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Aug 10, 2018

धरती कहे पुकार के-शीषक गीत १९६९

सन १९६९ की फिल्म धरती कहे पुकार के एक गांव
की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म है जिसमें सार यही है
अपनी जड़ों से जुड़े रहो चाहे प्लूटो के सैर ही क्यूँ
ना कर आओ.

फिल्म की कहानी बी आर इशारा ने लिखी है. ये कुछ
चौंकाने वाला सा है क्यूंकि बी आर इशारा अलग-हट-के
फ़िल्में बनाते रहे हैं. फिल्म का निर्देशन दुलाल गुहा ने
किये है और इसमें आपको तरुण बोस भी दिखलाई
देंगे. इस अच्छे कलाकारों के जमावड़े वाली फिल्म को
जनता का खूब प्यार मिला. इसके गाने भी लाजवाब
हैं.

फिल्म का शीर्षक गीत रफ़ी का गाया हुआ है. गीत में
सन्देश छुपा हुआ है. हम गीत ध्यान से सुनें तो पायेंगे
कि ये हमें अपनी मिटटी से प्यार करने के लिए प्रेरित
करता है.



गीत के बोल:

हो हो हो हो हो हो हो
हो हो हो हो हो हो हो
धरती कहे पुकार के
धरती कहे पुकार के
ओ मुझको चाहने वाले किसलिए बैठा हार के
मेरा सब कुछ उसी का है जो छू ले मुझको प्यार से
धरती कहे पुकार के
धरती कहे पुकार के

है अजब सी बात जिस पर मुझको हंसना आये
है अजब सी बात जिस पर मुझको हंसना आये
जो मुझी से है वो मेरी माटी से शरमाये
आ पास मेरे मतवाले भरम ये क्यूँ बेकार के
मेरा सब कुछ उसी का है जो छू ले मुझको प्यार से
धरती कहे पुकार के
धरती कहे पुकार के

आबरू जग में उसकी जो बस इतना जाने
आबरू जग में उसकी जो बस इतना जाने
हल चले इक हाथ से इक हाथ कलम को थामे
फिर शीश झुकेंगे सारे ही संसार के
मेरा सब कुछ उसी का है जो छू ले मुझको प्यार से

धरती कहे पुकार के
धरती कहे पुकार के
ओ मुझको चाहने वाले किसलिए बैठा हार के
मेरा सब कुछ उसी का है जो छू ले मुझको प्यार से
धरती कहे पुकार के
धरती कहे पुकार के
………………………………………………
Dharti kahe pukar ke-Titlesong 1969

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Jan 7, 2015

खुशी की वो रात आ गयी-धरती कहे पुकार के-१९६९

आपको फिल्म "धरती कहे पुकार के " के ३ गीत सुनवा चुके हैं. अब
सुनिए चौथा गीत. विरोधाभास है गीत में-खुशी के अवसर पर गाया
जा रहा है और दर्दीला सुनाई देता है. नायक और नायिका के प्रेम कोण
में तीसरा कोण नायक के पिता द्वारा डाल दिया गया है और इसी वजह
से नायक दहाड़े मार के ये गीत गा रहा है. नायक है-जीतेंद्र, नायिका है
नंदा, तीसरा कोण हैं संजीव कुमार और लव स्टोरी के विलन हैं नायक
के पिता के रोल में कन्हैयालाल. गीत मजरूह ने लिखा है जिसके बोल
सरल से हैं . गायक हैं मुकेश

शहर  से पढाई खत्म करके बड़ा भाई गांव वापस आता है और उसे आते
ही विवाह प्रस्ताव उसके पिता द्वारा दिया जाता है. पिता इससे अनभिज्ञ
है कि वो तीसरा कोण पैदा करने जा रहा है. छोटा भाई बेचारा शर्म और
लिहाज के मारे निर्णय नहीं कर पा रहा क्या करे.



