गीता दत्त की गायकी लाजवाब है और उनकी आवाज़ की आज तक
कोई डुप्लिकेट आवाज़ नहीं सुनने को मिली. डुप्लिकेट से मतलब
क्लोन से है. थोड़ी बहुत मीना कपूर की आवाज़ उनकी आवाज़ के
नज़दीक सुनाई देती थी, बस. इसके अलावा कोई भी महिला गायिका
उनकी गायकी के अंदाज़ के निकट नहीं पहुँच पाई.
प्रस्तुत गीत एक माइलस्टोन सॉंग है. फिल्म साहब बीवी और गुलाम
का ये गीत बेहतरीन दर्दीले गीतों में शामिल है. असहाय और कातर
से स्वर में नायिका पुकार रही है जिसका कि पुकारे जाने वाले पर
कोई असर नहीं हो रहा फिल्म में.
फिल्म से ये पांचवा गीत है ब्लॉग पर. इसके पहले आपको गीता के
गाये दो गीत और आशा के गाये दो गीत सुनवाए जा चुके हैं.
गीत के बोल:
जिया बुझा-बुझा नैना थके-थके
पिया धीरे-धीरे चले आओ
कोई दूर से आवाज़ दे, चले आओ
रात-रात भर इंतज़ार है
दिल दर्द से बेकरार है
साजन इतना तो ना तड़पाओ
चले आओ
कोई दूर से आवाज़ दे, चले आओ
आस तोड़ ,के मुख मोड़ के
क्या पाओगे साथ छोड़ के
बिरहन को अब यूँ ना तरसाओ,
चले आओ
कोई दूर से आवाज़ दे, चले आओ
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Koi door se awaaz de chale aao-Sahib Biwi aur Ghulam 1962
आपने ट्रेन के ऊपर वाला गीत देखा सुना अब सुनिए देखिये एक
रेल के डब्बे के अंदर वाला गीत. हास्य कलाकार राजेन्द्रनाथ के
साथ पता नहीं कौन अभिनेत्री इस गीत को गा रही हैं परदे पर.
मीना कुमारी और अशोक कुमार को तो मैं पहचान गया गीत
में.
गायक कलाकार हैं-रफ़ी और आशा भोंसले. मजरूह के लिखे इस
गीत की तर्ज़ बनाई है रोशन ने. हल्का फुल्का गीत है ये और
इसे कभी कभार रेडियो वाले बजा दिया करते हैं, वैसे इसे कई
सालों से रेडियो पर नहीं सुना है. कुछ शब्द ऐसे हैं इस गीत
में जिनका गंभीर शायरी में जिक्र होता है: बू-बास और दूसरा
है रंग-ओ-बू.
गीत के बोल:
न भंवरा न कोई गुल अकेला हूँ मैं तेरा बुलबुल
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ
मेरे जहाँ में रंग-ओ-बू कहीं पर हंसी कहीं आंसू
ये बता सौदाई मैं ये जिंदगी भुला दूं क्या
उल्फत की है यहाँ बू-बास मन में लगी लबों पर प्यास
मन में लगी लबों पर प्यास
चांदी सोना हो न हो दिल है अपने पास
मेरी दुनिया और हसीं है यहाँ दंगा शोर नहीं है
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ
न भंवरा न कोई गुल अकेला हूँ मैं तेरा बुलबुल
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ
तेरा जहाँ है जिसका नाम गम की सुबह दुखों की शाम
हो नो नो नो नो
मामूली सी बात पे लड़ना इसका काम
फिर भी ये सब हैं अपने मिलजुल कर देखें सपने
ये बता सौदाई मैं ये जिंदगी भुला दूं क्या
मेरे जहाँ में रंग-ओ-बू कहीं पर हंसी कहीं आंसू
ये बता सौदाई मैं ये जिंदगी भुला दूं क्या
न भंवरा न कोई गुल अकेला हूँ मैं तेरा बुलबुल
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ
.....................................................................
Na bhanwra na koi gul-Aarti 1962
सदाबहार शब्द जब मैंने पहली बार सुन था तब कुछ
ऐसा लगा जैसे किसी ताज़ी सब्जी की बात हो रही हो,
या हरियाली की. बहार शब्द को हरियाली से जोड़ के
देखा करते थे. शब्द सीखने का अधिकांश लोगों का
तरीका एक सा होता है. कुछ शब्द किसी घटना या
प्रसंग विशेष की याद दिलाते हैं.
आपको आज एक सदाबहार युगल गीत सुनवाते हैं जो
फिल्म आरती से लिया गया है. इसे लता और रफ़ी ने
गाया है. प्रदीप कुमार औए मीना कुमारी अभिनीत इस
फिल्म के गाने ज़बरदस्त हिट हैं. मजरूह सुल्तानपुरी
के लिखे गीत हैं और संगीत रोशन का. गीत की धुन
काफी आकर्षक है और इसे आसानी से गुनगुनाया भी
जा सकता है.
गीत के बोल:
बार बार तोहे क्या समझाये
बार बार तोहे क्या समझाये पायल की झनकार
तेरे बिन साजन लागे ना जिया हमार
चुप चुप के करता हैं इशारें चंदा सौ सौ बार
आ तोहे सजनी ले चलूँ नदियाँ के पार
चलते चलते रुक गये क्यों सजन मेरे
मिलते मिलते झुक गये क्यों नैन तेरे
झुके झुके नैना करते हैं तुमसे ये इकरार
तेरे बिन साजन लागे ना जिया हमार
दरिया ऊपर चांदनी आई संभल संभल
इन लहरों पर मन मेरा गया मचल मचल
एक बात कहता हूँ तुमसे ना करना इन्कार
आ तोहे सजनी ले चलूँ नदियाँ के पार
ना बीते ये रात हम मिलते ही रहे
बस तारों की छाँव में चलते ही रहे
नाम तेरा ले ले कर गाये धड़कन का हर तार
तेरे बिन साजन लागे ना जिया हमार
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Baar baar tohe kya samjhaye-Aarti 1962
गीत सुनते सुनते ये मुश्किल होने लगती है किस के गीत सुनो. सब एक से बढ़ कर एक कलाकार हैं. बहुत दिन हुए हेमंत कुमार का कोई गीत सुने. आइये फिर हो जाए एक गीत फिल्म एक ही रास्ता से जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है और संगीत भी हेमंत कुमार का ही है. शुरूआती बोलों के बाद आपको लाता की आवाज़ सुनाई देगी.
