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May 28, 2016

जब दीप जले आना-चितचोर १९७६

सन १९७६ में रिलीज़ हुई कुछ फील गुड फिल्मों में से एक
है चितचोर. इस फिल्म के येसुदास के गाये दो गीत बहुत
लोकप्रिय हुए थे. प्रस्तुत गीत भी एक बेहद लोकप्रिय गीत
है जिसे आज भी आप सुन सकते हैं रेडियो पर.

गीत संगीत रवीन्द्र जैन का है. येसुदास संग हेमलता गा
रही हैं. येसुदास सिद्धहस्त मंजे हुए गायक हैं और दोनों
गायकों की  क्वालिटी में अंतर आप महसूस कर सकते हैं.
ऊंचे स्केल पर गाने में हेमलता को दिक्कत आई होगी
इस गीत में ज़रूर. गान में एक अनूठी साहित्यिक टर्म भी
मौजूद है-प्रीत का काजल.




गीत के बोल:

जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना
जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना
संकेत मिलन का भूल न जाना
मेरा प्यार ना बिसराना

जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना

मैं पलकन डगर बुहारूंगा
तेरी राह निहारूंगा
मैं पलकन डगर बुहारूंगा
तेरी राह निहारूंगा
मेरी प्रीत का काजल
तुम अपने नैनों में मले आना

जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना

जहाँ पहली बार मिले थे हम
जिस जगह से संग चले थे हम
जहाँ पहली बार मिले थे हम
जिस जगह से संग चले थे हम
नदियां के किनारे आज
उसी अमवा के तले आना

जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना

ऩि रे गा,  रे गा
मा गा रे स स ऩि,
प प म, रे ग, स नि
स ग प म प

नित सांझ सवेरे मिलते हैं
उन्हें देख के तारे खिलते हैं
नित सांझ सवेरे मिलते हैं
उन्हें देख के तारे खिलते हैं
नित सांझ सवेरे मिलते हैं
उन्हें देख के तारे खिलते हैं

लेते हैं विदा एक दूजे से
कहते हैं चले आना

जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना
संकेत मिलन का भूल न जाना
मेरा प्यार ना बिसराना
जब दीप जले आना
जब शाम ढले आना
…………………………………………………..
Jab deep jale aana-Chitchor 1976

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Jan 30, 2016

तुम्हें हो न हो मुझको तो-घरोंदा १९७७

फिल्म घरोंदा से दो गीत अपने सुने-आबोदाना वाले.
अब सुनिए रुना लैला की आवाज़ में एक गीत जो
काफी लोकप्रिय हुआ. गीत के बोल हैं गुलज़ार के
जिसको संगीतबद्ध किया है जयदेव ने। अमोल पालेकर
और ज़रीना वहाब पर पर ये गीत फिल्माया गया है।

प्रेम के ‘कन्फर्मेट्री टेस्ट के बिफोर’ जो स्तिथि होती है
मन के कन्फ्यूज़न की, कुछ वैसी ही नायिका की है.
रुना लैला की आवाज़ में ताजगी है और उनका एनर्जी
लेवल भी और गायिकाओं से बेहतर है. जनता कुछ
गायिकाओं-विशेष की आवाज़ सुन सुन के पक गई
तो उन्हें ये नई आवाज़ भाने लगी. जनता से तात्पर्य
संगीत सुनने वाली आबादी के कुछ हिस्से से ही है.





तुम्हें हो न हो मुझको तो
तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है

मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
मगर मैंने ये राज़ अब तक ना जाना
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं है
मगर मैंने ये राज़ अब तक ना जाना
फिर भी क्यूँ प्यारी लगती है तुम्हारी ये बातें
मैं क्यूँ तुमसे मिलने का ढूंढूं बहाना
कभी मैंने चाहा तुम्हें छू के देखूं
कभी मैंने चाहा तुम्हें पास लाना
मगर फिर भी
मगर फिर भी इस बात का तो यकीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं है
तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है

