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Dec 24, 2017

वो तीर दिल पे चला-आरती १९६२

लोकप्रिय फिल्मों में लोकप्रिय गीतों के अलावा कुछ अलोकप्रिय
मतबल कम लोकप्रिय गीत भी हुआ करते हैं. ऐसा ही एक गीत
है फिल्म आरती में जो रफ़ी और आशा का गाया एक युगल
गीत है.

गीत में हास्य का हल्का सा पुट है और ये महमूद पर फिल्माया
गया है. नायिका को आप पहचानिये.




गीत के बोल:

वो तीर दिल पे चला जो तेरी कमान में है
वो तीर दिल पे चला जो तेरी कमान में है
हाय किसी की आँख में जादू तेरी ज़ुबान में है
हाय किसी की आँख में जादू तेरी ज़ुबान में है

नज़र में आते ही तुम तो जिगर में आये सनम
जिगर में आये तो दिल की तरफ़ बढ़ाए क़दम
कहीं ठहरती नहीं जो उसी अदा की कसम
कहीं ठहरती नहीं जो उसी अदा की खसम
उसी अदा की क़सम
ज़मीं पे है वही बिजली जो आसमान में है
हाय किसी की आँख में जादू तेरी ज़ुबान में है

ये माना रंग मोहब्बत के हो चले गहरे
मगर लबों पे हैं ताले दिलों पे हैं पहरे
जो बेक़रार हो दिल से कहीं वो क्या ठहरे
जो बेक़रार हो दिल से कहीं वो क्या ठहरे
कहीं वो क्या ठहरे
अभी तो हुस्न मोहब्बत के इम्तहान में है
आ हा वो टीर दिल पे चला जो तेरी कमान में है


तुम्हारी आँखों के आगे ये दिन ये रात कहाँ
गुलों की शाख कहाँ इक सनम का हाथ कहाँ
हसीन देखे हज़ारों मगर ये बात कहाँ
हसीन देखे हज़ारों मगर ये वात कहाँ
मगर ये बात कहाँ
ये बात और है जो तेरी आन-बान में है   

किसी की आँख में जादू तेरी ज़ुबान में है
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Wo teer dil pe chala-Aarti 1962

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Jan 25, 2016

न भंवरा न कोई गुल-आरती १९६२

आपने ट्रेन के ऊपर वाला गीत देखा सुना अब सुनिए देखिये एक
रेल के डब्बे के अंदर वाला गीत. हास्य कलाकार राजेन्द्रनाथ के
साथ पता नहीं कौन अभिनेत्री इस गीत को गा रही हैं परदे पर.
मीना कुमारी और अशोक कुमार को तो मैं पहचान गया गीत
में.

गायक कलाकार हैं-रफ़ी और आशा भोंसले. मजरूह के लिखे इस
गीत की तर्ज़ बनाई है रोशन ने. हल्का फुल्का गीत है ये और
इसे कभी कभार रेडियो वाले बजा दिया करते हैं, वैसे इसे कई
सालों से रेडियो पर नहीं सुना है. कुछ शब्द ऐसे हैं इस गीत
में जिनका गंभीर शायरी में जिक्र होता है: बू-बास और दूसरा
है रंग-ओ-बू.



गीत के बोल:

न भंवरा न कोई गुल अकेला हूँ मैं तेरा बुलबुल
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ
मेरे जहाँ में रंग-ओ-बू कहीं पर हंसी कहीं आंसू
ये बता सौदाई मैं ये जिंदगी भुला दूं क्या

उल्फत की है यहाँ बू-बास मन में लगी लबों पर प्यास
मन में लगी लबों पर प्यास
चांदी सोना हो न हो दिल है अपने पास
मेरी दुनिया और हसीं है यहाँ दंगा शोर नहीं है
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ

न भंवरा न कोई गुल अकेला हूँ मैं तेरा बुलबुल
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ

तेरा जहाँ है जिसका नाम गम की सुबह दुखों की शाम
हो नो नो नो नो
मामूली सी बात पे लड़ना इसका काम
फिर भी ये सब हैं अपने मिलजुल कर देखें सपने
ये बता सौदाई मैं ये जिंदगी भुला दूं क्या
मेरे जहाँ में रंग-ओ-बू कहीं पर हंसी कहीं आंसू
ये बता सौदाई मैं ये जिंदगी भुला दूं क्या

