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Apr 7, 2017

ये हम आ गए हैं कहाँ-वीर ज़ारा २००४

प्रश्न कई तरीके से पूछे जा सकते हैं. खुश हो कर, दुखी हो
कर, आश्चर्य वाले भाव से, संदेह वाले भाव से और जो कुछ
छूट गया हो उन सब प्रकारों से. प्रस्तुत गीत में आश्चर्य
और खुशी के भाव है ऐसा प्रतीत होता है. थर्ड वर्ल्ड के प्राणी
फोर्थ वर्ल्ड में आ गए से प्रतीत होते हैं.

गीत है वीर ज़ारा से जावेद अख्तर का लिखा हुआ और इसकी
धुन है मदन मोहन की. उदित नारायण और लता मंगेशकर
की आवाजें हैं. नायक नायिका वही हैं जो वीर ज़ारा फिल्म
के पिछले गीत में थे.



गीत के बोल:

लहराती हुई राहें  खोले हुए हैं बाँहें
ये हम आ गए हैं कहाँ
पलकों पे गहरे हलके  है रेशमी धुंधलके
ये हम आ गए हैं कहाँ
हाँ ये हम आ गए हैं कहाँ

वो देखो ज़रा  पर्बतों पे घटायें
हमारी दास्ताँ  हौले से सुनाये
सुनो तो ज़रा  ये फूलों की वादी
हमारी ही कोई  कहानी है सुनाती
सपनों के इस नगर में  यादों की रहगुज़र में
ये हम आ गए हैं कहाँ
हाँ ये हम आ गए हैं कहाँ

जो राहों में है  रुत ने सोना बिखेरा
सुनहरा हुआ  तेरा-मेरा सवेरा
ज़मीं सो गयी  बर्फ की चादरों में
बस इक आग सी  जलती है दो दिलों में
हवाएँ सनासनाए  बदन काँप जाए
ये हम आ गए हैं कहाँ
हाँ ये हम आ गए हैं कहाँ

ये बरसात भी  कब थामें कौन जाने
तुम्हें मिल गए  प्यार के सौ बहाने
सितारों की है  जैसे बारात आई
हमारे लिए  रात यूँ जगमगाई
सपने भी झिलमिलायें  दिल में दिये जलायें
ये हम आ गए हैं कहाँ
हाँ ये हम आ गए हैं कहाँ
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Ye ham aa gaye hain kahan-Veer Zaara 2004

Artists: Shahrukh Khan, Preity Zinta

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Feb 17, 2017

मैं यहाँ हूँ-वीर ज़ारा २००४

मदन मोहन का संगीत सन २००४ के कुछ भरा भरा सा
लगता है उसकी वजह समय के साथ बढ़ी वाद्य यंत्रों की
मात्रा. मूल धुनें शायद कम वाद्य यंत्रों के हिसाब से तैयार
की गयी थीं. हम वीर ज़ारा के संगीत के सन्दर्भ में ये
बात कर रहे हैं.

एक अच्छा काम हुआ कि धुनों को दुनिया के सामने लाया
गया जिनका प्रयोग कई वर्षों से नहीं हो प् रहा था. एक
बात ज़रूर है कि मदन मोहन के समय के गायक भी
मौजूद नहीं थे २००४ में और जो थे उनकी टोनल क्वालिटी
से समय बहुत आगे निकल चुका था.

सुनते हैं एक गीत उदित नारायण की आवाज़ में जो कि
जावेद अख्तर का लिखा हुआ है. शाहरुख खान और प्रीती
जिंटा पर इसे फिल्माया गया है.



गीत के बोल:

जानम देख लो मिट गयी दूरियाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ
जानम देख लो मिट गयी दूरियाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ
कैसी सरहदें  कैसी मजबूरियाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ

तुम छुपा ना सकोगी मैं वो राज़ हूँ
तुम भूला ना सकोगी वो अंदाज़ हूँ
गूँजता हूँ जो दिल में तो हैरां हो क्यूँ
मैं तुम्हारे ही दिल की तो आवाज़ हूँ
सुन सको  तो सुनो  धड़कनों की ज़बां
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ
कैसी सरहदें  कैसी मजबूरियाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ

मैं ही मैं अब तुम्हारे ख़यालों में हूँ
मैं जवाबों में हूँ  मैं सवालों में हूँ
मैं तुम्हारे हर इक ख्वाब में हूँ बसा
मैं तुम्हारी नज़र के उजालों में हूँ
देखती  हो मुझे  देखती हो जहाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ
जानम देख लो मिट गयी दूरियाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ
कैसी सरहदें  कैसी मजबूरियाँ
मैं यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ हूँ  यहाँ
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Main yahan hoon-Veer Zaara 2004

Artists: Shahrukh Khan, Preity Zinta

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Jun 21, 2015

दो पल रुका-वीर ज़ारा २००४

कुछ गीत किसी कारण से विशेष बन जाते हैं. विशेष
का मतलब कुछ भी हो सकता है. प्रस्तुत गीत ने मेरा
ध्यान आकृष्ट किया कुछ शब्दों “तुम थे” के प्रयोग की
वजह से. यह गीत है फिल्म वीर ज़ारा से, जिसे शायर
जावेद अख्तर साहब ने लिखा है.

