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Nov 4, 2010

नज़रों में समाने से करार-हैदराबाद की नाजनीन १९५२

रंगीन युग से वापस श्वेत श्याम की ओर चला जाए एक बार फिर।
कहा भी गया है कि सबसे खूबसूरत रंग काला होता है।

कुछ साल पहले तक मुझे बस ये मालूम था कि इस नाम की
कोई फिल्म है, वो भी इसलिए कि इसमें वसंत देसाई का संगीत
है। फिल्म के गीत भी सुनने के लिए उपलब्ध नहीं थे। तकरीबन
७ साल पहले ये गीत सुनाई दिया । अब तो ये यू-ट्यूब पर देखने
के लिए भी उपलब्ध है। इसी को शायद हम सभी लोग कहते हैं
टेक्नोलोजिकल रेवोल्यूशन। तकनीकी के माध्यम से कई
सुप्त, गुप्त एवम लुप्त चीज़ें प्रकट हो गई हैं।

फिल्म में गुज़रे ज़माने के कुछ यादगार गीत हैं। प्रस्तुत गीत
फिल्माया गया है खूबसूरत निगार सुल्ताना पर। गीत लिखा
है नूर लखनवी ने और इसकी धुन बनाई है वसंत देसाई ने।
गीत गा रही हैं राजकुमारी जिनकी स्पष्ट और बुलंद आवाज़
के कई दीवाने आज भी मौजूद हैं।



गीत के बोल:

नज़रों में समाने से करार आ ना सकेगा
नज़रों में समाने से करार आ ना सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला ना सकेगा

हाँ , नज़रों में समाने से करार आ ना सकेगा

तस्वीर निगाहों में है खामोश तुम्हारी
जो सुन नहीं सकती कभी फरियाद हमारी
ये खाली तसव्वुर किसी काम, आ ना सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला ना सकेगा

नज़रों में समाने से करार आ ना सकेगा

आएगा ख्याल आ के, हो हो हो
आएगा ख्याल आ के गुज़रता ही रहेगा
आहें कोई दिल थम के भरता ही रहेगा
तस्कीन की सूरत कोई बतला ना सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला ना सकेगा

हाँ, नज़रों में समाने से करार आ ना सकेगा

टकरायेंगे हम सर कभी दीवार से दर से
हर सांस में उबलेगा लहू ज़ख्म-ए-जिगर से
दिल ढूंढेगा, आ आ आ
दिल ढूंढेगा तड़पेगा तुम्हें पा ना सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला ना सकेगा

हाँ, नज़रों में समाने से करार आ ना सकेगा

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Nov 22, 2009

साजन की गलियां छोड़ चले -बाज़ार १९४९

आइये दस साल और पीछे चला जाए। पिछला गीत आपने सुना वो
१९५९ की एक फ़िल्म से था और लता मंगेशकर का गाया हुआ था।
ये गीत भी लता मंगेशकर का गाया हुआ है और सन १९४९ में आई फ़िल्म
बाज़ार से है। लता की युवा आवाज़ को सुनने का अपना अलग ही आनंद
है जिससे आज की पीढ़ी वंचित है ।

इसकी धुन उस समय के प्रतिभाशाली संगीतकार श्याम सुंदर
ने बनाई है। श्याम सुंदर के बनाये गीतों में शायद सर्वाधिक लोकप्रिय गीत
हम इसको कह सकते हैं। इस फ़िल्म में श्याम और निगार सुल्ताना की मुख्य
भूमिकाएं हैं। ये गीत निगार सुल्ताना पर फिल्माया गया है। इस गीत के बारे में
बहुत कम श्रोताओं को पता है कि ये गीत किसने लिखा है। कमर जलालाबादी
इसके रचयिता हैं और उनको वो प्रसिद्धि नहीं मिल पाई जिसके वो हक़दार थे।



गाने के बोल:

साजन की गलियां छोड़ चले
दिल रोया आंसू बह न सके

ये जीना भी कोई जीना है
हम उनको अपना कह न सके

साजन की गलियां.....

जब उनसे बिछ्ड़ कर आने लगे
जब उनसे बिछ्ड़ कर आने लगे
रुक रुक के चले, चल चल के रुके
लब काँपे, आँखें भर आयीं
कुछ कहना चाहा कह न सके

साजन की गलियाँ छोड़ चले
दिल रोया आंसू बह न सके
साजन की गलियाँ....

उनके लिए उनको छोड़ दिया
ख़ुद अपने दिल को तोड़ दिया
हम उनके दिल में रहते थे
उनके क़दमों में रह न सके

साजन की गलियाँ छोड़ चले
दिल रोया आंसू बह न सके
साजन की गलियाँ....

साजन हैं वहाँ और हम हैं यहाँ
ऐसे दिल को ले जाएँ कहाँ
जो पास भी उन के रह न सके
और दर्द-ऐ-जुदाई सह न सके

साजन की गलियाँ छोड़ चले
दिल रोया आंसू बह न सके
साजन की गलियाँ.....

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