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Feb 28, 2018

तेरा हिज्र मेरा नसीब है-रज़िया सुल्तान १९८३

भारी और रौबदार आवाजें हमने काफी सुनी हिंदी फिल्मों में, कभी
नायकों की तो कभी गायकों की. मोती आवाज़ वाले गायक ६० और
सत्तर के दशक में बहुत कम या नहीं के बराबर सुनाई दिए. १९८३
की फिल्म रज़िया सुल्तान में कब्बन मिर्ज़ा के गाये दो गीत हैं.
उनमें से एक आज सुन लेते हैं. इसे निदा फाजली ने लिखा है और
इसकी तर्ज़ बनाई खय्याम ने.




गीत के बोल:

तेरा हिज्र मेरा नसीब है
तेरा ग़म
तेरा ग़म ही मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों
तू कहीं भी हो मेरे साथ है
तू कहीं भी हो मेरे साथ है
तेरा हिज्र मेरा नसीब है

मेरे वास्ते तेरे नाम पर
मेरे वास्ते तेरे नाम पर
कोई हर्फ़ आए नहीं नहीं
मुझे ख़ौफ़-ए-दुनिया नहीं
मुझे ख़ौफ़-ए-दुनिया नहीं
मगर मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है
मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है
तेरा हिज्र मेरा नसीब है

तेरा इश्क़ मुझ पे है मेहरबान
तेरा इश्क़ मुझ पे है मेहरबान
मेरे दिल को हासिल है दो जहाँ
मेरी जान-ए-जां मेरी जान-ए-जां
मेरी जान-ए-जां इसी बात पर
मेरी जान जाए तो बात है
मेरी जान जाए तो बात है

तेरा हिज्र मेरा नसीब है
…………………………………………………
Tera hijr mera naseeb hai-Razia Sultan 1983
 
Artists: Dharmendra, Hema Malini

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Feb 11, 2017

आई ज़ंजीर की झंकार-रज़िया सुल्तान १९८३

७० और अस्सी के दशक में फ़िल्मी गीतों में हमने ज्यादा भारी
आवाजें नहीं सुनी मगर फिल्म रज़िया सुल्तान में दो ऐसे गीत
हैं जिन्हें खरखरी और भारी आवाज़ वाले कब्बन मिर्ज़ा ने गाया
है.

गौरतलब है इस फिल्म में धर्मेन्द्र का मेकअप भी भारी है. उन्हें
एक गुलाम की भूमिका दी गयी थी फिल्म में. गीत लिखा है
जां निसार अख्तर ने और इसकी धुन बनाई है खय्याम ने.
कब्बन मिर्ज़ा ने ६० के दशक में इक्का दुक्का गीत गाये थे
फिल्मों के लिए जो सुनना दुर्लभ अनुभव है. आकाशवाणी के
अनाउंसर रहे कब्बन मिर्ज़ा का योगदान संगीत के क्षेत्र में
ना के बराबर है. उन्हें रज़िया सुल्तान के गीतों से ही ज्यादा
प्रसिद्धि मिली.



गीत के बोल:

ख़ुदा ख़ैर करे
आई ज़ंजीर की झंकार ख़ुदा ख़ैर करे
दिल हुआ किसका ग़िरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे
आई ज़ंजीर की झंकार

जाने ये कौन मेरी रूह को छूकर ग़ुज़रा
जाने ये कौन
जाने ये कौन मेरी रूह को छूकर ग़ुज़रा
एक क़यामत हुई बेदार
एक क़यामत हुई बेदार
ख़ुदा ख़ैर करे

लम्हा मेरी आँखों में खिंची जाती है
लम्हा मेरी आँखों में खिंची जाती है
एक चमकती हुई तलवार ख़ुदा ख़ैर करे
एक चमकती हुई तलवार
एक चमकती हुई तलवार

ख़ून दिल का न छलक जाए कहीं आँखों से
ख़ून दिल का न छलक जाए मेरी आँखों से
हो न जाए कहीं इज़हार
हो न जाए कहीं इज़हार
हो न जाए कहीं इज़हार ख़ुदा खैर करे
...................................................................
Aayi zanjeer ki jhankar-Razia Sultan 1983

Artists: Hema Malini, Dharmendra

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Sep 11, 2009

ढलती जाए रात- रज़िया सुल्ताना १९६१

ये पुरानी रज़िया सुल्तान नाम की फिल्म है। ये गीत सुनते
सुनते मुझे बहुत साल हो गए हैं । इस गीत में आपको जयराज और
निरूपा रॉय नामे के कलाकार दिखाई देंगे। गीत गाया है आशा और
रफ़ी ने। आनंद बक्षी के शायद शुरुआती गीतों में से एक है ये।
धुन बनायीं है एक गुमनाम से संगीतकार लच्छीराम ने। ये युगल गीत
भी अन्य कलाकारों द्वारा गाया जा रहा है परदे पर फिल्म सुहागन के
गीत की तरह जिसमे माला सिन्हा और गुरु दत्त नज़र आते हैं।
एक आनंदित करने वाले सदाबहार गीत का आनंद उठाइए।



गीत के बोल:

ढलती जाए रात कह ले दिल की बात
शमा-परवाने का न होगा फिर साथ
ढलती जाए रात कह ले दिल की बात
शमा-परवाने का न होगा फिर साथ