एक बात हेमंत कुमार की गायकी से जुडी हुई है वे कैसा भी गीत गायें, एक दैवीय सा आभास ज़रूर होता है उनके गायन में. दैवीय से मेरा मतलब यहाँ अंग्रेजी शब्द-Divinity से है. उनकी गायकी को आप हलके फुल्के नहीं आंक सकते. भारी आवाज़ के साथ साथ उनके गायन में गंभीरता भी है और उनका संगीत भी सरल और मधुर है. हिंदी फिल्म संगीत के क्षेत्र में उन्होंने भी कई झंडे गाडे हैं-नागिन, बीस साल बाद, और भी कई फ़िल्में हैं जिन पर जिक्र हम करेंगे जैसे जैसे इस ब्लॉग का कारवां आगे बढ़ता जायेगा.
इस फिल्म से आपको एक सुनवा चुके हैं पहले, चाहें तो उसे भी देख लें.-चली गोरी पी से मिलन को चली. गीतों में इतनी ताजगी है कि आज भी सुनो तो ऐसा लगता है अभी तैयार किये गए हों.
गीत के बीच में छोटे से बच्चे की प्रार्थना है ईश्वर से,
गीत के बोल:
भोला बचपन दुखी जवानी लंबी सूनी राहों में निकले दर्द लिए मंजिल का दो खामोश निगाहों में कौन कहे राही को कितनी दूर कहाँ तक जाना है जीवन की सूनसान डगर में कब तक ठोकर खाना है
सो जा नन्हे मेरे तू तो सो जा
तू तो सो जा
सो जा नन्हे मेरे तू तो सो जा
तू तो सो जा
जागने को पड़े हैं अभी दिन तेरे
तू तो सो जा
सो जा नन्हे मेरे तू तो सो जा
तू तो सो जा
लौट के फिर न आयेंगे बचपन के दिन
लौट के फिर न आयेंगे बचपन के दिन
खो जा सपनों में तू मेरे आंसू न गिन
तेरा नन्हा सा दिल मेरा गम क्यूँ करे
तू तो सो जा
सो जा नन्हे मेरे तू तो सो जा
तू तो सो जा
मेरा साथी छूटा मेरी किस्मत लुटी
मेरा साथी छूटा मेरी किस्मत लुटी
आंसुओं की तो अब है मेरी जिंदगी
जागना मेरी तकदीर है बावरे
तू तो सो जा
सो जा नन्हे मेरे तू तो सो जा
तू तो सो जा
सो जा नन्हे मेरे तू तो सो जा
तू तो सो जा
…………………………………………………………… Bhola bachpan dukhi jawani-Ek hi rasta 1956
हिंदी सिनेमा का एक और मील का पत्थर जिसका नाम है साहब बीबी और गुलाम. मीना कुमारी, गुरु दत्त और वहीदा रहमान इन तीनों के कैरियर के लिए ये फिल्म अहम साबित हुई. बिमल मित्रा के इसी नाम से पब्लिश हुए उपन्यास पर आधारित इस फिल्म का निर्माण हुआ था. इसका स्क्रीनप्ले अबरार अलवि ने तैयार किया था जिन्होंने फिल्म निर्देशित भी की. वैसे आपको फिल्म पर गुरु दत्त के निर्देशन की छाप नज़र आएगी.
फिल्म के कैमरामैन वी. के. मूर्ती ने कमाल की सिनेमाटोग्राफी की है. मूर्ती को हिंदी सिनेमा के कई नायब रत्नों जिन्हें हम मास्टरपीस कहते हैं से जुड़े होने का सौभाग्य प्राप्त है. गुरुदत्त के बैनर के बाहर उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं कमाल अमरोही की पाकीज़ा और रज़िया सुल्तान. फिल्म रज़िया सुल्तान का गीत-ऐ दिल-ए-नादान आपको अवश्य याद होगा जो फ़िल्मी गीतों के इतिहास में एक मील का पत्थर है.
आइये सुना जाए गीता दत्त की आवाज़ में एक दर्द भरा गीत फिल्म साहब बीबी और गुलाम से. गीत शकील बदायूनी का है और संगीत हेमंत कुमार का.
गीत के बोल:
न जाओ सैय्याँ, छुड़ा के बैय्याँ कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी मचल रहा है सुहाग मेरा जो तुम ना होगे, तो क्या करूँगी
ये बिखरी ज़ुल्फें, ये खिलता गजरा ये महकी चुनरी, ये मन की मदिरा ये सब तुम्हारे लिए है प्रीतम मैं आज तुम को ना जाने दूँगी, जाने ना दूँगी
न जाओ सैय्याँ, छुड़ा के बैय्याँ कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी
मैं तुम्हारी दासी, जनम की प्यासी तुम ही हो मेरा सिंगार प्रीतम तुम्हारे रस्ते की धूल ले कर मैं मांग अपनी सदा भरूँगी, सदा भरूँगी
न जाओ सैय्याँ, छुड़ा के बैय्याँ कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी
जो मुझसे अँखियाँ चुरा रहे हो तो मेरी इतनी अरज भी सुन लो तुम्हारे चरणों में आ गयी हूँ यहीं जिऊँगी, यहीं मरूँगी, यहीं मरूँगी
न जाओ सैय्याँ, छुड़ा के बैय्याँ कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी ………………………………………………… Na jao saiyan chhuda ke baiyan-Sahib biwi aur ghulam 1962
अरसे बाद एक मित्र से मुलाक़ात हुई एक हॉस्पिटल में । बहुत दिनों बाद मिले तो वे कुछ भावुक और कुछ हॉस्पिटेबल से हो उठे। उनका हॉस्पिटल में हॉस्पिटेबल होना कुछ अनूठा सा लगा। अस्पताल के कैंटीन में वे चाय और समोसे के लिए आग्रह करने लगे। ज्ञात हो वे अपनी तरफ से आग्रह वैसे भी कम किया करते थे और हम लोगों से आग्रह की अपेक्षा रखने वालों में से एक थे। ये उन दिनों की बात है जब हम लोग एक शैक्षणिक संस्था में कुछ क्षण के लिए ज्ञान के छींटे और अनुभव बटोरने जाया करते थे। हमने भी कुछ पुराने ज़माने का उधार वसूलने वाले अंदाज़ में ४ समोसे डकार लिए जो सामान्य व्यक्ति और बीमार दोनों के लिए समान रूप से उपयुक्त लगते थे स्वाद में। बस, ताज़े बने हुए थे इसलिए हम उसे पूड़ी-सब्जी वाले अंदाज़ में खा गए। उसके बाद हैं थोड़ी सी शर्म अवश्य आई इस बात को ले कर कि अस्पताल में हम मरीज़ के हाल-चाल जानने के बजाये पेट भरने का कार्य कर रहे हैं। शायद ये भाव जो मन में उपजा वह हमारे मित्र कि अंतरात्मा से निकले स्वर की वजह से हुआ हो:अरे यार ऐसे ठूंस रहे हो जैसे जन्म जन्मांतर से भूखे हो। उनके चेहरे पर समोसे खाने की प्रक्रिया के बाद हॉस्पिटलिटी वाले भाव नदारद थे और जो भाव थे उनको देख के हमारे मन में “पिटी” वाले भाव उभारना शुरू हो गए।