गीत के बोल:



खुशी की वो रात आ गयी कोई गीत जगने दो
गाओ रे झूम झूम
गाओ रे झूम झूम
खुशी की वो रात आ गयी कोई गीत जगने दो
गाओ रे झूम झूम
गाओ रे झूम झूम
कहीं कोई काँटा लगे जो पग में तो लगने दो
नाचो रे झूम झूम
नाचो रे झूम झूम
आज हंसूं मैं इतना कि मेरी आँख लगे रोने
आज हंसूं मैं इतना कि मेरी आँख लगे रोने
आज मैं इतना गाऊँ कि मन में दर्द लगे होने
ओ मज़े में सवेरे तलक यही गीत को बजने दो
नाचो रे झूम झूम
खुशी की वो रात आ गयी कोई गीत जगने दो
गाओ रे झूम झूम
धूल हूँ मैं वो पवन बसंती क्यूँ मेरा संग धरे
धूल हूँ मैं वो पवन बसंती क्यूँ मेरा संग धरे
मेरी नहीं तो और किसी की पैया में रंग भरे
ओ दो नैनों में आंसू लिए दुल्हनिया को सजने दो
नाचो रे झूम झूम
खुशी की वो रात आ गयी कोई गीत जगने दो
गाओ रे झूम झूम
कहीं कोई काँटा लगे जो पग में तो लगने दो
नाचो रे झूम झूम
गाओ रे झूम झूम
नाचो रे झूम झूम
...............................................
Khushi ki wo raat aa gayi-Dharti kahe pukar ke 1969

Artists: Nanda, Sanjeev Kumar, Jeetendra, Kanhaiyalal

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Jan 25, 2010

जे हम तुम चोरी से-धरती कहे पुकार के १९६९

'अरे ई बंधन है प्यार का'- लता और मुकेश का गाया ये युगल गीत
मुझे बहुत पसंद है। मजरूह का लिखा ये गीत परदे पर गा रहे हैं
नंदा और जीतेंद्र फिल्म 'धरती कहे पुकार के' में । इस फिल्म का गीत
देख के लगता है की नयज जीतेंद्र ८० के दशक में ज्यादा तेज़ नृत्य
किया करते थे। इस गीत में देसी बोली की खुशबू डाली है गीतकार
मजरूह  सुल्तानपुरी ने। आम संगीत प्रेमी जिसे किस कलाकार ने
क्या खाया क्या पिया से मतलब नहीं होता वो ऐसे गीतों को पसंद
करता है. यह गीत ज्यादा बजने वाले युगल गीतों में अपना स्थान
शीर्ष के गीतों में रखता है. गौर तलब है प्रबुद्ध किस्म के संगीत
समीक्षक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को वो सम्मान नहीं देना चाहते जो
उन्होंने कुछ गिनती के संगीतकारों को दिया है, देते आये हैं और
देते रहेंगे. खैर इस गीत को वे ख़ारिज नहीं कर सकते क्यूंकि इससे
कम से कम एक नामचीन शायर और गीतकार का नाम जुड़ा है.



गीत के बोल:

जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर
जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर
अरे ई बंधन है प्यार का

जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर

कजरा वाली फिर तू ऐसे काहे निहारे
कजरा वाली फिर तू ऐसे काहे निहारे
ई चितवन के गोरी माने तो समझा जा रे
मतलब्वा एक है, एक है, नैनन पुकार का

जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर

हो, जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर

देखो बादर आये पवन के पुकारे
देखो बादर आये पवन के पुकारे
उल्फत मेरी जीती अनाड़ी पिया हारे
आएगा रे मजा, रे मजा, अब जीत हार का

जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर

हो, जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर

घूंघट में से मुखड़ा दिखे अभी अधूरा
घूंघट में से मुखड़ा दिखे अभी अधूरा
आ बैयाँ में आजा मिलन तो हो पूरा
ई मिलना तो नहीं, तो नहीं, कुछ एक बार का

जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर
अरे ई बंधन है प्यार का

हो, जे हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से
जइयो कहाँ ए हजूर
.........................................................................
Je hum tum chori se-Dharti kahe pukar ke  1969

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Dec 20, 2009

दिए जलाएं प्यार के -धरती कहे पुकार के १९६९

ये गीत हिंदी फिल्मों के 'चिड़िया का घोंसला युग' का गीत है।
जब अभिनेत्रियों के जूडे की शक्ल चिडिया के घोंसले या गमले
जैसी प्रतीत होती थी। बहुत कम अभिनेत्रियों पर वो जंचता था।
भेड़ चाल के चलते उस समय लगभग सभी अभिनेत्रियों को ये एक
ना एक बार जरूर प्रदर्शित करना पड़ा। धन्य हो हिंदी फिल्मों के
निर्देशक। एक और चीज़ ओवरसाइज़ है इस गीत में वो है जीतेंद्र
के सर पे रखी पगड़ी। गीत मधुर है और एक सुन्दर अभिनेत्री निवेदिता
पर फिल्माया गया है। मजरूह के गीत पर एक आकर्षक धुन बनाई है
लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने। आवाज़ लता मंगेशकर की है जो आप
पहचान ही गए होंगे।

