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May 8, 2018

दर्शन हुए तिहारे साजन-विद्यापति १९३७

आपको सन १९३७ की फिल्म विद्यापति से एक लोकप्रिय गीत
सुनवाया था २ साल पहले. अब सुनते हैं एक और गीत इसी फिल्म
से पहाड़ी सान्याल की आवाज़ में.

गीत केदार शर्मा का है. अंदाजा लगा सकते हैं आप उन्होंने कब
गीत लिखना शुरू किया था? संगीत है रायचंद्र बोराल का.



गीत के बोल:

दर्शन हुए तिहारे साजन
जागे भाग हमारे
दर्शन हुए तिहारे साजन
जागे भाग हमारे

रंग डारा मोहे प्रेम रंग मे
उमंग उमंग है अंग अंग में
रंग डारा मोहे प्रेम रंग मे
उमंग उमंग है अंग अंग में
चित में बसत अब नैना तिहारे
प्यारे प्यारे अति न्यारे साजन
चित में बसत अब नैना तिहारे
प्यारे प्यारे अति न्यारे साजन
जागे भाग हमारे

दर्शन हुए तिहारे साजन
जागे भाग हमारे

आँखों के आज सामने
आँखों का चाँद है
आँखों का चाँद है
आकाश देख आज तेरा
चाँद मँद है
भूल रहे हैं सितारे
भूल रहे हैं सितारे
भूल रहे हैं सितारे
भूल रहे हैं सितारे
.................................................................
Darshan hue tihaare saajan-Vidyapati 1937

Artist: Pahadi Sanyal

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Dec 16, 2017

मतवाली मतवाली मतवाली-विद्यापति १९३७

अविस्मरणीय युगल गीतों पर समय समय पर विस्तृत चर्चा हम करते
आये हैं. आज आपको सुनवा रहे हैं सन १९३७ की फिल्म विद्यापति से
एक गीत. इसे कानन बाला और धूमि खान ने गाया है. कानन बाला
अपनी स्पष्ट आवाज़ के लिए जानी जाती थीं. आज भी उनके मुरीद उनके
गीत बेहद चाव के साथ सुना करते हैं. हाँ, ये बात और है कि ये मुरीद
अधिकांश सफ़ेद बालों वाले हैं. इक्का दुक्का आपको मिल जायेंगे ३०-४०
वर्ष की आयु के नवयुवक जो विभिन्न संगीत गोष्ठियों और संगीत प्रेमियों
की महफ़िल में घुसने के लिए इस प्रकार के गीत सुनने का दावा करते हैं
और वास्तव में ९० के दशक का संगीत सुना करते हैं.

ये एक विडम्बना है कि जूने पुराने संगीत पर जो कुछ भी चर्चा होती है
नेट पर वो अंग्रेजी भाषा में होती है. हम अभी तक अंग्रेजों के मानसिक
गुलाम ही हैं. चर्चा करने वालों में कईयों को शर्म आती है हिंदी में लिखने
में. उन्हें लगता है हिंदी भाषा में उनकी भावनाएं व्यक्त करने वाले शब्द
मौजूद नहीं हैं या बात में १० किलो के भाटे वाला वजन नहीं आएगा. ये
कुछ कुछ ऐसा है जैसे हिंदी में खाना खा कर अंग्रेजी में डकार मारना.

इसे केदार शर्मा ने लिखा और आर सी बोराल ने संगीतबद्ध किया.



