी न ये डगर बिना एक हमसफ़र
फिर क्यूँ बंदे को अपना ही जानो
मेरी जान मेरी जान कहना मानो
………………………………………………………………
Mei jaan meri jaan kehna maano-Do chor 1972

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May 15, 2015

ओ मेरी महबूबा - धरम वीर १९७७

हिंदी फिल्म संगीत जगत में सैकड़ों गीतकार हुए हैं. उनमें
से कुछ एक ही सफल हुए हैं या कहें ज्यादा सुने गए.

आनंद बक्षी को जैसे पारस पत्थर मिला हुआ था. वे
जो भी गाने लिखते उनमें से अधिकांश जनता की जुबान
पर चढ जाते. ८० का दशक उनके ही नाम रहा. उनके
संग अधिकतर लक्ष्मी प्यारे का संगीत रहता. सन ७७
की एक बेहद सफल फिल्म है धरम वीर जिसका संगीत भी
चचित है, से एक गीत आपको सुनवाते हैं आज. ये एक
काफी सुना गया रोमांटिक गीत है.

ये भी एक संयोग है कि हिंदी फिल्मों के सबसे ज्यादा
रोमांटिक गीत रफ़ी ने गाये हैं, गीत चाहे हसरत जयपुरी
का हो चाहे आनंद बक्षी का.




गीत के बोल:

ओ मेरी महबूबा, महबूबा, महबूबा
तुझे जाना है तो जा, तेरी मर्ज़ी मेरा क्या
पर देख तू जो रूठ कर चली जाएगी
तेरे साथ ही मेरे मरने की ख़बर आएगी

जो भी हो मेरी इस प्रेम-कहानी का
पर क्या होगा तेरी मस्त जवानी का
आशिक़ हूँ मैं तेरे दिल में रहता हूँ
अपनी नहीं मैं तेरे दिल की कहता हूँ
तौबा-तौबा फिर क्या होगा
कि बाद में तू इक रोज़ पछताएगी
ये रुत प्यार की जुदाई में ही गुज़र जाएगी

ओ मेरी महबूबा, महबूबा, महबूबा
तुझे जाना है तो जा, तेरी मर्ज़ी मेरा क्या

तेरी चाहत मेरा चैन चुराएगी
लेकिन तुझको भी तो नींद ना आएगी
मैं तो मर जाऊँगा लेकर नाम तेरा
नाम मगर कर जाऊँगा बदनाम तेरा
तौबा-तौबा फिर क्या होगा
कि याद मेरी दिल तेरा तड़पाएगी
मेरे जाते ही तेरे आने की ख़बर आएगी

ओ मेरी महबूबा, महबूबा, महबूबा
तुझे जाना है तो जा, तेरी मर्ज़ी मेरा क्या

दीवाना मस्ताना मौसम आया है
ऐसे में तूने दिल को धड़काया है
माना अपनी जगह पे तू भी क़ातिल है
पर यारों से तेरा बचना मुश्किल है
तौबा-तौबा फिर क्या होगा
फिर प्यार में नज़र जब टकराएगी
तड़पती हुई मेरी जान तू नज़र आएगी

ओ मेरी महबूबा, महबूबा, महबूबा
तुझे जाना है तो जा, तेरी मर्ज़ी मेरा क्या
पर देख तू जो रूठ कर चली जाएगी
तेरे साथ ही मेरे मरने की ख़बर आएगी
....................................................................
O Meri mehbooba-Dhartam Veer 1977

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Apr 15, 2015

क्या नज़ारे क्या सितारे-झील के उस पार १९७३

अब एक गीत सुनवाते हैं आपको जो कम सुना हुआ है
और जिसे जनता भी कम सुना करती है. इस गीत की
हालांकि राहुल देव बर्मन के भक्त बहुत तारीफ करते हैं,
इस गीत के बोल बढ़िया हैं, इस गीत का संगीत बढ़िया
है, इस गीत में एक्टिंग अच्छी की है कलाकारों ने, इस
गीत को गायक ने बहुत उम्दा तरीके से गाया है, इत्यादि.
गीत सिचुएशनल किस्म का है. कहानी में नायिका देखने
से मोहताज़ है, उसके आँखों के ऑपरेशन की तैय्यारी हो
चुकी है. नायक चाहता है वो ज़ल्द ठीक हो जाए और
सारे नज़ारे देख पाए.