हुआ यूँ वे अपने किसी बीमार मित्र को देखने वहां आये हुए थे । बीमार शब्द से याद आया–बीमा+मार । हर एक को बीमा अवश्य करवा लेना चाहिए। कम से कम वो बीमारी की मार(इलाज़ का खर्चा)से तो कुछ हद तक बचेगा।
आइये आपको अस्पताल की पृष्ठभूमि पर बना एक गीत सुनवाते हैं। इस गीत में भी आपको अस्पताल के कुछ हिस्से दिखलाई दे जायेंगे। नायक एक्स रे की फिल्म देखते देखते अतीत की सुनहरी यादों में खो खो जाता है। फिल्म की कहानी अस्पताल में घूमती है। अभी तो फिल्म के नायक नायिका खुशनुमा से गीत में खुश दिखायी दे रहे हैं। आगे आने वाले गीतों में हम चर्चा करेंगे फ़िल्मी अस्पताल के बारे में।
गीत है फिल्म दिल एक मंदिर से जिसमें राजेंद्र कुमार और मीना कुमारी एक रोमांटिक गीत में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसे लिखा है हसरत जयपुरी ने और इसकी धुन बनाई है शंकर जयकिशन ने।
गीत के बोल:
यहाँ कोई नहीं तेरा मेरे सिवा कहती है झूमती गाती हवा तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
बादल भी बन के पानी एक दिन तो बरसता है लोहा भी जल के आग में एक दिन तो पिघलता है जिस दिल में हो मोहब्बत एक दिन तो तडपता है
यहाँ कोई नहीं तेरा मेरे सिवा कहती है झूमती गाती हवा तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
तेरे मन की उलझनें सुलझाना चाहता हूँ तुझे आज से अपनी मैं बनाना चाहता हूँ मन के सुनहरे मंदिर में बिठाना चाहता हूँ
यहाँ कोई नहीं तेरा मेरे सिवा कहती है झूमती गाती हवा तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ ........................................... Yahan koi nahin tera mere siwa-Dil ek mandir 1963
मजरूह के लिखे संवेदना को झंझोड़ने वाले गीतों में से एक है फ़िल्म गोमती के किनारे से लता मंगेशकर का गाया हुआ ये गीत। मीना कुमारी
की इस अन्तिम फ़िल्म का निर्देशन सावन कुमार टाक ने किया था, जनता
को देखने को नहीं मिली। अब ज़रूर इस फिल्म की सी डी, डी वी डी मिलने
लगी है। मौका मिले तो एक बार अवश्य देखिएगा इसे।
लखनऊ शहर गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है. इस फिल्म की कथा
कुछ कुछ यही इंगित करती है कि इस शहर की ही एक कहानी है ये.
लखनऊ की संस्कृति से मुजरा शब्द अछूता नहीं रहा कभी। तवायफ़ और
उनके नृत्य संगीत इत्यादि पर प्रकाश डालता जनादेश का एक लेख ज़रूर
पढ़ें- पहले बदनाम, फिर गुमनाम
गीत आदम जात के दोमुंहेपन पर करारा तमाचा सा है। आदमी के नंगेपन
की इन्तेहा ये है कि वो जिस जगह से इस नश्वर संसार में प्रकट होता है,
सयाना होने पर बार बार वहीँ जाना चाहता है। प्रकट होने के वक्त के कष्ट
को वो भूल कर उन गलियारों में वो आनंद ढूँढने लगता है। हवस के अन्धों
को रिश्ते, समाज रीति-रिवाज सब दिखलाई देने बंद हो जाते हैं। अपना
खुद का घर तो ऐसे लोगों का अपवाद होता है और वे पैसे के बल पर घर
से बाहर कोई भी बदतमीजी करने के लिए स्वतन्त्र होते हैं। मर्यादा और
परंपरा की दुहाई देने वाले बाहर निकल कर खुद अनियंत्रित और अमर्यादित
हो जाते हैं । सामाजिक ढांचे को सबसे ज्यादा क्षति साधन समर्थ और संकीर्ण
मानसिकता वाले लोग पहुंचाते हैं। गीत के अंतिम अंतरे में इसी बात पर
गौर किया गया है।
कोठे पर बैठे कलाकारों में आप आई. एस. जौहर को आसानी से पहचान
पाएंगे।
गाने के बोल:
आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा
आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
लुटे यहाँ चमन अंधेरों ने
बिके यहाँ बदन अंधेरों में
लुटे यहाँ चमन अंधेरों ने
बिके यहाँ बदन अंधेरों में
भूली भटकी इस बस्ती में, हो ओ ओ
रूप की चांदी रात के सोने का व्यापार है सारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा
आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
सोचा कभी मैं भी हूँ एक इंसान भी
मैं भी कभी बहन भी हूँ कभी माँ भी
सोचा कभी मैं भी हूँ एक इंसान भी
मैं भी कभी बहन भी हूँ कभी माँ भी
तुम तो प्यासी प्यासी ऑंखें ले के, हो ओ ओ
करने को आये मेरे लबों पर मेरे लहू का नज़ारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा
आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
सबको गुनाहों में मगन देखा
देखा शरीफों का चलन देखा
सबको गुनाहों में मगन देखा
देखा शरीफों का चलन देखा
सबकी इनायत हाय देखी मैंने, हो ओ ओ
मेरे ही दिल के टुकड़े को मेरा आशिक कह कर पुकारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा
..................................