गीत के बोल:


अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली

मैं पी कर मद की प्याली यूँ चाल चलूँ मतवाली
मैं पी कर मद की प्याली यूँ चाल चलूँ मतवाली

अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली
मतवाली मतवाली मतवाली
मतवाली मतवाली मतवाली
मैं चाल चलूँ मतवाली
मैं चाल चलूँ मतवाली
डर डर डर डर डर डर डा
डर डर डर डर डर डर डा
मोरे अंगना में आये आली आली
मैं चाल चलूँ मतवाली

झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली
झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली
अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली

मतवाली मतवाली मतवाली
मतवाली मतवाली मतवाली
मैं चाल चलूँ मतवाली
मैं चाल चलूँ मतवाली
मोरे अंगना में आये आली आली
मैं चाल चलूँ मतवाली
झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली
झूम रही है आली
अम्बुवा की डाली
अम्बुवा की डाली डाली झूम रही है आली
…………………………………………………………….
Ambuwa ki dali….matwali-Vidyapati 1937

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Jul 15, 2017

एक बंगला बने न्यारा-प्रेसिडेंट १९३७

आज सुनते हैं सन १९३७ की फिल्म प्रेसिडेंट से सहगल
का गाया अमर गीत. फिल्म में के. एल. सहगल और
लीला देसाई और कमलेश कुमारी प्रमुख कलाकार हैं.
गीत केदार शर्मा का है और संगीत आर सी बोराल का.

ये उस ज़माने का गीत है जब बंगला परिभाषा अनुसार
वाकई बंगला हुआ करता था. आजकल बिल्डर लोग एक
कमरे के मकान को भी ‘बैंगलो’ कहा करते हैं. समय के
साथ चीज़ें कितनी बदल जाती हैं.




गीत के बोल:

एक बँगला बने न्यारा
एक बँगला बने न्यारा
रहे कुनबा जिस में सारा
एक बँगला बने न्यारा
एक बँगला बने न्यारा

सोने का बँगला चंदन का जँगला
सोने का बँगला चंदन का जँगला
विश्वकर्मा के द्वारा
विश्वकर्मा के द्वारा
सोने का बँगला चंदन का जँगला
विश्वकर्मा के द्वारा
अति सुन्दर प्यारा प्यारा
एक बँगला बने न्यारा
एक बँगला बने न्यारा

इतना ऊँचा बँगला हो
ये मानो गगन का तारा
इतना ऊँचा बँगला हो
ये मानो गगन का तारा
मानो गगन का तारा
मानो गगन का तारा
जिस पे चढ़ के इंद्रधनुष पर
झूला झूले चाँद हमारा
जिस पे चढ़ के इंद्रधनुष पर
झूला झूले चाँद हमारा
भंडार होये लक्ष्मी के हाथों में सारा
भंडार होये लक्ष्मी के हाथों में सारा
पाए अब जी भर के सुख जिसने बिपत उठाई
पाए अब जी भर के सुख जिसने बिपत उठाई
……………………………………………….
Ek bangle bane nyara-President 1937

Artist: KL Saigal

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Jul 15, 2016

पुजारी मोरे मन्दिर में आओ-जागीरदार १९३७

३० के दशक में मोतीलाल का जलवा था. ये जलवा १९३४
से शुरू हुआ. आज जागीरदार फिल्म से एक गीत सुनते हैं
जिसे बिब्बो और सुरेन्द्र ने गाया है. सागर निर्मित इस
फिल्म का निर्देशन महबूब ने किया. महबूब की बतौर
निर्देशक ये दूसरी ही फिल्म थी.

फिल्म के प्रमुख सितारे हैं मोतीलाल, बिब्बो, माया बैनर्जी,
सुरेन्द्र, जिया सरहदी, याकूब, पेसी पटेल और रामचंद्र मराठे.

गीत लिखा है पंडित इन्द्र ने और संगीत है अनिल बिश्वास
का. अनिल बिश्वास के संगीत निर्देशन वाली एक और फिल्म
उस वर्ष आई थी-कोकिला जिसका निर्माण सागर ने किया
था.