न भंवरा न कोई गुल अकेला हूँ मैं तेरा बुलबुल
है एक तन्हाई मेरी जान मेरे जहाँ में आ
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Na bhanwra na koi gul-Aarti 1962

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Nov 10, 2015

बार बार तोहे क्या समझाए-आरती १९६२

सदाबहार शब्द जब मैंने पहली बार सुन था तब कुछ
ऐसा लगा जैसे किसी ताज़ी सब्जी की बात हो रही हो,
या हरियाली की. बहार शब्द को हरियाली से जोड़ के
देखा करते थे. शब्द सीखने का अधिकांश लोगों का
तरीका एक सा होता है. कुछ शब्द किसी घटना या
प्रसंग विशेष की याद दिलाते हैं.

आपको आज एक सदाबहार युगल गीत सुनवाते हैं जो
फिल्म आरती से लिया गया है. इसे लता और रफ़ी ने
गाया है. प्रदीप कुमार औए मीना कुमारी अभिनीत इस
फिल्म के गाने ज़बरदस्त हिट हैं. मजरूह सुल्तानपुरी
के लिखे गीत हैं और संगीत रोशन का. गीत की धुन
काफी आकर्षक है और इसे आसानी से गुनगुनाया भी
जा सकता है.




गीत के बोल:

बार बार तोहे क्या समझाये
बार बार तोहे क्या समझाये पायल की झनकार
तेरे बिन साजन लागे ना जिया हमार
चुप चुप के करता हैं इशारें चंदा सौ सौ बार
आ तोहे सजनी ले चलूँ नदियाँ के पार

चलते चलते रुक गये क्यों सजन मेरे
मिलते मिलते झुक गये क्यों नैन तेरे
झुके झुके नैना करते हैं तुमसे ये इकरार
तेरे बिन साजन लागे ना जिया हमार

दरिया ऊपर चांदनी आई संभल संभल
इन लहरों पर मन मेरा गया मचल मचल
एक बात कहता हूँ तुमसे ना करना इन्कार
आ तोहे सजनी ले चलूँ नदियाँ के पार

ना बीते ये रात हम मिलते ही रहे
बस तारों की छाँव में चलते ही रहे
नाम तेरा ले ले कर गाये धड़कन का हर तार
तेरे बिन साजन लागे ना जिया हमार
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Baar baar tohe kya samjhaye-Aarti 1962

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Jan 9, 2010

अब क्या मिसाल दूं मैं तुम्हारे शबाब की-आरती १९६२

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि नायक नाउम्मीदी के भंवर से निकलने की
जद्दो जहद में लगा है और उसको इस चक्र से एक नायिका निकाल रही है।
इस गीत तक पहुँच कर नायक को दुनिया हरी भरी नज़र आने लगी है और
वो नायिका की तारीफ़ में एक बढ़िया रोमांटिक गीत गाता है। फिल्म आरती
का ये गीत एक चर्चित और कर्णप्रिय गीत है, जिसको बहुत आहिस्ता से गाया
गया है। उपमाओं का ये साहित्यिक 'उसल-मीसल' आपको ज़रूर पसंद आएगा।
कितना फर्क आया है श्वेत श्याम और रंगीन युग में प्रेम के इज़हार के मामले में।
आज के दौर में पहाड़ के ऊपर चढ़ के सबसे ऊंचे सुर में चीख के नायक बतलाता
है कि उसकी प्रेमिका कैसी और कितनी सुन्दर है।

चन्द्रमा की किरण को मजरूह साहब ने इंसान बनवा दिया है इस गीत में।



गीत के बोल:

अब क्या मिसाल दूं मैं तुम्हारे शबाब की
इंसान बन गयी है किरण माहताब की
अब क्या मिसाल दूं

चेहरे में घुल गया है हसीं चांदनी का नूर
आँखों में है चमन की जवां रात का सुरूर
गर्दन है इक झुकी हुयी डाली,
डाली गुलाब की

अब क्या मिसाल दूं मैं तुम्हारे शबाब की
अब क्या मिसाल दूं

गेसू खुले तो शाम के दिल से धुंआ उठे
छू ले कदम तो झुक के ना फिर आस्मां उठे
सौ बार झिलमिलाये शमा,
शमा आफ़ताब की