Aaj to meri hansi udaai-Gomti ke kinare 1972
साहिर का है अंदाज़-ए-बयां और। ख़वातीनों हाज़रात, महबूब से किनारा करने का खुशनुमा ख्याल और किस के दिमाग में आ कर कागज़ पर उतर सकता है। किनारा करने की बात पर रज़ामंदी मांगी जा रही है, समाज की बंदिशें या फिर कोई और वजह ऐसा करने को प्रेरित कर रही हैं जानने के लिए आपको बहू बेगम फिल्म एक बार ज़रूर देखना पड़ेगी।
साहिर के गीतों से फिल्म के निर्देशक का काम कभी कभी बहुत आसान हो जाया करता था। आम दर्शक तो धुन से ही आनंद उठा लिया करता लेकिन दिमाग खपाने वाले दर्शक गीत की गहराई में उतर कर नायक की करतब-ए-एक्टिंग को गीत के शब्दों और भावों से मिलाने की असफल कोशिश में लग जाते। साहिर के गीतों पर कुछ ही संजीदा कलाकारों ने बढ़िया अभिनय किया है।
कमबख्त दिल तो मानता नहीं है क्या किया जाये, इश्क की खुमारी दिल पर झाड फानूस की धूल माफिक चिपकी रहती है, कुछ करने या ना करने की जायज़ वजहें होना ज़रूरी है। अब जुदा हो ही रहे हैं तो सारे अरमान पूरे करते चलें और ये जुमला दोहराते चलें-किनारा कर लें।
प्रेम त्रिकोण पर आधारित इस फिल्म में कई यादगार गीत हैं। ये गीत थोड़ा कम सुना जाता है और गीतों की तुलना में। गीत मधुर है इसलिए हमने इसे पहले चुना है सुनने के लिए।
गीत के बोल:
लोग कहते हैं कि हम तुमसे किनारा कर लें तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें लोग कहते हैं
तुमने जिस हाल-ए-परेशानी से निकला था हमें आसरा दे के मोहब्बत का संभाला था हमें सोचते हैं के वही सोचते हैं के वही हाल दुबारा कर लें तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें लोग कहते हैं
यूँ भी अब तुमसे मुलाक़ात अब नहीं होने की मिल भी जाओ मिल भी जाओ तो कोई बात नहीं होने की आखिरी बार बस अब आखिरी बार बस अब जिक्र तुम्हारा कर लें तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें लोग कहते हैं
आखिरी बार ख्यालों में बुला लें तुमको आखिरी बार कलेजे से लगा लें तुमको और फिर अपने तड़पने और फिर अपने तड़पने का नज़ारा कर लें तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें
लोग कहते हैं कि हम तुमसे किनारा कर लें तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें लोग कहते हैं ..................... Log kehte hain ki hum-Bahu Begum 1967
आपको फिल्म फुटपाथ के दो गीत हम सुनवा चुके हैं अब तक।
फुटपाथ का अर्थ है पैदल चलने वालों के लिए रास्ता। सड़क वाहनों के लिए बनाई जाती है, मगर हमारे देश में आपको दुपहिया वाहन चालक फुटपाथ का उपयोग और पैदल चालक सड़क का दुरूपयोग करते हुए मिल जायेंगे। आधुनिक परिभाषा है इसकी-अतिक्रमित सार्वजनिक स्थान जिसका सब्जी बेचने वाले से लेकर पंचर जोड़ने वाले तक सभी सामान रूप से अपनी पैतृक संपत्ति समझ के उपयोग करते हों। छोटे बच्चे इसको अपनी तोतली भाषा में फूट-फाट भी कहते हैं, जी हाँ वही स्थान जो सडक के किनारे थोड़ा ऊंचा सा एक पट्टी जैसा सड़क के साथ साथ दूर तक बना हुआ दिखाई देता है। कुछ फुटपाथों की दुर्दशा देख कर लगता हैं बच्चे इसको सही रूप में पहचान लेते हैं जो हम जैसे मूढ़ मति इतना ज्ञान बटोर कर भी नहीं कर पाते।
खैर फिल्म फुटपाथ में फुटपाथ का कितना उपयोग हुआ ये मुझे समझ नहीं आया। फिल्म का तीसरा गीत सुनते हैं जो अपने समय के लिहाज़ से काफी बोल्ड गीत है। मीना कुमारी इस गीत में आपको संगीतमय स्नान करती दिखाई देंगी। आशा भोंसले की आवाज़ है, मजरूह के बोल हैं और संगीत एक बार फिर से ख़य्याम साहब का। ये गीत वैसे हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध स्नान गीतों की श्रेणी में नहीं आता है।
गीत के बोल:
कैसा जादू डाला रे बलमा ना जाने खड़े खड़े मचले रे सैयां नहीं माने
कैसा जादू डाला रे बलमा ना जाने खड़े खड़े मचले रे सैयां नहीं माने
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
कैसा जादू डाला रे बलमा ना जाने खड़े खड़े मचले रे सैयां नहीं माने
गीत के बाकी बोल की ज़रुरत महसूस करें तो एक चटका लगा के ब्लॉग को धन्य करें।
कुछ गीत बचपन की यादों से जुड़े होते हैं तो कुछ के साथ पचपन की उम्र जुडी होती है। आज की पीढ़ी के हिसाब से ये गीत काफी बुज़ुर्ग गीत है । एक पडोसी चौबे जी जो बनारस निवासी थे, अक्सर अपने माइके(उनका पैतृक घर बनारस में था) जाया करते। उनकी बीवी थी जौनपुर की, मगर वो अपने माइके जाने को उतनी उत्सुक नहीं होती जितने कि चौबे जी। चौबे जी के जाते ही उनकी श्रीमती बात बात में उल्लेख करतीं-वो घर गए हैं, वो बनारस गए हैं, वो यू. पी. गए हैं, इत्यादि।
वे जब जब जाते, हम लोग ऊंचे सुर में ये गाना गाया करते- जा री जा री ओ कारी बदरिया.................उत्तर प्रदेश गए हैं सांवरिया.......