गीत के बोल:

पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
नैंनों की गंगा जमुना में
नैंनों की गंगा जमुना में
साजन आओ नहाओ
पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
पुजारी मोरे मन्दिर में आओ

प्रेम देव की करो आरती
प्रेम देव की करो आरती
स्नेह सुधा बरसाओ
स्नेह सुधा बरसाओ
दिल के तारों पर सजनी तुम
दिल के तारों पर सजनी तुम
दीपक राग सुनाओ

पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
पुजारी मोरे मन्दिर में आओ

बचपन रूठ गयो क्यूँ मोसे
बचपन रूठ गयो क्यूँ मोसे
कोई ये बतलाओ
बचपन रूठ गयो क्यूँ मोसे
कोई ये बतलाओ
जोबन रूठ न जाये बालम
जोबन रूठ न जाये बालम
ऐसी राह बताओ

पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
पुजारी मोरे मन्दिर में आओ

चन्द्रग्रहण है चन्द्रमुखी
तुम आओ यहाँ छुप जाओ
चन्द्रग्रहण है चन्द्रमुखी
तुम आओ यहाँ छुप जाओ
रूप सुधा की मस्त प्याली
रूप सुधा की मस्त प्याली
पियो और पिलाओ

पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
पुजारी मोरे मन्दिर में आओ
.................................................................
Pujari more mandir mein aao-Jagirdar 1937

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Jun 1, 2016

इस जीवन की फुलवारी में-अधिकार १९३७

न्यू थिएटर्स बैनर तले बनी सन १९३७ की फिल्म में जमुना
पहाड़ी सान्याल, पंकज मालिक, जगदीश सेठी और मेनका जैसे
कलाकार थे. इनमें से शायद आप पंकज मलिक और पहाड़ी
सान्याल के नामों को पहचानते होंगे. बाकी के नामों पर प्रकाश
डालने की कोशिश करते हैं अगली किसी पोस्ट में. ये अगली
अगली करते ना जाने कितने अफ़साने अधूरे रह गए इधर.
इस फिल्म का निर्देशक प्रमतेश चंद्र बरुआ उर्फ पी सी बरुआ
ने किया था.

सबसे पहले आपको गीत का विवरण दे दे. इस गीत को पहाड़ी
सान्याल ने गाया है, मुंशी आरजू के बोल हैं और तिमिर बरन
का संगीत.

पुराने गीतों के बोल लिखना आसान काम नहीं है. किसी में
विनाइल की ‘घसर घसर घूं घूं’ साथ में फ्री सुनाई देती है तो
किसी गीत में गायक गायिका शब्द चबाते हुए गाते हैं.



गीत के बोल:

इस जीवन की फुलवारी में सदा मगन रहना
इस जीवन की फुलवारी में सदा मगन रहना
आशा के फूल चुना करना
आशा के फूल चुना करना
काँटा दुःख का चुभे सदा हंसना
सदा मगन रहना
इस जीवन की फुंदवारी में सदा मगन रहना

इस जिंदगी की शाख में
गुल भी हैं हार भी
जिंदगी की शाख में
गुल भी हैं हार भी
आती है इस चमन में फिजा भी बहार भी
आती है इस चमन में पिज़ा भी बहार भी

चंद्र हँसे जब गुल कुम्हलाये
घूंघट फूल कली मुस्काए
चंद्र हँसे जब गुल कुम्हलाये
घूंघट फूल कली मुस्काए
दिन ढल कर जब सोग रचाए
बन के सुहागन आये रैना
सदा मगन रहना
इस जीवन की फुलवारी में सदा मगन रहना

शबनम की तरह किसलिए
ऐ शाम रोती है
चुप रह के रात ढल गयी
चुप रह के रात ढल गयी
अब सुबह होती है
भोली शाम क्यूँ घबराती है
दुःख की रात से भय खाती है
भोली शाम क्यूँ घबराती है
दुःख की रात से भय खिलाती है
दुःख की रात ही दिखलाती है
दुःख की रात ही दिखलाती है
सुख आनंद का सुन्दर सपना
सदा मगन रहना
इस जीवन की फुलवारी में सदा मगन रहना
.............................................................................
Is jeevan ki phulwari mein-Adhikar 1937

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Nov 22, 2010

नदी किनारे बैठ के आओ-जागीरदार १९३७

हिंदी सिनेमा के प्रथम दौर से एक गीत चुना है आज आपके लिए।
फिल्म का नाम है जागीरदार । सन १९३७ की इस फिल्म का निर्देशन
महबूब खान (मदर इंडिया फेम)ने किया था।