कुछ भी हो गीत में जो चीज़ सबसे बढ़िया है वो है इसके
फिल्मांकन की लोकेशन जिसकी वजह से इसे एक बार सुन
कर आनंद उठाया जा सकता है. आप भी उठायें. इस फिल्म
का फिल्मांकन जाने माने कैमरामेन जाल मिस्त्री ने किया है




गीत के बोल:

क्या नज़ारे क्या सितारे
सबको है इंतज़ार सब हैं बेक़रार
तू कब सब देखेगी
हर कली में हर गली में
देखेगी मेरा प्यार प्यार की बहार
तू सब जब देखेगी

क्या नज़ारे क्या सितारे
सबको है इंतज़ार सब हैं बेक़रार
तू कब सब देखेगी

बादल अम्बर पे यूँ ही आता जाता रहेगा
तेरे रेशमी आँचल की तरह लहराता रहेगा
क़दमों की धूल चूमेगी ये फूल
तू जब सब देखेगी

मन में तू ऐसे समायी जैसे नदिया में नीर
मेरे नैनों के दर्पण में लगी है यूँ तेरी तसवीर
अपना ये रूप ये छाँव धूप
तू जब सब देखेगी

क्या नज़ारे क्या सितारे
सबको है इंतज़ार सब हैं बेक़रार
तू कब सब देखेगी
हर कली में हर गली में
देखेगी मेरा प्यार प्यार की बहार
तू सब जब देखेगी
.......................................................
Kya nazare-Jheel ke us paar 1973

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Feb 14, 2015

मेरे साजन हैं उस पार-बंदिनी १९६३

जैसा कि हम संगीत प्रेमियों ने समझा संगीतकारों के बारे में-
वे अपनी बेहतर धुनें अपने स्वयं के गायन के लिए रख लिया
करते थे. ये बात किसी फिल्म विशेष के साउंड ट्रैक पर लागू
होती दिखाई देती है. फिल्म बंदिनी में भी सचिन देव बर्मन
ने एक गीत गाया है जो बैक ग्राउंड में बजता है. गीत का
उद्देश्य इधर नायिका की भावनाओं को उभारना है जो इस दृश्य में
नूतन लगभग अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयासों के साथ व्यक्त कर रही हैं..
गीत फिल्म के अंत समय में प्रकट होता है जिस समय नायिका
अंतर्मन में चल रहे द्वन्द से उबरने ही वाली है और निर्णय करेगी
उसे किसका साथ देना है-अपने बेवफा अतीत का या सौम्य स्वभाव
वाले वर्तमान का. फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त
हुआ सन १९६३ के लिए.



गीत के बोल:

ओ रे माँझी, ओ रे माँझी
ओ ओ ओ ओ मेरे माँझी

मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार हूँ इस पार
ओ मेरे माँझी अब की बार ले चल पार, ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार


मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना
गुण तो ना था कोई भी, अवगुण मेरे भुला देना
मुझे आज की विदा का, मर के भी रहता इंतज़ार


मत खेल जल जायेगी कहती है आग़ मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की, मैं संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल, मनमीत तेरी हर पुकार

मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार हूँ इस पार
ओ मेरे माँझी अब की बार ले चल पार, ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार
..........................................................................
Mere saajan hain us paar-Bandini 1963

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Jun 1, 2013

चाहे रहो दूर-दो चोर १९७२

चोर चोरनी वाले दृश्य फिल्मों में थोड़ी सी देर के लिए होते हैं.
यहाँ तो पूरी फिल्म इस थीम को समर्पित है. चोर चोरनी के
रोल में हैं धर्मेन्द्र और तनूजा. एक रोमांटिक गीत गा रहे हैं
चोर चोरनी. गीत में ‘दूर’ शब्द पर जोर दिया गया है जो थोडा
ध्यान आकर्षित करता है. आइये सुनें लता किशोर का गाया
मजरूह का लिखा और पंचम का संगीत से संवारा युगल गीत.