खैर ये तो एक प्रसंग हुआ, गीत के बारे में बात की जाये। फिल्म आज़ाद का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ और ये फिल्म के सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक है। मीना कुमारी पर फिल्माए और लता द्वारा गए इस गीत के रचयिता हैं-राजेंद्र कृष्ण और संगीत दिया है सी रामचंद्र ने। गीत के सभी उपलब्ध विडियो पर टेल पड़े हुए हैं यू ट्यूब पर, अतः संगीतकार सी रामचंद्र की फोटू देख देख कर ही गीत का आनंद उठा लीजिये।
गीत के बोल:
जा री जा री ओ कारी बदरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी नगरिया परदेस गए हैं सांवरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया
कहे धीरे धीरे शोर मचाये री कहे धीरे धीरे शोर मचाये री मेरा नरम करजवा जलाये री मेरा नरम करजवा जलाये री मेरा मनवा जले, कोई बस ना चले मेरा मनवा जले, कोई बस ना चले हाय तक तक के सूनी डगरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी नगरिया परदेस गए हैं सांवरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया
जइयो जइयो री देश पिया के जइयो जइयो री देश पिया के कहियो दुखड़े तू मेरे जिया के कहियो दुखड़े तू मेरे जिया के कहियो छम छम रोये, अखियाँ न सोये कहियो छम छम रोये, अखियाँ न सोये हुई याद में पी की बाँवरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी नगरिया परदेस गए हैं सांवरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया जा री जा री ओ कारी बदरिया ....................................... Ja ri ja ri o kari badariya-Azaad 1955
शमशाद बेगम की स्पष्ट और गूँज भरी आवाज़ के संगीत प्रेमी कायल हैं। एक अमर युगल गीत सुनिए किशोर कुमार और शमशाद बेगम की आवाज़ में। किशोर कुमार और मीना कुमारी पर फिल्माए गए इस गीत के हजारों दीवाने हैं और आज भी उत्ब्ने ही चाव से इसे सुनते हैं जितने चाव से वे फिल्म की रिलीज़ के आस पास सुना करते थे। अब तो साधन बहुत हो गए हैं गीत सुनने के इसलिए पुराने गीतों को अपनी पसंद अनुसार सुनना आसान हो गया है। ये एक goose bump पैदा करने वाला गीत है।
गीत के बोल:
किशोर: मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम
शमशाद: मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन मेरी नज़रों ने तुझ को लिया आज चुन मन की बिना की धुन, तू बालम आज सुन मेरी नज़रों ने तुझ को लिया आज चुन मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन
शमशाद: मेरी दिल की लगी तू, मेरी जिंदगी तू मेरी हर नज़र है तेरी दास्ताँ मेरी दिल की लगी तू, मेरी जिंदगी तू मेरी हर नज़र है तेरी दास्ताँ
किशोर: मेरे दिल की बहारें तुम्ही को पुकारें तुम्ही से है आबाद मेरा जहां मेरे दिल की बहारें तुम्ही को पुकारें तुम्ही से है आबाद मेरा जहां
शमशाद: तू मेरा नाज़ है, मेरा अंदाज़ है, दिल की आवाज़ है
किशोर: मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम
शमशाद: मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन मेरी नज़रों ने तुझ को लिया आज चुन मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन मेरी नज़रों ने तुझ को लिया आज चुन मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन
शमशाद: दिल पे छाई ख़ुशी है लबों पर हंसी है खिली है तेरे प्यार की चांदनी किशोर: घूमती है निगाहें नशा छा रहा है के दिल गा रहा है तेरी रागिनी शमशाद: होले होले सजन मेरा कहता है मन अब तो लागी लगन
किशोर: मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम शमशाद: मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन
शमशाद: तुम मेरे हो गए हो तो ये चाँद तारे ये सारे नज़ारे मेरे हो गए किशोर: दिल हुआ है दीवाना समा है सुहाना कहें क्या तेरे प्यार में खो गए शमशाद: रात गाने लगी गुनगुनाने लगी नींद छाने लगी
किशोर: मेरी नींदों में तुम, मेरे ख़्वाबों में तुम हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम
शमशाद: मन की बीना की धुन, तू बालम आज सुन ........................................ Meri neendon mein tum-Naya Andaz 1956
हिंदी फिल्म संगीत का खज़ाना अजब गज़ब लोरियों से भरा पड़ा है।
अधिकतर लोकप्रिय लोरियां आपको पुरानी फिल्मों में ही मिलेंगी।
बॉलीवुड का मानना है कि फ़िल्मी बच्चे बड़े हो गए हैं अतः इस ज़माने
में लोरियों की आवश्यकता नहीं है। आजकल लोरी की जगह दूसरे किस्म
के गानों ने ले ली है। उदाहरण के लिए बच्चे बड़े हो गए हैं और शायद
आईटम-सोंग ज्यादा देखना सुनना पसंद करते हैं।
मीठी और मधुर खुशनुमा लोरियां आपने बहुत सुनी होंगी। एक
दुःख भरी लोरी भी सुनिए जो फिल्म फुटपाथ में है। ये सन १९५३
कि फिल्म है. दुःख भरी लोरी गा कर बच्चे को सुलाना बहुत ही
कठिन कार्य है जो आप महसूस करेंगे इस गीत में। गीत फिल्माया
गया है मीना कुमारी पर। गीत लिखा है मजरूह ने और इसकी
धुन बनाई है खय्याम ने। आंसुओं में भीगी लोरी गाने वाली गायिका
हैं आशा भोंसले।
गीत के बोल:
सो जा मेरे प्यारे
सो जा सो जा
सो जा मेरे प्यारे
सो जा सो जा
अंखियों के तारे
सो जा सो जा
अंखियों के तारे
सो जा सो जा
रात सुहानी चंदा गाये
मीठी मीठी निंदिया आये
रात सुहानी चंदा गाये
मीठी मीठी निंदिया आये
राजदुलारे नैनन तारे सो जा
सो जा मेरे प्यारे
सो जा सो जा
अंखियों के तारे
सो जा सो जा
आहों की फ़रियाद की दुनिया
ये दुनिया बेदाज की दुनिया
आहों की फ़रियाद की दुनिया
ये दुनिया बेदाज की दुनिया
तेरी दुनिया चाँद सितारे सो जा
सो जा मेरे प्यारे
सो जा सो जा
सो जा मेरे प्यारे
सो जा सो जा
..........................................................
So ja mere pyare-Footpath 1953
इसके मुखड़े के बोल पढ़ के तीन देवियाँ के गाने की
गलतफ़हमी हो जाती है। वो गीत रफ़ी का गाया एकल
गीत था जबकि प्रस्तुत गीत सुमन और रफ़ी का गाया
युगल गीत है। कालिदास के निर्देशन में बनी फिल्म
भीगी रात का संगीत अच्छा है। हमारी कोशिश है
की आपको पहले कम प्रचलित और कम सुने गए गीत
सुनवाए जाएँ ताकि आपको कुछ अतिरिक्त जानकारी मिलती
रहे। रईसी वाला गीत है। नायक नायिका कार में बैठ
के घूमने निकले है और गीत भी गाते हैं। गीत के
नीचे आपको एक कमेन्ट मिलेगा-grossly underrated for
obvious reasons- इस तरह की टिप्पणियों से अर्थ निकलना
बड़ी टेढ़ी खीर होता है। या तो लिखने वाला ये कहना
चाहता है कि रफ़ी और सुमन के गाये युगल गीत लता-रफ़ी
के गाये युगल गीतों की तुलना में कमतर आंके जाते हैं
या उसका इशारा दूसरे संगीतकारों और रोशन के
संगीत में तुलना से है। फिलहाल सम्भावना पहले कारण
की ज्यादा नज़र आ रही है। सुमन को प्रथम श्रेणी की
गायिका मानने से कई संगीत प्रेमी इनकार जो करते हैं
सीधी वजह उनकी आवाज़ लता की आवाज़ के सबसे निकट
होना। खैर ये तुलना वुलना का चक्कर छोड़ें और सुनें इस
मधुर गीत को।
भीगी रात के पिछले गीत में नायिका रूठी हुई थी। इसमें थोड़ी
खुश नज़र आ रही है और कुछ खिसियाने अंदाज़ में नायक के
साथ गीत गाना शुरू करती हैं-जैसे कहना चाह रही हों-"शर्म से
यहीं गड़ जाएँ ना कहीं हम" !!