अब क्या मिसाल दूं

दीवार-ओ-दर का रंग ये आँचल ये पैरहन
घर का मेरे चिराग है बूटा सा ये बदन
तस्वीर हो तुम्ही मेरे जन्नत के
जन्नत के ख्वाब की

अब क्या मिसाल दूं मैं तुम्हारे शबाब की
इंसान बन गयी है किरण माहताब की
अब क्या मिसाल दूं
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Ab kya misaal doon main tumhare shabab ki-Aarti 1962

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आप ने याद दिलाया तो मुझे-आरती १९६२

फिल्म आरती के गीतों में से दूसरा गीत पेश है । ये एक युगल गीत है
जिसे लता और रफ़ी ने गाया है । गंभीर किस्म के इस गीत के बोल
लिखे हैं मजरूह सुल्तानपुरी ने। नाउम्मीदी का ये आलम है कि नायक
ये भी भूल चूका है की उसको क्या तकलीफें हैं। लगातार एक जैसी
निराशाजनक स्तिथियों के बाद ऐसा ही दौर आता है की आदमी तकलीफों
से ऊपर उठ जाता है और उसको संसार नकारात्मक या निराशावादी कहना
शुरू कर देता है। उसी सोयी हुई उम्मीदें और अरमान जाग जाते हैं जब कोई
आशा की किरण उसके जीवन में प्रवेश करती है। गीत फिल्माया गया है
प्रदीप कुमार और मीना कुमारी पर और इस गीत की धुन बनाई है रोशन ने।



गाने के बोल:

रफ़ी:
आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया
आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया

आपने याद दिलाया

मैं भी क्या चीज़ हूँ खाया था कभी तीर कोई
दर्द अब जा के उठा, चोट लगे देर हुई
तुमको हमदर्द जो पाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया

आपने याद दिलाया

मैं ज़मीं पर हूँ न समझा न परखना चाहा
आसमाँ पर ये कदम झूम के रखना चाहा
आज जो सर को झुकाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया

आपने याद दिलाया

लता:
मैं ने भी सोच लिया साथ निभाने के लिये
दूर तक आऊंगी मैं तुमको मनाने के लिये
दिल ने एहसास दिलाया तो मुझे याद आया
के मेरे दिल पे पड़ा था कोई ग़म का साया
आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया

रफ़ी:
आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया
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Aapne yaad dilaya to mujhe yaad aaya-Aarti 1962

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May 1, 2009

कभी तो मिलेगी-आरती १९६२

प्रदीप कुमार एक दरिद्री कवि की भूमिका में हैं। उनको एक थोड़ी
सम्पन्न हमसफ़र के रूप में एक युवती(मीना कुमारी) मिलती है ।
अपनी स्तिथी का बखान करता युवक सहानुभूति के दो बोल अपने
हमदर्द से सुनता है और एक गीत बजना शुरू होता है नेपथ्य में ।
कहीं कोई रेडियो चालू करता है और ये गीत सुनाई पड़ता है। सटीक
समय पर प्रेरणादायक गीत सुनाई पढता है फिल्मों में। ऐसा हकीकत
में कभी कभार ही होता है। गीत है मजरूह का और इसकी धुन बनायीं है
रोशन ने।
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गाने के बोल:

कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी
बहारों की मंज़िल राही
बहारों की मंज़िल राही

कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी
बहारों की मंज़िल राही
बहारों की मंज़िल राही

लम्बी सही दर्द की राहें
दिल की लगन से काम ले
आँखों के इस तूफ़ाँ को पी जा
आहों के बादल थाम ले
दूर तो है पर, दूर नहीं है
दूर तो है पर, दूर नहीं है
नज़ारों की मंज़िल राही
बहारों की मंज़िल राही

आ हा हा, हा हा हा हा हा , ला ला, ला ला ला, हा हा

माना कि है गहरा अन्धेरा
गुम है डगर की चाँदनी
मैली न हो धुँधली पड़े न
देख नज़र की चाँदनी
डाले हुए है, रात की चादर
डाले हुए है, रात की चादर
सितारों की मंज़िल राही

बहारों की मंज़िल राही
............................
Kabhi to milegi-Aarti 1962

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