   
   

गीत के बोल:

चाहे रहो दूर चाहे रहो पास सुन लो मगर एक बात
एक डोर से बांधोगी सनम किसी दिन हमारे साथ
चाहे रहो दूर चाहे रहो पास सुन लो मगर एक बात
तुम इस गली तो मैं उस गली के आऊँ कभी न हाथ

चाहे रहो दूर चाहे रहो पास

मेरे पीछे पीछे चले तो हो बाबू पर ज़रा तिरछी है चाल
आशिक बनना जाओ कहीं सीखो तुम अभी दो चार साल
चाहत के काबिल बन जाओ फिर मैं करूंगी
फिर मैं करूंगी बात

चाहे रहो दूर चाहे रहो पास सुन लो मगर एक बात
एक डोर से बांधोगी सनम किसी दिन हमारे साथ
चाहे रहो दूर चाहे रहो पास सुन लो मगर एक बात
तुम इस गली तो मैं उस गली के आऊँ कभी न हाथ
चाहे रहो दूर चाहे रहो पास

ओ मेरी चंचल पवन बसंती करो नहीं यूँ बेकरार
इन बाहों में आना है तुमको आखिर जान-ए-बहार
दिल थामे आओगी फिर मैं पूछूँगा तुमसे
पूछूँगा तुमसे बात

चाहे रहो दूर चाहे रहो पास सुन लो मगर एक बात
एक डोर से बांधोगी सनम किसी दिन हमारे साथ
चाहे रहो दूर चाहे रहो पास सुन लो मगर एक बात
तुम इस गली तो मैं उस गली के आऊँ कभी न हाथ
चाहे रहो दूर चाहे रहो पास
....................................................
Chahe raho door-Do chor 1972

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Oct 8, 2011

लुट गई मैं तो आज हो रामा-झूठा सच १९८४

फिल्म अभिनेत्री रेखा हर दशक के साथ नए रूप-संस्करण में दिखाई दीं
इसीलिए उनको अंग्रेजी की 'दिवा' कहा जाता है। गौरतलब है की उन्होंने
अपनी काय को योग के ज़रिये आकर्षक बना लिया और ८० के दशक में
फिल्मकारों ने उनके लिए विशेष दृश्य फिल्मों में तैयार किये उनके सौंदर्य
को आम दर्शक से रु-ब-रु कराने के लिए। रेखा के ऊपर फिल्माया गया और
एक कम सुना गया एक गीत सुनते हैं आज, फिल्म 'झूठा सच' से जिसमें उनके
साथ नायक हैं-धर्मेन्द्र।

गीत लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई है आर. डी. बर्मन
ने। गीत गया है आशा भोंसले ने।



गीत के बोल:

लुट गई मैं तो आज हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खड़ी
लुट गई मैं तो आज हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खडी

लुट गई मैं तो, लुट गई
लुट गई मैं तो आज हो रामा
हो रामा हो रामा है दिया हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खड़ी

............................................
Lut gayi main to-Jhootha Sach 1984

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Aug 13, 2011

बहारों की बारात आ गई-यकीन १९६९

फिल्म यकीन से एक गाना तो झट जुबान पे आ जाता है वो है फिल्म
का शीर्षक गीत। इतना भी याद आता है कि इस फिल्म में धर्मेन्द्र और
शर्मिला टैगोर हैं। इनकी जोड़ी भी कुछ ही फिल्मों में देखी होगी आपने।
३ फ़िल्में तो मुझे याद आती है-अनुपमा, चुपके चुपके और देवर। देवर
में थोड़ा अलग सा किस्सा था।

हिंदी फिल्म के नायक/हीरो अगर सामान्य पृठभूमि वाले होंगे तो भी उनके
पास गज़ब का सामान होता है। इस फिल्म के हीरो के पास एक शानदार
कार है। अब कार शानदार हो या ना हो, इससे विशेष फर्क नहीं पढता जब
नायिका ज्यादा आकर्षण का केंद्र हो बनिस्बत फिल्म में दिख रहे बाकी के
सामानों के। अब आप ये मत पूछ लीजियेगा कि गाने कि शुरुआत में नायिका
काली साडी पहने हुए है और नायक की कार के शीशे में वो सफ़ेद साडी पहने
दिखाई देती है.

एक बात ज़रूर कार चलने वालों से कहना चाहूँगा-अगर इतना स्टीयरिंग आप
गलती से भी न घुमाएँ किसी पुल पर चलते समय, अन्यथा आपके गाने के
अंतरे नाले या नदी में सुनाई देंगे. या तो फ़िल्मी कार का स्टीयरिंग खराब है,
या फिर उसमें विशेष प्रावधान किया हुआ है, या फिर कार एक जगह पर खड़ी
है और पुल पीछे सरक रहा है.