सोनू निगम की खुशकिस्मती है उन्हें लता मंगेशकर के
साथ कुछ गीत गाने का मौका मिला. लता मंगेशकर ने
९३-९४ के बाद गीत गाना बहुत कम कर दिया था, नहीं
के बराबर कह सकते हैं. केवल कुछ विशेष आग्रह पर
उन्होंने कुछ गीत गाये, जैसे इक्का दुक्का रहमान के लिए.
ये धुनें मदन मोहन की हैं, अतः उनका गाना तो ज़रूरी
था ही, उसके अलावा फिल्म यश चोपड़ा की है.

अब इस गीत को सुना और देखा जाए. इस ब्लॉग पर ये
इस फिल्म से चौथा गीत है.




गीत के बोल:


दो पल रुका, ख्वाबों का कारवाँ
और फिर, चल दिए, तुम कहाँ, हम कहाँ
दो पल की थी, ये दिलों की दास्ताँ
और फिर, चल दिए, तुम कहाँ, हम कहाँ


तुम थे के थी कोई उजली किरण
तुम थे या कोई कली मुस्काई थी
तुम थे या सपनों का था सावन
तुम थे के खुशियों की घटा छाई थी
तुम थे के था कोई फूल खिला
तुम थे या मिला था मुझे नया जहां
दो पल रुका, ख्वाबों का कारवाँ

तुम थे या खुशबू हवाओं में थी
तुम थे या रंग सारी दिशाओं में थे
तुम थे या रोशनी राहों में थी
तुम थे या गीत गूँजे फ़िज़ाओं में थे
तुम थे मिले या मिली मंज़िलें
तुम थे के था जादू भरा कोई समां
दो पल रुका, ख्वाबों का कारवाँ
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Do pal ruka-Veer Zaara 2004

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Feb 28, 2015

तेरे लिए हम हैं जिये-वीर ज़ारा २००४



फिल्म वीर ज़ारा से आपको  एक गीत सुनवाया है पहले.
कहा जाता है कि फिल्म वीर ज़ारा में जो गाने हैं वे
मदन मोहन की बरसों पहले बनाई हुई धुनों को लेकर
बनाये गए हैं. ये काम उनके सुपुत्र ने किया है. ये सब
धुनें टेप पर उपलब्ध थीं उनके पास.


मौसम फिल्म के गानेदिल ढूँढता है के लिए बनाई गयी
अनेकों धुनों में से एक इधर इस्तेमाल की गयी है. गीत
लता मंगेशकर और रूप कुमार राठौड द्वारा गया गया है. 

आइये सुनें ये गीत. 


गीत  के बोल: 


तेरे लिए, हम हैं जिये, होठों को सीये
तेरे लिए, हम हैं जिये, हर आँसू पिये
दिल में मगर, जलते रहे, चाहत के दीये
तेरे लिए, तेरे लिए

ज़िंदगी, ले के आई है
बीते दिनों की किताब
घेरे हैं, अब हमें
यादें बे-हिसाब
बिन पूछे, मिले मुझे
कितने सारे जवाब
चाहा था क्या, पाया है क्या
हमने देखिए
दिल में मगर

क्या कहूँ, दुनिया ने किया
मुझसे कैसा बैर
हुकुम था, मैं जियूं
लेकिन तेरे बगैर
नादां हैं वो, कहते हैं जो
मेरे लिए तुम हो गैर
कितने सितम, हम पे सनम
लोगों ने किए
दिल में मगर 
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Tere liye-Veer Zaara 2004

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Feb 2, 2015

क्यूँ हवा आज-वीर ज़ारा २००४



कुछ गानों को सुनने के पीछे कोई संगीतमय वजह नहीं
होती. बस यूँ ही सुन लेते हैं, मसलन ये यश चोपड़ा की
फिल्म का गाना है, ये मदन मोहन के संगीत वाला गाना
है, ये लता मंगेशकर का गाया हुआ गाना है.

प्रस्तुत गीत को भी सुन लेते हैं, बस, कभी कभी, यूँ ही.
आपको भी सुनवा रहे हैं जैसे कई गीत सुनवाते हैं यूँ ही ,
कभी कभी. यूँ कि, यूँ भी, यूँ ही.