अभिनेता मोतीलाल और अभिनेत्री माया बनर्जी ने ये गीत गाया है
और इस पर अभिनय भी किया है। अफ़सोस, इसकी विडियो क्लिप
उपलब्ध नहीं है दर्शन हेतु। मोतीलाल अपनी कातिल मुस्कराहट
के लिए विख्यात थे।

गीत जिया सरहदी ने लिखा और इस गीत को स्वरों में बांधा है
अनिल बिश्वास ने। बतौर संगीतकार अनिल बिश्वास के लिए ये
पहली बड़ी हिट फिल्म थी।

आज के दौर में अगर आप किसी से कहेंगे 'नदी किनारे बैठ के आओ'
तो वो आपको टेडी नज़र से देखेगा-कारण-लगभग सभी नदी के
किनारे जनता ने आबाद कर दिए हैं और सुबह के नित्य कर्म से
लेकर शाम के नित्य कर्म तक सब कुछ होता है किनारे पर।
कुछ ही नदियाँ आबादी क्षेत्र में जनता के कहर से बची हुई हैं।

गीत की कुछ पंक्तियाँ इटालिक फॉण्ट में हैं उनपर नज़र डालें। मुझे
बोल कुछ गड़बड़ लगते हैं। ज्यादा बारीक कान वाले कृपया सहायता
करें।





गीत के बोल:

नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें

चुल्लू भर भर पानी के बूँदें
चुल्लू भर भर पानी के बूँदें
लो भर भर बरसायें

नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें

सुख बन जब बन के राजा
सुख बन जब बन के राजा
पवन जाग उजाली
पवन जाग उजाली
मिल जुल कर फिर बन में हम तुम
मिल जुल कर फिर बन में हम तुम
अपना राज चलायें
अपना राज चलायें

नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें

कागज़ की एक नाव बना कर
जल में उसे चलायें
कागज़ की एक नाव बना कर
जल में उसे चलायें
दुनिया की तस्वीर बना कर
दुनिया की तस्वीर बना कर
दुनिया को दिखलायें
दुनिया को दिखलायें

नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें

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Oct 22, 2009

बाबुल मोरा-स्ट्रीट सिंगर १९३७

सहगल के गाये गीत अमर गीतों की श्रेणी में आते हैं।
आज की पीड़ी के गायक भी उनकी गायकी से प्रभावित हैं।
उनके गीतों में से सबसे ज्यादा प्रभाव अगर किसी गीत ने
छोड़ा है तो वो है -बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए । गीत लिखा
था वाजिद अली शाह ने। वाजिद अली शाह अवध के नवाब थे
जिनका राज़ १८४७ से १८५६ तक चला। कला और संस्कृति प्रेमी थे।
उनके राज़ में कला और संस्कृति अपने पूरे शबाब पर थी।
ये एक ठुमरी है जो कई कलाकारों ने अपने अपने अंदाज़ में गाई है।

सहगल के गाये गीत की धुन बनाई है आर सी बोराल ने । इस गीत में
सहगल ख़ुद हारमोनियम लेकर घूमते हुए गा रहे हैं। घूमते घूमते गाना
और रिकॉर्डिंग करना एक दुष्कर कार्य है । इस पर आवाज़ एक सरीखी
बनाये रखना एक चैलेन्ज जैसा है। ठुमरी भैरवी बड़े गुलाम अली साहब
और सहगल की आवाज़ में सुनना एक सुखदायी अनुभव है।



गाने के बोल:

बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए
मोरा, नैहर छूटो ही जाए

चार कहार मिले
मोरी डोलिया सजावें
मोरा अपना बेगाना छूटो जाए
मोरा नैहर आ आ आ ...
छूटो ही जाए

अंगना तो परबत भया
और देहरी भई बिदेश
ले घर बाबुल आपनो
मैं चली पिया के देश

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए
मोरा, नैहर छूटो ही जाए

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