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Feb 18, 2017

साँसों में कभी दिल में कभी-परछाईयाँ १९७२

कुछ फ़िल्में अपनी परछाई बॉक्स ऑफिस पर कुछ ही देर तक
डालने के बाद ओझल हो जाती हैं. समय के साथ फ़िल्में तो
भुला दी जाती हैं मगर उनके गीत जनता को याद रह जाते हैं.


विनोद खन्ना के शुरू के दौर की फिल्म है परछाईयाँ. ये फिल्म
सन १९७२ में आई. फिल्म में विनोद खन्ना के साथ एक अनजान
चेहरा रेशमा है. फिल्म में राहुल देव बर्मन का संगीत है इसलिए
इसके गीत कभी कभार सुन लिया करते हैं. गीत के बोल लिखा
हैं मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसे रफ़ी संग आशा ने गाया है.





गीत के बोल:

साँसों में कभी दिल में कभी नज़रों में रहा करना
जग बैरी हो तो क्या तुम हमसे वफ़ा करना
साँसों में कभी दिल में कभी नज़रों में रहा करना
जग बैरी हो तो क्या तुम हमसे वफ़ा करना

जाने प्यार निभाना दीवाने दिल की लगी के
जाने प्यार निभाना दीवाने दिल की लगी के
क्या है मोहब्बत ज़माना हमसे ये सीखे
प्यार हमने किया प्यार हमको सदा करना

साँसों में कभी दिल में कभी नज़रों में रहा करना
जग बैरी हो तो क्या तुम हमसे वफ़ा करना

आये ख़ुशियों का मौसम हा हा
के आये ग़म का महीना
आये ख़ुशियों का मौसम आ हा हा
के आये ग़म का महीना
तुम्हीं पे मरना तुम्हारे संग-संग है जीना
कभी होयें ना जुदा बस इतनी दुआ करना, आ

साँसों में कभी दिल में कभी नज़रों में रहा करना
जग बैरी हो तो क्या तुम हमसे वफ़ा करना
जग बैरी हो तो क्या तुम हमसे वफ़ा करना
..................................................................................
Saanson mein kabhi-Parchhaiyan 1972

Artists: Vinod Khanna, Reshma

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Jun 27, 2015

हंस के पुकार के-परछाईयाँ १९७२

पोस्ट लिखते समय मैं एक गीत देख और सुन रहा
हूँ टी. वी. पर-जी क्लासिक चैनल पर आ रहे पंचम
पर विशेष कार्यक्रम में. गीत गा रहे हैं-सुदेश भोंसले.
वाद्य यंत्रों के अनूठे प्रयोग पर, पिछले कुछ समय से
इस कार्यक्रम में, काफी प्रकाश डाला गया है.

कार्यक्रम में भानु गुप्ता माउथ ऑर्गन पर शोले की एक
क्लिप बजा रहे हैं. कार्यक्रम खत्म होने का वक्त हो चला
है. माहौल ग़मगीन सा हो उठा है श्रोताओं के बीच.
शानदार कार्यक्रम था ये एक, आयोजकों को बधाई.

पंचम का संगीत पिछली सदी की सबसे बड़ी फिल्म-
शोले का हिस्सा है. फिल्म के संगीत चाहे वो गीत
हों या पार्श्व-संगीत के टुकड़े आज भी जनता-जनार्दन
को अचंभित करता है. निस्संदेह वो समय से आगे
का और अजब संगीत है.

आज उनका ७६ वां जन्मदिन है. पंचम भक्तों के लिए
ये दिन किसी त्यौहार से कम नहीं है. हर साल उन्हें
इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहता है.

पंचम के संगीत की धडकन वास्तव में किशोर कुमार
ही थे. किशोर के अवसान के बाद पंचम के संगीत
पर इसका असर स्पष्ट दिखा. किशोर जो अपने आप
में एक करिश्माई गायक थे, उनका साथ छूटना एक
बहुत बड़ी घटना रही उनके जीवन की.

बहुत सी ऐसी फ़िल्में रहीं जिनमें बढ़िया गीत होने के
बावजूद वे चली नहीं. शक्ति सामंत, रमेश तलवार और
गुलज़ार के अलावा उन्हें संगीत की समझ वाले फिल्म
निर्देशकों का लंबा साथ नहीं मिला. स्पष्ट भाषा में बोला
जाए तो हिट फ़िल्में बनाने वाले निर्देशकों का साथ उन्हें
नहीं प्राप्त हुआ. फिल्म उद्योग की केमिस्ट्री भी अजीब है.
इसे अच्छे अच्छे ज्ञानी नहीं समझ पाए आज तक. 

आज आपको एक ऐसा गीत सुनवाते हैं जिसमें पंचम के
संगीत की लगभग सारी खूबियाँ मौजूद हैं. लता-किशोर
की आवाजें हैं, मजरूह साहब के बोल हैं. विनोद खन्ना
और बिंदु पर इसे फिल्माया गया है. जनता कुछ भी कहे
इन दोनों की स्क्रीन प्रेजेंस ज़बरदस्त हुआ करती थी. एक
संयोग ये भी है-दोनों की मुस्कराहट आला दजे की है.
सन १९७२ की फिल का गीत है ये मगर आज भी ताज़ा
सा लगता है.




गीत के बोल:

हो, रैना अँधेरी है
आ जा सजनिया, मोरी चंदनिया रे

हंस के पुकार के,
हंस के पुकार के,
दो बोल प्यार के,
झूठो भी कह दे तो
सांच मोहे लागे रे
ऐसे से प्रीत लागी राम
हो, हंस के पुकार के,
दो बोल प्यार के,
झूठो भी कह दे तो
सांच मोहे लागे रे
ऐसे से प्रीत लागी राम
सच है सजनी प्यार का वादा
शाम ही से जले मोरा मनवा
गले से लग जा, तेरे बदन से
पाए ठंडक हमारो बदनवा
गरवा यूँ लागे जैसे कटारी लागे
झटके जो बैयाँ और मोहे प्यारी लागे
हूँ तेरे पीछे बदनाम

हो, हंस के पुकार के,
हंस के पुकार के
दो बोल प्यार के,
झूठो भी कह दे तो
सांच मोहे लागे रे
ऐसे से प्रीत लागी राम

आज मिले हो मोहे अकेले
अब चलेगा न कोई बहाना
हो थाम के बैयाँ मैं नहीं छोडूं
छूट जाए रे चाहे ज़माना
उलझा के अब तो नैना झुकाना नहीं
लाये न तू तो होश में भी आना नहीं
अब तो रे तू ही मोहे थाम

हंस के पुकार के,
हंस के पुकार के
दो बोल प्यार के,
झूठो भी कह दे तो
सांच मोहे लागे रे
ऐसे से प्रीत लागी राम
.............................................................................................
Hans ke pukar ke-Parchhaiyan 1972

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