गीत के बोल:

एक दिन जब सवेरे सवेरे
सुरमई से अंधेर की चादर हटा के
एक परबत के तकिये से
सूरज ने सर जो उठाया तो देखा
दिल की वादी में चाहत का मौसम है
और यादों की डालियों पर
अनगिनत बीते लम्हों की कलियाँ महकने लगी हैं
अनकही, अनसुनी आरज़ू
आधी सोयी हुई, आधी जागी हुई
आँखें मलते हुए देखती है
लहर दर लहर, मौज दर मौज
बहती हुई ज़िन्दगी
जैसे हर एक पल नयी है
और फिर भी वही
हाँ, वही ज़िन्दगी
जिसके दामन में एक मोहब्बत भी है, कोई हसरत भी है
पास आना भी है, दूर जाना भी है
और ये एहसास है
वक़्त झरने सा बहता हुआ, जा रहा है
ये कहता हुवा
दिल की वादी में चाहत का मौसम है
और यादों की डालियों पर
अनगिनत बीते लम्हों की कलियाँ महकने लगी हैं

क्यूँ हवा आज यूँ गा रही है 
क्यूँ फिजा, रंग छलका रही है
मेरे दिल बता आज होना है क्या
चांदनी दिन में क्यूँ छा रही है
ज़िन्दगी किस तरफ जा रही है
मेरे दिल बता क्या है ये सिलसिला

क्यूँ हवा आज यूँ गा रही है 
क्यूँ फिजा, रंग छलका रही है

जहाँ तक भी जाएँ निगाहें, बरसते हैं जैसे उजाले
सजी आज क्यूँ है ये राहें, खिले फूल क्यूँ हैं निराले
खुश्बूयें, कैसी ये बह रही है
धड़कनें जाने क्या कह रही है
मेरे दिल बता ये कहानी है क्या

क्यूँ हवा आज यूँ गा रही है 
क्यूँ फिजा, रंग छलका रही है

ये किसका है चेहरा जिससे मैं, हर एक फूल में देखता हूँ
ये किसकी है आवाज़ जिसको, न सुन के भी मैं सुन रहा हूँ
कैसी ये आहटें आ रही हैं, कैसे ये ख्वाब दिखला रही है
मेरे दिल बता कौन है आ रहा

क्यूँ हवा आज यूँ गा रही है 
क्यूँ फिजा, रंग छलका रही है
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Kyun hawa aaj-Veer Zaara 2004

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Dec 18, 2014

ऐसा देस है मेरा-वीर ज़ारा २००४

आज आपको नया मसाले से छोंकी हुई पुरानी धुन पर बना एक गीत
सुनवाते हैं. ये है फिल्म वीर ज़ारा से. मदन मोहन के नाम पार जिनकी
धुनें हैं इसे काफी प्रचारित किया गया. अब गानों में कितना दम है इसे
आप महसूस कर सकते हैं आज, दस साल बाद. शायद ही अब इसके गाने
सुनाई देते हों. मदन मोहन स्वयं होते तो बात अलग थी, वे सरल सी सुनाई
देने वाली धुनों को भी आकर्षक बना दिया करते थे. अब न तो वैसे गायक
बचे हैं न वैसे गीतकार, न साजिन्दे.

वैसे इस गीत को जावेद अख्तर ने लिखा है और गाया है चार गायकों ने-
लता मंगेशकर, गुरदास मान, उदित नारायण और पृथा मजूमदार ने. इस
गीत को यहाँ एक फ़रमाइश के चलते चिपकाया जा रहा है. काफी लोग इसे
पसंद करते हैं, और मेरा अनुमान है इसे शाहरुख खान फैन ज्यादा सुनते हैं.




गीत के बोल:

अंबर हेठाँ धरती वसदी, एथे हर रुत हँसदी
किन्ना सोणा देस है मेरा

धरती सुनहरी अंबर नीला
हर मौसम रंगीला
ऐसा देस है मेरा

बोले पपीहा कोयल गाये
सावन घिर घिर आये
ऐसा देस है मेरा

गेंहू के खेतों में कंघी जो करे हवाएं
रंग-बिरंगी कितनी चुनरियाँ उड़-उड़ जाएं
पनघट पर पनहारन जब गगरी भरने आये
मधुर-मधुर तानों में कहीं बंसी कोई बजाए, लो सुन लो
क़दम-क़दम पे है मिल जानी कोई प्रेम कहानी
ऐसा देस है मेरा...

बाप के कंधे चढ़ के जहाँ बच्चे देखे मेले
मेलों में नट के तमाशे, कुल्फ़ी के चाट के ठेले
कहीं मिलती मीठी गोली, कहीं चूरन की है पुड़िया
भोले-भोले बच्चे हैं, जैसे गुड्डे और गुड़िया
और इनको रोज़ सुनाये दादी नानी इक परियों की कहानी
ऐसा देस है मेरा...

मेरे देस में मेहमानों को भगवान कहा जाता है
वो यहीं का हो जाता है, जो कहीं से भी आता है

तेरे देस को मैंने देखा, तेरे देस को मैंने जाना
जाने क्यूँ ये लगता है, मुझको जाना पहचाना
यहाँ भी वही शाम है, वही सवेरा
ऐसा ही देस है मेरा जैसा देस है तेरा
.....................................................................................
Aisa desh hai mera-Veer Zaara 2004

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