फिल्म का निर्देशन दुलाल गुहा ने किया है जिन्होंने काफी चर्चित
फ़िल्में बनायीं हैं हिंदी फिल्म जगत के लिए. फिल्म अभिनेत्री
निवेदिता की पदार्पण फिल्म थी-सन १९६४ की शगुन . उनका
नाम लिबी राणा है. निवेदि़त नाम उनको किसने दिया ये मुझे
मालूम नहीं.



गीत के बोल:

दिए जलाएं प्यार के चलो इसी ख़ुशी में
बरस बिता के आई है ये शाम ज़िन्दगी में

दिए जलाएं प्यार के चलो इसी ख़ुशी में
बरस बिता के आई है ये शाम ज़िन्दगी में

घुल गया एक साल फिर तन मन के रंग में
महकी बहार बन के
घुल गया एक साल फिर तन मन के रंग में
महकी बहार बन के

रुत फिर बीती हुई बन बन के चांदनी
चेहरे पे आई छन के
भटक चलें इसी हसीं याद की गली में
बरस बिता के आई है ये शाम ज़िन्दगी में

दिए जलाएं प्यार के चलो इसी ख़ुशी में
बरस बिता के आई है ये शाम ज़िन्दगी में

जगमग नैना हुए, हंस दिए पलकों तले
सपने कई सुहाने
जगमग नैना हुए, हंस दिए पलकों तले
सपने कई सुहाने

पल भर के वास्ते फिरने लगे सामने
गुज़रे हुए ज़माने
पुकारने गए हुए दिनों को बेखुदी में
बरस बिता के आई है ये शाम ज़िन्दगी में

दिए जलाएं प्यार के चलो इसी ख़ुशी में
बरस बिता के आई है ये शाम ज़िन्दगी में
..............................................................................
Diye jalayen pyar ke-Dharti kahe pukar ke 1969

Artists-Nivedita, Sanjeev Kumar

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Oct 25, 2009

जा रे कारे बदरा-धरती कहे पुकार के १९६९

प्रस्तुत गीत, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा हुआ है।
ये गाना मुझे बेहद पसंद है विशेषकर इसका तीसरा अंतरा ।
ऐसा अक्सर होता है की आपको गाने का कोई ख़ास अंतरा
याद रह जाता है । इस अंतरे को याद रखने के पीछे वजह ये
है कि ये फ़िल्म में दो बार सुनाई पड़ता है।

मुझे अपनी पोस्ट में पसंद शब्द का इस्तेमाल करते हुए अब
डर लगने लगा है. जिस पोस्ट में ये लिख देता हूँ उसका वीडियो
यूट्यूब से स्वर्गवासी हो जाता है या एलियन हो जाता है.

भावनाओं से परिपूर्ण इस गीत के लिए  लक्ष्मीकांत प्यारेलाल
को पूरे नम्बर १० में से १० । गीत फिल्माया गया है अभिनेत्री
नंदा पर और वे इसे गा रही हैं नायक जीतेंद्र के लिए। फ़िल्म
का नाम है "धरती कहे पुकार के" । इस फ़िल्म के सारे गाने
बढ़िया हैं ।

पढ़ते(कॉपी कर कर के सेव करते) रहिये ये ब्लॉग ...........



गाने के बोल:

जा रे कारे बदरा बलमू के द्वार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार

जा रे कारे बदरा बलमू के द्वार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार

किन की पलक से पलक मोरी उलझी
निपट अनाड़ी से लट मोरी उलझी
के लट उलझा के मैं तो गई हार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार
वहीँ जाके रो..................

जा रे कारे बदरा बलमा के द्वार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार

अंग उन्ही की लहरिया समायी
कबहूँ न पूछे लूँ काहे अंगडाई
के सौ सौ बल खा के मैं तो गई हार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार

थाम लो बैयाँ चुनर समझावे
गरबा लगा लो कजर समझावे
के सब समझा के मैं तो गई हार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार
वहीँ जा के रो..................

जा रे कारे बदरा बलमा के द्वार
वो हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार
....................................................................
Ja re kaare badra-Dharti kahe pukar ke 1969

Artist: Nanda, Jeetendra

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