गीतकेबोल:
ऐसे तो ना देखिये के बहक जाएँ कहीं हम
आखिर को एक इंसान हैं फ़रिश्ता तो नहीं हम
हाय, ऐसी ना कहो बात के मर जाएँ यहीं हम
आखिर को एक इंसान है फ़रिश्ता तो नहीं हम
अंगडाई सी लेती है जो ख़ुशबू भरी जुल्फें
ख़ुशबू भरी जुल्फें
गिरती हैं तेरे सुर्ख लबों पर तेरी जुल्फें
लबों पर तेरी जुल्फें
जुल्फें ना तेरी चूम लें
जुल्फें ना तेरी चूम लें ऐ माहजबीं हम
आखिर को एक इंसान हैं फ़रिश्ता तो नहीं हम
आ हा हा, आ आ आ आ आ, हं हं हं हं हं
सुन सुन के तेरी बात नशा छाने लगा है
नशा छाने लगा है
खुद अपने भी प्यार तो कुछ आने लगा है
है ऐ ऐ, आने लगा है।
रखना है कहीं पाँव तो
रखना है कहीं पाँव तो रखते हैं कहीं हम
आखिर को एक इंसान है फ़रिश्ता तो नहीं हम
भीगा सा ये रुख-ए-नाज़ ये हल्का सा पसीना
ये हल्का सा पसीना
हाय
ये नाचती आँखों के भंवर दिल का सफीना
दिल का सफीना
सोचा है के अब डूब के
सोचा है के अब डूब के रह जाएँ यहीं हम
आखिर को एक इंसान हैं फ़रिश्ता तो नहीं हम
हाय, ऐसी ना कहो बात के मर जाएँ यहीं हम
आखिर को एक इंसान हैं फ़रिश्ता तो नहीं हम
आ हा हा, आ आ आ आ आ, हं हं हं हं हं
हं हं हं हं हं हं हं
......................................................................
Aise to na dekhiye ke behak jayen-Bheegi Raat 1965
रोशन ने अपने कैरियर के उत्तरार्ध में गीत की ध्वनियों में हल्का ईको प्रभाव का काफी प्रयोग किया। ये अक्सर गायक की आवाज़ के लिए प्रयोग में लायी जाती। कुछ गीतों में वाद्य यन्त्र के साथ भी इसका प्रयोग हुआ है मगर सुनने वाले का ध्यान वाद्य यन्त्र के साथ हुए खिलवाड़ पर कम जाता है इसलिए उसको अभी नज़रअंदाज़ कर के चलते हैं।
रफ़ी के गाये रोमांटिक गीतों के सृजन कर्ताओं में केवल ओ पी नय्यर और शंकर जयकिशन ही नहीं बल्कि रोशन भी शामिल हैं। ये गीत लिखा है मजरूह ने और इसे रुपहले परदे पर गा रहे हैं प्रदीप कुमार । साथ में जो अभिनेत्री हैं वो मीना कुमारी हैं।
गीत के बोल:
मोहब्बत से देखा खफा हो गए हैं हसीं आज कल के खुदा हो गए हैं हसीं आज कल के खुदा हो गए हैं
अदाओं में थी सादगी अब से पहले हो ओ ओ, अदाओं में थी सादगी अब से पहले वल्लाह कहाँ रंग थे ये सुनहरे रुपहले हो ओ ओ नज़र मिलते ही नज़र मिलते ही क्या से क्या हो गए हैं हसीं आज कल के खुदा हो गए हैं
किसी मोड़ पे बन के सूरज निकलना हो ओ ओ, किसी मोड़ पे बन के सूरज निकलना तौबा कहीं धुप में चाँदनी बन के चलाना हो ओ ओ जिधर देखो जलवा जिधर देखो जलवानुमां हो गए हैं हसीं आज कल के खुदा हो गए हैं
यहाँ तो लगा दिल पे एक ज़ख्म गहरा हो ओ ओ, यहाँ तो लगा दिल पे एक ज़ख्म गहरा हाय वहां सिर्फ उनका ये अंदाज़ ठहरा हो ओ ओ खता कर के भी खता कर के भी बे-खता हो गए हैं
हसीं आज कल के खुदा हो गए हैं ........................................................ Mohabbat se dekha khafa ho gaye-Bheegi Raat 1965
शायद फिल्म का शीर्षक किसी मोहतरमा से मुखातिब है कि ऐसी खटारा फिल्म देखने 'अकेली मत जइयो'। फिल्म के बारे में आपको जानकारी तब मिल पायेगी जब आप इसको देखेंगे। आप इसको तब देखेंगे जब इसकी सी. डी. वगैरह आपको मिलेगी। उस झमेले में मत पढिये, बस इस फिल्म के गाने सुनते जाइये। फिल्म में २-३ गाने सुनने लायक हैं और आपको तमाम संगीतकारों की स्टाइल का मज़ा देंगे देंगे। गीत के इंटरल्युड्स आपको अरेबियन संगीत का मज़ा देंगे।
गीत के लेखक हैं मजरूह और संगीत है मदन मोहन का, जो कि सुनने वालों का मानना है मदन मोहन के अंदाज़ से अलग है। मदन मोहन और मजरूह ने गिनती की फिल्मों में साथ साथ काम किया है जिनमे से एक फिल्म है 'दस्तक' जिसके लिए मदन मोहन को राष्ट्रिय पुरस्कार मिला था ।
गीत फिल्माया गया है मीनू मुमताज़ पर, जो इस फिल्म में सहायक कलाकार हैं और गीत में मीना कुमारी, राजेंद्र कुमार भी मौजूद हैं जो हीरो हीरोइन हैं। मुझे कभी कभी गीतों में दिखाई देने वाली भीड़ के बारे में जानने की उत्सुकता जागृत हुआ करती है, इतने सारे कलाकार जो दिखलाई देते हैं उनके नाम मालूम करना टेडी खीर है। कभी कभी कुछ चेहरे पहचान लिए जाते हैं तो कभी नायक नायिका भी पहचान में नहीं आते। ये गीत एक 'कैब्रे ' गीत है। जी हाँ, एक फिल्म के पोस्टर पर मैंने 'कैबरे' शब्द को इसी अंदाज़ में लिखा देखा देखा था। पहले ज़माने में लिखाई के लिए नील का इस्तेमाल होता था और चूने से पुते हुए टाट पर विवरण लिखा जाता था।
गीत के बोल:
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ मेरे दिल, मेरी साँसों, में खो जाओ मेरे प्यार की छांव में खो जाओ मिले फिर न मिले कभी हम, हाय
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ मेरे दिल, मेरी साँसों, में खो जाओ मेरे प्यार की छांव में खो जाओ मिले फिर न मिले कभी हम, हाय थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ
ले रात कोई अंगडाई बच जाए मेरी तन्हाई ले रात कोई अंगडाई बच जाए मेरी तन्हाई दिल मेरा लगे किस्मत जगे यूँ बैठे अदा से मुस्काओ, हाय