एक बात में तो सामान्य जीवन और फिल्म कम से कम एक सरीखी
लगते हैं-कार का टायर पंचर होना। गौरतलब है कि टायर पंचर होने
के बाद बदलने वाली कसरत में जिसको पसीना कम निकलता हो वो
भी पसीने से लथ-पथ हो जाता है, उस स्तिथि में नायक का उसी जोश
के साथ गीत गाना और मुस्कुराना अतिश्योक्ति सी लगती है। खैर गीत
सुनिए जो हसरत जयपुरी का लिखा हुआ है और इसकी धुन बनाई है
शंकर जयकिशन ने। मोहम्मद रफी ने इसे गाया है जो कि धर्मेन्द्र के
पसंदीदा गायक रहे हैं।



गीत के बोल:


बहारों की बारात आ गई
ख़ुशी को ले के साथ आ गई
सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान
होठों पे दिल कि बात आ गई

बहारों की बारात आ गई
ख़ुशी को ले के साथ आ गई
सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान
होठों पे दिल की बात आ गई

बहारों की बारात

मुझसे देखो ना शरमाना तुम
मेरी बाहों में खो जाना तुम
मुझसे देखो ना शरमाना तुम
मेरी बाहों में खो जाना तुम
इंतजारी की हद हो चुकी
और ज्यादा ना तरसना तुम
और ज्यादा ना तरसना तुम

बहारों की बारात आ गई
ख़ुशी को ले के साथ आ गई
सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान
होठों पे दिल की बात आ गई

बहारों की बारात

आज छेड़ी हवाओं ने भी
प्यार की मस्त शहनाईयां
आज छेड़ी हवाओं ने भी
प्यार की मस्त शहनाईयां
वादियाँ बन गयीं हैं दुल्हन
जैसे उनकी हों परछाईयाँ
जैसे उनकी हों परछाईयाँ

बहारों की बारात आ गई
ख़ुशी को ले के साथ आ गई
सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान
होठों पे दिल की बात आ गई

बहारों की बारात
.................................
Baharon ki baraat-Yakeen 1969

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Aug 2, 2011

बहारों ने मेरा चमन लूट कर-देवर १९६६

जिंदगी में बहुत कुछ सरप्राइज़ गिफ्ट सरीखा प्राप्त होता है। फिल्म में नायक
जिस युवती से प्रेम करता है उसकी शादी नायक के मित्र से हो जाती है।
कुछ कुछ धोखे वाली कहानी है। धोखा नायक का मित्र देता है । नायक
घटनाक्रम बदलते ही नायिका का देवर बन जाता है। अपनी भावनाओं को
वो गीत के माध्यम से कैसे व्यक्त कर रहा है सुनिए आनंद बक्षी के बोलों,
मुकेश की आवाज़ और रोशन के संगीत में। नायक हैं धर्मेन्द्र, दूल्हा बने हैं
देवेन वर्मा और नायिका हैं शर्मीला टैगोर । आनंद बक्षी के लेखन कौशल के
अगर आप कायल नहीं हैं तो इस गीत को ध्यान से एक बार सुन लीजिए।






गीत के बोल:

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
किसी ने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

मैं समझा नहीं ऐ मेरे हमनशीं
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
के साक़ी ने लब से मेरे छीन कर
किसी और को जाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

मुझे क्या पता था कभी इश्क़ में
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
खता हो गई मुझसे कासिद मेरे
तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

खुदाया यहाँ तेरे इन्साफ़ के
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
सज़ा की जगह एक खतावार को
भला तूने ईनाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
....................................
Baharon ne mera chaman loot kar-Devar 1966

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Jul 19, 2011

या दिल की सुनो दुनियावालों-अनुपमा १९६६

फिल्म अनुपमा से एक गीत पेश है हेमंत कुमार की आवाज़ में.
बोल लिखे हैं कैफी अजमी ने और धुन बनायीं है स्वयं हेमंत कुमार ने.
गीत फिल्माया गया है धर्मेन्द्र पर जिन्हें एक पार्टी में गीत गाने के
लिए बोला गया है. दुखियारी नायिका(शर्मिला टैगोर) को ध्यान में रखते
हुए शायद ऐसा गीत गाया जा रहा है.