ढलती जाए रात

मस्त नज़ारे चाँद सितारे रात के मेहमाँ हैं ये सारे
उठ जाएगी शब की महफ़िल नूर-ए-सहर के सुन के नक्कारे
हो न हो दुबारा मुलाक़ात

ढलती जाए रात

नींद के बस में खोई-खोई कुल दुनिया है सोई सोई
ऐसे में भी जाग रहा है हम तुम जैसा कोई कोई
क्या हसीं है तारों की बारात

ढलती जाए रात

जो भी निग़ाहें चार है करता उसपे ज़माना वार है करता
हूँ राह-ए-वफ़ा का बन के राही फिर भी तुम्हें दिल प्यार है करता
बैठा ना हो ले के कोई घात

ढलती जाए रात कह ले दिल की बात
शमा-परवाने का न होगा फिर साथ
ढलती जाए रात कह ले दिल की बात
शमा-परवाने का न होगा फिर साथ
ढलती जाए रात

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May 16, 2009

समय के बंधन से मुक्त गाने २ - ए दिल-ए-नादां १९८३

फिल्म रज़िया सुल्तान का लता का गाया गीत नायब रत्न है
फिल्म संगीत खजाने का. कमाल अमरोही के कमाल के साथ
जां निसार अख्तर के बोल, खय्याम का संगीत और लता की
आवाज़ का जादू महसूस करना हो आप भी किसी धोरे पर
पहुँच जाएँ रात को और इस गाने को सुनना शुरू कर दें. गीत
में वो प्रभाव है- जैसे नायिका रेत के धोरों पर अपने अक्स को
निहार रही है वैसे ही आप भी कुछ ढूँढना शुरू कर देंगे. ये अक्स
उसके मन का है जो सारे बंधनों को तोड़ के उन्मुक्त पंछी की
तरह प्रकृति को महसूस करना चाहता है, खुल के चहचहाना
चाहता है.

संतूर और सारंगी ने इस गीत को जो प्लेटफोर्म मुहैया कराया है
वो अनूठा और अलौकिक है. ऐसे गीत दशक में इक्के दुक्के ही
बनते हैं. ऐसी प्रेरणाएँ विशेष अवस्था में ईश्वरीय ही होती है. इसके
फिल्मांकन के लिए भी प्रेरणा विशेष की व्यवस्था की गयी लगती
है. इससे बेहतर फिल्मांकन की कल्पना करना मुश्किल है. सादगी
के साथ वो ठंडक का अहसास कुदरत के हसीं नज़ारे जैसा बन
गया है. सेल्युलोइड के ऐसे टुकड़ों को तो सहेज के रखने का
मन करता है.

दिल-ऐ-नादां को समझ नहीं आ रहा है क्या करे. तख़्त-ओ-ताज
हो या झोपडा, भावनाएं तो इंसानी ही होती हैं. मर्सिडीज में हो या
बैलगाडी में, विचार कमबख्त एक जैसे आते हैं, शब्दों का हेर फेर
हो सकता है. भूख सभी को लगती है, सामान अलग लगा हो सकता
है, पानी की प्यास हो सकती है या कोल्ड ड्रिंक की. तत्व एक ही
रहेगा-तरल पदार्थ की तमन्ना है तो वही चाहिए. चाय की जगह
समोसा नहीं ले सकता. सूखी रोटी की जगह सूखा बर्गर ले सकता
है.

तू मेरा हीरो है-जैसे गीतों के युग में अवतरित हुआ ये गीत आज भी
उतने ही चाव से सुना जाता है जितना सन १९८३ में. लता का एक
गीत फिल्म हीरो में भी है मगर जो ताजगी इस आवाज़ में सुनाई देती
है वो लता के गाये और सन १९८३ में आये बाकी गीतों में नहीं है.




गीत के बोल:

ए दिल-ए-नादां, ए दिल-ए-नादां,
आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है
ए दिल-ए-नादां, ए दिल-ए-नादां,
आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है

ए दिल-ए-नादां

हम भटकते हैं, क्यों भटकते हैं,
दश्तो-सेहरा में
ऐसा लगता है, मौज प्यासी है,
अपने दरिया में
कैसी उलझन है, क्यों ये उलझन है
एक साया सा, रू-बरू क्या है

ए दिल-ए-नादां, ए दिल-ए-नादां,
आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है

क्या क़यामत है, क्या मुसीबत है,
कह नहीं सकते, किसका अरमाँ है
ज़िंदगी जैसे, खोयी-खोयी है, हैरां हैरां है
ये ज़मीं चुप है, आसमां चुप है
फिर ये धड़कन सी, चार सू क्या है

ए दिल-ए-नादां, ए दिल-ए-नादां,

ऐसी राहों में, कितने काँटे हैं,
आरज़ूओं ने, आरज़ूओं ने,
हर किसी दिल को, दर्द बाँटे हैं,
कितने घायल हैं, कितने बिस्मिल हैं,
इस खुदाई में, एक तू क्या है
एक तू क्या है, एक तू क्या है

ए दिल-ए-नादां, ए दिल-ए-नादां
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Ae dil-e-nadaan-Razia Sultan 1983

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