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ मेरे दिल, मेरी साँसों, में खो जाओ मेरे प्यार की छांव में खो जाओ मिले फिर न मिलें कभी हम, हाय
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ
बन जाऊं शमा महफ़िल की खिड़की तो खुले कोई दिल की बन जाऊं शमा महफ़िल की खिड़की तो खुले कोई दिल की घर सूना सूना दर सूना सूना तुम्हीं एक चिराग जलाओ, हाय
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ मेरे दिल, मेरी साँसों, में खो जाओ मेरे प्यार की छांव में खो जाओ मिले फिर न मिले कभी हम, हाय
थोड़ी देर के लिए मेरे हो जाओ मेरे दिल, मेरी साँसों, में खो जाओ मेरे प्यार की छांव में खो जाओ मिले फिर न मिले कभी हम, हाय
आइये आपको एक मधुर गीत सुनवाया जाए जो १९५८ की फिल्म सवेरा से लिया गया है। संगीतकार शैलेश का नाम शायद आपने न सुना हो। उन्होंने फिल्म आग में राम गांगुली के संगीत निर्देशन में एक गीत गाया है-देख चाँद की और। शैलेश ने सवेरा के अलावा भी २-३ हिंदी फिल्मों में संगीत दिया है। प्रस्तुत गीत प्रेम धवन ने लिखा है और इसे गाया है लता मंगेशकर ने। मीना कुमारी नाव में बैठी ये गीत परदे पर गा रही हैं। फिल्म के नायक अशोक कुमार भी आपको चहल कदमी करते हुए दिखाई दे जायेंगे।
गीत के बोल:
नदिया के पानी ओ रे नदिया के पानी छुप छुप जइयो सजना से कहियो बैरी तेरे बिन कैसे बीतेगी जवानी
नदिया के पानी ओ रे नदिया के पानी छुप छुप जइयो सजना से कहियो बैरी तेरे बिन कैसे बीतेगी जवानी
मौसम आए मौसम जाए साजन तुम न आए मौसम आए मौसम जाए साजन तुम न आए ओ बचपन के मीत ओ बचपन के मीत तुम्हारे बिन अब रहा न जाए
नदिया के पानी ओ रे नदिया के पानी छुप छुप जइयो सजना से कहियो बैरी तेरे बिन कैसे बीतेगी जवानी
दिल तुम को पहचाने लेकिन ये अँखियाँ भरमाए दिल तुम को पहचाने लेकिन ये अँखियाँ भरमाए इन दोनों के बीच इन दोनों के बीच अकेले हम तड़पे रह जाए
नदिया के पानी ओ रे नदिया के पानी छुप छुप जइयो सजना से कहियो बैरी तेरे बिन कैसे बीतेगी जवानी
मधुर गीत हो तो गुड्डे गुडिया का खेल आनंददायक बन जाता है। इस गीत को ही लीजिये जो सन १९५३ की फिल्म परिणीता से है। भारत व्यास के गीत को संगीत से संवारा है अरुण कुमार मुखर्जी ने। आशा भोंसले की आवाज़ वाले इस गीत को फिल्माया गया है मीना कुमारी पर। गीत में अशोक कुमार भी दिखलाई पड़ेंगे।
शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के १९१३ में लिखे उपन्यास पर आधारित फिल्म उपन्यास का ईमानदार फ़िल्मी रूपांतरण कहा जा सकता है। इस फिल्म के लिए निर्देशक बिमल रॉय और मीना कुमारी को क्रमशः सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और अभिनेत्री के फिल्म फैयर पुरस्कार प्राप्त हुए।
गीत के बोल:
गोरे गोरे हाथों में मेहँदी रचा के नैनों में कजरा डाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
गोरे गोरे हाथों में मेहँदी रचा के नैनों में कजरा डाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
जा के अब ससुराल में रहना सास ससुर की सेवा करना जब तक बहे ना कुछ भी ना कहना आंसू को रखना संभाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
गोरे गोरे हाथों में मेहंदी रचा के नैनों में कजरा डाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
हो ओ ओ हंसती रहोगी तुम प्रीतम के नाम से प्रीतम के नाम से जी प्रीतम के नाम से थक के जो आये वो दिन भर के काम से दिन भर के काम से जी दिन भर के काम से पंखा झलोगी पंखा झलोगी तो सोये आराम से सपनों में उनके धीरे से आना मोती की लड़ियाँ डाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
हो पिया के संग सखी मीठी मीठी बोलना मीठी मीठी बोलना जी मीठी मीठी बोलना हो नयन गोरी धीरे धीरे डोलना धीरे धीरे डोलना जी धीरे धीरे डोलना गुस्सा करें वो जुबान नहीं खोलना गुस्सा करें वो जुबान नहीं खोलना मन के मंदिर में रखना नैनों के दीपक उजाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
गोरे गोरे हाथों में मेहँदी रचा के नैनों में कजरा डाल के चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा सा घूंघट निकाल के छोटा सा घूंघट निकाल के
आज तलत महमूद की जन्म तिथि है। इस अवसर पर उनका एक कालजयी गीत पेश है। फिल्म मदहोश सन १९५१ में आई जिसमे मनहर देसाई और मीना कुमारी प्रमुख कलाकार हैं। ये फिल्म बतौर संगीत निर्देशक मदन मोहन की दूसरी फिल्म थी। राजा मेहँदी अली खान और मदन मोहन की जुगलबंदी की शुरुआत कह सकते हैं इस फिल्म को। तलत का गाया ये गीत बेहद पसंद किया गया । नायिका टंगे में बैठ के कहीं जा रही है और व्यथित सी दिखाई दे रही है। परदे पर गीत गा रहे नायक को शायद ही किसी और फिल्म में मैंने देखा है।
गीत के बोल:
मेरी याद में तुम ना, आंसू बहाना ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना
समझना के था एक, सपना सुहाना वो गुज़रा ज़माना, मुझे भूल जाना