गीत के बोल:

या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ
जो कहते हैं उनको कहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

ये फूल चमन में कैसा खिला
माली की नजर में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या-क्या देख लिया
अब बहते हैं आँसू बहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

इक ख्वाब खुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गए
मांगा हुआ तुम कुछ दे न सके
जो तुमने दिया वो सहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आँसू और बहें
अब ऐसी तसल्ली रहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों
............................
Ya dil ki suno-Anupama 1966

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Jul 13, 2011

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये-जुगनू १९७३

एक किलो के करीब गहने पहन कर नाचना आसान नहीं होता.
गीत प्रस्तुत है फिल्म जुगनू से. लता मंगेशकर का गाया और
हेमा मालिनी पर फिल्माया गया ये गीत मुझे तब से पसंद है
जबसे इसे फिल्म रिलीज़ के बाद पहली बार सुना था . हेमा
मालिनी फिल्म के अनुसार एक स्टेज शो में नाच रही हैं. उनका
नृत्य आनंदित करने वाला है और सिनेमा हॉल के अनुभव के
आधार पर मैंने पाया कि हर वर्ग का दर्शक इसको ध्यान से देख
कर खुश हो रहा था.

इस गीत पर गांव की नौटंकी में भी एक डांस देखा था जो कि डांस
मच्छर के भिनभिनाने जैसा था.

इस गीत की 'टुर्र रर्र रा टिपर टिपर' वाली ध्वनि आकर्षित करती
रही सदा. ये गीत इस बात का सबूत है कि सचिन देव बर्मन का
संगीत जैसे जैसे उनकी उम्र बढती गयी, जवान होता गया. सन
१९७३ में लता के गाये और संगीतकारों के गीतों से तुलना इस गीत
से कर के देख लीजिए, खुद आपको अंदाज़ा हो जायेगा कि उनके
संगीत में समय के साथ बदलाव होते चले हैं और उन्होंने दूसरों से
बेहतर धुनें बनाने का प्रयास किया है. एक बात तो ज़रूर है, आप
इस गीत की सन ५० के गीतों से तुलना नहीं कर सकते. सचिन देव
बर्मन के ज्ञानी भक्त फिल्म जुगनू के गीत को ख़ारिज कर देते हैं
क्यूंकि वे इसकी "फैली हुई सपनों की बाहें-घर नंबर ४४" तुलना करने
लग जाते हैं.



गीत के बोल:

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये, हाय
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के, घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के, घुँघरू छनक जाये

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये

तन डोले रे धितंग तितंग
मन बोले रे धितंग तितंग

अम्बुआ की डाली पे जब कोयल बोले
हौले हौले बिरहन का मन पापी डोले
किसे नींद आये किसे चैन आये
पिया याद आये जिया धड़क जाए

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये

घर बैठी शरमाऊँ गली में न आऊँ
लट बिखरे मन भटके कहीं खो ना जाऊँ
घर बैठी शरमाऊँ गली में न आऊँ
लट बिखरे मन भटके कहीं खो ना जाऊँ
डगर में हाय, नज़र मिल जाये
कमर बलखाये, चुनर सरक जाये

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये

पी मेरे, बिन तेरे, जिया नाहिं लागे
सारी रैना मेरे नैना रहें जागे जागे
पी मेरे, बिन तेरे, जिया नाहिं लागे
सारी रैना मेरे नैना रहें जागे जागे
अगन सी बन में, लगे सावन में
मेरे आँगन में, बिजली चमक जाये

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
.....................................
Meri payaliya geet tere gaaye-Jugnu 1973

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Jun 29, 2011

मेरा प्यार शालीमार-शालीमार १९७८

इस फिल्म के रिलीज़ होने के पहले तक यही मालूम था कि शालीमार
नाम का एक मशहूर बाग़ काश्मीर में है, जिसे मुग़ल सम्राट शाहजहाँ
ने सन १६४१ में बनवाया था।

देसी विदेशी सितारों से सज्जित फिल्म शालीमार सन १९७८ में आई।
फिल्म का संगीत चर्चित हुआ और खूब बजे इसके गाने। इसका शीर्षक
गीत कहीं खो सा गया। आशा भोंसले की आवाज़ में आइये सुनें इस
फिल्म का शीर्षक गीत जो जीनत अमां पर फिल्माया गया है।






गीत के बोल:

मेरा प्यार शालीमार
तेरा प्यार शालीमार
हम दोनों बेकरार
आँखों में इंतज़ार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार
हम दोनों बेकरार
आँखों में इंतज़ार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार

ये जिसको मिल जाये
उसका दिल खिल जाये
ये जिसको मिल जाये
उसका दिल खिल जाये
हो जाये ज़िंदगी बेकार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार

ये पत्थर ये रूबी
ये दोनों महबूबी
ये पत्थर ये रूबी
ये दोनों महबूबी
हर कोई है इसका ख़रीदार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार
हम दोनों बेकरार
आँखों में इंतज़ार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार
....................
Mera pyar shalimar-Shalimar 1978

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Jun 12, 2011

मिले मिले दो बदन-ब्लैकमेल १९७३

गणित के हिसाब से देखा जाये तो जिस गाने को दो लोग
गायें वो-दोगाना, जिसे तीन लोग गायें वो तीनगाना और
जिसे चार गायक गायें वो चारगाना। पिछले गीत से एक
और गीत ध्यान में आया है, लगे हाथ वो भी सुन/देख
लीजिये।

आपको केवल दोगाना ही सुनवा रहे हैं। ये भी ऐसे याद आया
कि जिस गीत में गायक-गायिका गीत की पंक्तियाँ एक साथ
गाते हैं वो पूर्ण दोगाना लगता है। ऐसा एक और गीत है जिसमें
गायक-गायिका ने बहुत सी पंक्तियाँ साथ साथ गई हैं। धक् चिक
धक् चिक वाली ताल के साथ ये गीत आगे बढ़ता है और कब
ख़त्म हो जाता है मालूम नहीं पढता। ये मधुर गीत है फिल्म
ब्लैकमेल से। इसके संगीत के अटपटे होने की वजह आप केवल
इसका विडियो देख कर ही जान पाएंगे। एक बात बताएं-इसको
देखकर हिंदी की कोई कहावत याद आती है आपको ?




गीत के बोल:


मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं
मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं

देर से आई आई तो बहार
अंगारों पे सोकर जागा प्यार
तूफ़ानों में फूल खिलाए
तूफ़ानों में फूल खिलाए कैसा ये मिलन

मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं

होंठ वही हैं है वही मुस्कान
अब तक क्यों कर दबे रहे अरमान
बीते दिनों को भूल ही जाएँ
बीते दिनों को भूल ही जाएँ अब हम-तुम सजन

मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं
..................................
Mile mile do badan-Blackmail 1973

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Jun 1, 2011

तुम पुकार लो-ख़ामोशी १९६९

हेमंत कुमार का संगीत सौम्यता से सराबोर हुआ करता था। उन्होंने
कई आकर्षक गीत भी गाये। उनके बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है
-ख़ामोशी का प्रस्तुत गीत। नायिका प्रधान इस फिल्म में मानवीय
संवेदनाओं को झकझोर देने वाले प्रसंग हैं। फिल्म का अंत सबसे ज्यादा
चौंकाने वाला है। कथानक के प्रस्तुतीकरण में अनूठापन भी दिखलाई
देता है कई दृश्यों में। फिल्म के संवाद लेखक और गीतकार गुलज़ार हैं।

असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्में ज़्यादातर आपको
मानवीय संबंधों, उनकी उलझन और जटिलताओं की ओर घूमती हुयी
मिलेंगी। उनकी संवेदनशीलता को पहचानने के लिए आपको बस चार
फ़िल्में ही देख लेना चाहिए अन्नदाता(१९७२), ममता( १९६६) , सफ़र(१९७०),
और ख़ामोशी(१९६९) । ऐसे विषय जिनपर दूसरे निर्देशकों को काम
करने में हिचक होती, उन्हें शायद आनंद आता। पसंद अपनी अपनी।
subject के treatment के मामले में अधिकतर वे दूसरों से २० साबित
हुए। फ़िल्मी समीक्षकों ने उनपर या उनकी फिल्मों पर पांच पन्ने के
निबंध नहीं लिखे। उनकी फिल्मों का संगीत पक्ष बहुत मजबूत हुआ करता
अपने समकालीन बंगाली मूल के बाकी निर्देशकों की भांति। आप शायद ये
ज़रूर जानना चाहेंगे कि अभिनेता असित सेन और निर्देशक असित सेन क्या
अलग अलग इंसान हैं ? थोड़ा अंतरजाल खंगालिए और पता लगाइए।




गीत के बोल:

तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है
तुम पुकार लो
ख़्वाब चुन रही है रात, बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुख़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
रात ये क़रार की बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
.................................
Tum pukar lo-Khamoshi १९६९