मेरी याद में
जुदा मेरी मंजिल, जुदा तेरी राहें जुदा मेरी मंजिल, जुदा तेरी राहें मिलेंगी ना अब तेरी मेरी निगाहें मुझे तेरी दुनिया से, है दूर जाना ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना
मेरी याद में
ये रो रो के कहता है, टूटा हुआ दिल ये रो रो के कहता है, टूटा हुआ दिल नहीं हूँ मैं तेरी मोहब्बत के काबिल मेरा नाम तक अपने, लब पे ना लाना ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना
मेरी याद में तुम ना, आंसू बहाना ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना
समझना के था एक, सपना सुहाना वो गुज़रा ज़माना,मुझे भूल जाना
फिल्म 'दिल अपना और प्रीत पराई' का एक और गीत पेश है। लीना, टीना, तकलीना जैसे शब्द मुझे आकर्षित करे रहे। 'तकलीना' का अर्थ आज तक समझ नहीं आया ना ही इस नाम की कोई मोहतरमा मिलीं। सो इसको फ़िल्मी नाम समझ कर दिमाग के किसी कोने में डाल दिया। ये गीत भी मीना कुमारी पर फिल्माया गया है। इसके गीतकार शैलेन्द्र हैं और गायिका लता मंगेशकर । एक छोटे से गीत को किलोमीटर लम्बा बनाया गया है फिर भी सुनने वाला बोर नहीं होता, इसकी धुन आकर्षक जो अमां।
गीत के बोल:
अंदाज़ मेरा मस्ताना, मांगे दिल का नजराना ज़रा सोचके आंख मिलाना, हो जाये ना तू दीवाना के हम भी जवान हैं, समां भी जवान है ना फिर हम से कहना मेरा दिल कहाँ है, मेरा दिल कहाँ है
तकलीना
अंदाज़ मेरा मस्ताना, मांगे दिल का नजराना ज़रा सोचके आंख मिलाना, हो जाये ना तू दीवाना के हम भी जवान हैं, समां भी जवान है ना फिर हम से कहना मेरा दिल कहाँ है, मेरा दिल कहाँ है
तकलीना
प्यार की किताब हूँ मैं सच हूँ फिर भी ख्वाब हूँ मैं देख कर सुरूर आये, वो अजब शराब हूँ मैं मैं हूँ जवानी का रंगीन तराना, रंगीन तराना
तकलीना
अंदाज़ मेरा मस्ताना, मांगे दिल का नजराना ज़रा सोचके आंख मिलाना, हो जाये ना तू दीवाना के हम भी जवान हैं, समां भी जवान है ना फिर हम से कहना मेरा दिल कहाँ है, मेरा दिल कहाँ है
तकलीना
तुझको मेरी जुस्तजू है मुझको तेरी आरजू है मेरे दिल का आइना तू दिल के आइने में तू है हम से ही रोशन है सारा ज़माना, सारा ज़माना
तकलीना
अंदाज़ मेरा मस्ताना, मांगे दिल का नजराना ज़रा सोचके आंख मिलाना, हो जाये ना तू दीवाना के हम भी जवान हैं, समां भी जवान है ना फिर हम से कहना मेरा दिल कहाँ है, मेरा दिल कहाँ है
तकलीना
मैं किधर हूँ तू कहाँ है ये ज़मीं या आसमान है मेरे तेरे प्यार की ये क्या अजीब दास्तां है मीठा सा ये दर्द भी है सुहाना, दर्द सुहाना
तकलीना
अंदाज़ मेरा मस्ताना, मांगे दिल का नजराना ज़रा सोचके आंख मिलाना, हो जाये ना तू दीवाना के हम भी जवान हैं, समां भी जवान है ना फिर हम से कहना मेरा दिल कहाँ है, मेरा दिल कहाँ है
तकलीना
अंदाज़ मेरा मस्ताना, मांगे दिल का नजराना ज़रा सोचके आंख मिलाना, हो जाये ना तू दीवाना के हम भी जवान हैं, समां भी जवान है ना फिर हम से कहना मेरा दिल कहाँ है, मेरा दिल कहाँ है
"दिल एक मंदिर" और "दिल अपना और प्रीत परायी" दोनों फिल्मों में शंकर जयकिशन का संगीत है। फिल्म के नाम में मैं अक्सर धोखा खा जाता हूँ और एक फिल्म के गाने दूसरी में फिट कर दिया करता हूँ। ऐसा आपके साथ भी होता होगा ज़रूर।
ये गीत एक पार्टी में गाया जा रहा है। पाश्चात्य प्रभाव वाला संगीत होने के बावजूद ये गीत देसी ही लगता है। शैलेन्द्र के बढ़िया बोलों को आवाज़ दी है गायिका लता मंगेशकर ने और इसे परदे पर गा रही हैं मीना कुमारी। राज कुमार एक डॉक्टर हैं जिनकी शादी नादिरा से होती है। शादी के बाद ये पार्टी दी जा रही है। मीना कुमारी जो कि एक नर्स हैं वो डॉक्टर से प्रेम करती थी/हैं। अपनी उलझन भरी भावनाओं को वे गीत के माध्यम से व्यक्त कर रही हैं। इस फिल्म के एकगीत पर पहले हम चर्चा कर चुके हैं।
गीत के बोल:
अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम ये मंजिलें हैं कौन सी ना वो समझ सके ना हम अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम ये मंजिलें हैं कौन सी ना वो समझ सकें ना हम
ये रौशनी के साथ क्यूँ धुंआ उठा चिराग से ये रौशनी के साथ क्यूँ धुआं उठा चिराग से ये ख्वाब देखती हूँ मैं के जग पड़ी हूँ ख्वाब से
अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम ये मंजिलें हैं कौन सी ना वो समझ सके ना हम
मुबारकें तुम्हें के तुम किसी के नूर हो गए मुबारकें तुम्हें के तुम किसी के नूर हो गए किसी के इतने पास हो के सबसे दूर हो गए
अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम ये मंजिलें हैं कौन सी ना वो समझ सके ना हम
किसी का प्यार ले के तुम नया जहाँ बसाओगे किसी का प्यार ले के तुम नया जहाँ बसाओगे ये शाम जब भी आएगी तुम हमको याद आओगे
अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम ये मंजिलें हैं कौन सी ना वो समझ सके ना हम ............................. Ajeeb dastan hai ye-Dil apna aur preet parayi 1960