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Feb 4, 2011

छलकाएं जाम-मेरे हमदम मेरे दोस्त १९६८

फिल्म मेरे हमदम मेरे दोस्त के ४ गीत आपको सुनवा चुके
हैं। आइये एक और गीत सुनें। गीत मजरूह साहब का लिखा
हुआ है और संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का। इतने ही विवरण से
काम चला लीजिये और गीत का आनंद उठाइए। बस इतना ध्यान
दीजिये की पहले फ्रेम में जो शख्स गिटार बजा रहा है वो फ़िल्मकार
और नायक ओ पी रल्हन का कुम्भ के मेले में buइछ्दा भाई जैसा
दिख रहा है।






गीत के बोल:


छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

फूल जैसे तन के जलवे, ये रँग-ओ-बू के
ये रँग-ओ-बू के
आज जाम-ए-मय उठे, इन होंठों को छू के
इन होंठों को छू के
लचकाइये शाख-ए-बदन, लहराइये ज़ुल्फों की शाम

छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

आपका ही नाम लेकर, पी है सभी ने
पी है सभी ने
आप पर धड़क रहे हैं, प्यालों के सीने
प्यालों के सीने
यहाँ अजनबी कोई नहीं, ये है आपकी महफ़िल तमाम

छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

कौन हर किसी की बाहें, बाहों में डाल ले
बाहों में डाल ले
जो नज़र को शाख लाए, वो ही सम्भाल ले
वो ही सम्भाल ले
दुनिया को हो औरों की धुन, हमको तो है साक़ी से काम

छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

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Jan 31, 2011

हुई शाम उन का ख़याल- मेरे हमदम मेरे दोस्त १९६८

आज गुलाम अली की एक मशहूर ग़ज़ल सुन रहा था -
"बिछड़ के भी मुझे तुझसे ये बदगुमानी है " , कि अचानक
यादों के ठीकरे इधर उधर फूटना शुरू हो गए और ठीकरों के
टुकड़ों ने मन को थोडा कुरेद दिया। दिमाग कितना भी भुलाना
चाहे मगर यादें लौट लौट कर आपको दुखाती अवश्य हैं।
कुछ लोग जोर का झटका धीरे से लगा के रवाना हो जाया
करते हैं तो कुछ हल्का सा झटका जोर से लगा कर। दोनों ही
स्तिथियों में मनाव मन को कष्ट अवश्य होता है । ठीकरे से
तुलना इसलिए कि गई क्यूंकि उन ख्यालों का स्वर अक्सर
एक सा ही होता है। ऐसे में एक गीत याद आया और वो आज
पेश-ए-खिदमत है। मजरूह के लाजवाब बोलों को दिल में
सनसनी पैदा करने वाली धुन से सजाया है संगीतकार
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने और गीत को रूह दी है रफ़ी ने।




गीत के बोल :


हुई शाम उन का ख़याल आ गया
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया

अभी तक तो होंठों पे था तबस्सुम का एक सिलसिला
बहुत शादमां थे हम उनको भुलाकर
अचानक ये क्या हो गया
कि चेहरे पे रंग-ए-मलाल आ गया

कि चेहरे पे रंग-ए-मलाल आ गया
हुई शाम उन का ख़याल आ गया

हमें तो यही था गुरूर गम-ए-यार है हम से दूर
वही ग़म जिसे हमने किस-किस जतन से
निकाला था इस दिल से दूर
वो चलकर क़यामात की चाल आ गया
वो चलकर क़यामात की चाल आ गया

हुई शाम उन का ख़याल आ गया
................................................
Hui shaam unka khayal-Mere humdum mere dost 1968

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Jan 14, 2011

क्या मिलिए ऐसे लोगों से-इज्ज़त १९६८

अजनबियों की भीड़ में नायक पहुँचता है। अजनबियों
के लिए वो जाना पहचाना है, बस वही एक बाकियों को
नहीं पहचानता। उन अजनबियों में से एक उसको भाई कह
कर पुकारती है । ऐसे मौके पर उससे गीत गाने की
गुज़ारिश की जाती है और वो अपने दिल की भड़ास गीत
के माध्यम से निकलता है। गीत के साथ शायद कोई
अंग्रेजी खेल हो रहा है जिसको हम फैंसी ड्रेस के नाम
से पुकारते हैं। इसमें आपको पुराने ज़माने की सब
विलायती नृत्य शैलियों का समावेश मिलेगा। आनंद
उठायें एक contrast वाले गीत का। सर में तेल की पूरी बोतल
बोतल चुपड़े हीरो को देखने का सौभाग्य आपको कम ही
ही फिल्मों में मिला होगा। वो ऐसा है की किरदार की मांग होगी
इसलिए निर्देशक ने नायक को काले रंग से भी पोत डाला है।




गीत के बोल:

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे,

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे,

खुद से भी जो खुद को छुपाये,
क्या उनसे पहचान करें,
क्या उनके दामन से लिपटें?,
क्या उनका सम्मान करें?,
जिनकी आधी नीयत उभरे,
आधी नीयत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

दिलदारी का ढोंग रचाकर,
जाल बिछाए बातों का,
जीते जी का रिश्ता कहकर,
सुख ढूंढें कुछ रातों का,
रूह की हसरत लाभ पर आये,
जिस्म की हसरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

जिनके ज़ुल्म से दुखी है जनता,
हर बस्ती हर गावों में,
दया धरम की बात करें वो,
बैठ के सजी सभाओं में,
दान का चर्चा घर घर पहुंचे,
लूट की दौलत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

देखें इन नकली चेहेरों की,
कब तक जय जय कार चले,
उजले कपड़ों की तह में,
कब तक काला संसार चले,
कब तक लोगों की नज़रों से,
छुपी हकीकत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे
...........................
Kya miliye aise logon se-Izzat 1968

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Jan 3, 2011

ओ नीले पर्बतों की धारा-आदमी और इंसान १९६९

आज का पहला गीत पेश है फिल्म आदमी और इंसान से।
साहिर के लिखे बोलों पर तर्ज़ बनाई है रवि ने। आशा और
महेंद्र कपूर इसको गा रहे हैं धर्मेन्द्र और सायरा बानो के लिए ।



गीत के बोल:

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला

फूल में जैसे फूल की खुशबू
दिल में है यूँ तेरा बसेरा
धरती से अम्बर तक फैला
चाहत की बाहों का घेरा

हो ओ ओ
ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला

सूरज पीछे घूमे धरती
साँझ के पीछे घूमे सवेरा
जिस नाते ने इन को बाँधे
वो नाता है तेरा मेरा

हो ओ ओ
ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

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Dec 19, 2010

आ जा तेरी याद आई-चरस १९७६

विलायत के नज़ारों वाला फिल्म चरस का गीत पेश है। इस गीत
की शुरुआत में गीतकार की आवाज़ है। जी हाँ ये भारी सी पंजाबी
लहजे वाली आवाज़ आनंद बक्षी की है। इन्होने कुछ फ़िल्मी गीत भी
गाये हैं । बाकी दो आवाजें आप बखूबी पहचानते हैं-लता और रफ़ी की।
परदे पर जो जोड़ी है वो श्रीमान देओल और श्रीमती देओल की है। ये
श्रीमान श्रीमती इस फिल्म के आने के बाद ही बने थे। प्रस्तुत गीत एक
सुपर हिट गीत है और अभी भी रेडियो पर नियमित रूप से बजता सुनाई
देता है।




गीत के बोल:

आनंद बक्षी: दिल इंसान का एक तराजू
जो इन्साफ को तोले
अपनी जगह पर प्यार है कायम
धरती अम्बर डोले
सब से बड़ा सच एक जगत में
भेद अनेक जो खोले
प्रेम बिना जीवन सूना
ये पागल प्रेमी बोले

लता :कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
ओ बालम हरजाई
कि आ जा तेरी याद आयी

रफ़ी:कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
ओ बालम हरजाई
कि आ जा तेरी याद आयी

लता: ज़ालिम कितनी देर लगा दी
तुमने आते आते
अब आये जो अब ना आते
तो हम जान से जाते
दिल दीवाना दीवाने को हम कैसे समझाते
देते राम दुहाई
कि आ जा तेरी याद आयी

रफ़ी: फुर्सत भी है मौसम भी है
मन है रंग रलियों में
छुप गयी है तू खुशबू बन के
शायद इन कलियों में
मैंने तुझको कितना ढूँढा आवारा गलियों में
यह आवाज़ लगाई
कि आ जा तेरी याद आयी

लता: मस्त हवा ने बात कोई
ऐसी कह दी कानों में
जैसे कोई मदिरा भर दे
खाली पैमानों में
तड़पा डाला आज मचलते दिल के अरमानों ने
रुत ने ली अंगडाई
कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
.......................................................
Aa jaa teri yaad aayi-Charas 1976

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