फिर भी जो तुम दूर रहते हो मुझसे
तो रहते हैं दिल पे उदासी के साये
फिर भी जो तुम दूर रहते हो मुझसे
तो रहते हैं दिल पे उदासी के साये
कोई ख्वाब ऊंचे मकानों से झांके
कोई ख्वाब बैठा रहे सर झुकाए
कभी दिल कि राहों में फैले अँधेरा
कभी दूर तक रौशनी मुस्कुराये
मगर फिर भी
मगर फिर भी इस बात का तो यकीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं
तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है
............................................................................................
Tumhe ho na ho-Gharonda 1977

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Sep 20, 2015

ये दिन क्या आये-छोटी सी बात १९७५

गीतकार योगेश ७० के दशक में लाइमलाईट में आये. उन्होंने कई
उम्दा किस्म के गीत रचे फिल्मों के लिए. फिल्मों में उनकी सेवा
सलिल चौधरी ने ली, जो श्वेत श्याम युग में शैलेन्द्र के मुरीद थे.
सलिल अपनी धुनों में सेलेक्टिव थे तो अपने बाकी के पहलुओं में
भी. मुकेश से उन्होंने कई अच्छे गीत गवाए. मुकेश की आवाज़ के
भारीपन के वो कायल थे. मुकेश जिन्हें क्लासिकल गीत गाने में
कहिनायी महसूस होती थी, उन्हें सलिल की क्लिष्ट धुनों को गाने
में कोई परेशानी नहीं आई. सलिल एक ऐसे संगीतकार थे जो अपने
गायकों के प्रति बहुत सम्मान रखते थे.

आइये सुनें चर्चित फिल्म छोटी सी बात से एक गीत जो मुकेश का
गाया हुआ है. सन १९७५ की फिल्म छोटी सी बात एक अलग तरह
की फिल्म थी जो उस समय सिनेमा में हो रहे बदलाव का प्रतीक
भी है. प्रयोगवादी दौर था वो, जिसमें शायद सबसे ज्यादा लीक से
हट कर फ़िल्में बनी. 



गीत के बोल:

ये दिन क्या आये लगे फूल हसने
देखो बसंती बसंती होने लगे मेरे सपने

सोने जैसी हो रही हैं हर सुबह मेरी
लगे हर सांझ अब गुलाल से भरी
चलने लगी महकी हुई पवन मगन झूम के
आँचल तेरा चूम के

वहाँ मन बावरा आज उड़ चला
जहाँ पर हैं गगन सलोना सावला
जा के वही रख दे कही मन रंगों में खोल के
सपने ये अनमोल से

ये दिन क्या आये लगे फूल हसने
देखो बसंती बसंती होने लगे मेरे सपने
…………………………………………………………
Ye din kya aaye-Chhoti si baat 1975

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Jul 28, 2015

आने वाला पल जाने वाला है-गोलमाल १९७९

आज सुनते हैं एक प्रेरणादाई गीत जो सकारात्मक सोच के
लिए प्रेरित करता है. वर्त्तमान में जियो वाले सदियों पुराने
सिद्धांत को पुनः याद दिलवाता ये गीत फिल्म गोलमाल से
चुना गया है. गोलमाल सन १९७९ की एक हास्य फिल्म है

७० के दशक के दुसरे भाग में अमोल पालेकर भी अपनी एक
जगह फिल्म उद्योग में बनाने में कामयाब हो गए. ये फिल्म
उनकी सबसे बड़ी हित फिल्मों में से एक है. घरेलू चेहरे मोहरे
वाले अमोल ८० के बाद धीरे धीरे मुख्य धरा के सिनेमा में
दिखना बंद हो गए और कुछ लीक से हटी हुई फिल्मों में वे
दिखते रहे और उसके कुछ समय बाद वे निर्देशक बन गए.

यह गीत किशोर दा का गाया हुआ है और उनके भी बेहतरीन
गीतों में शुमार है. गुलज़ार के लिखे गीत के लिए संगीत दिया
है पंचम ने. फिल्म की नायिका बिंदिया गोस्वामी भी गीत में
दिखाई देंगी आपको.




गीत के बोल:

आने वाला पल जाने वाला है
आने वाला पल जाने वाला है
हो सके तो इसमें जिंदगी बिता दो
पल जो ये जाने वाला है

आने वाला पल जाने वाला है
हो सके तो इसमें जिंदगी बिता दो
पल जो ये जाने वाला है

एक बार यूँ मिली, मासूम सी कली
एक बार यूँ मिली, मासूम सी कली
खिलते हुए कहाँ, खुशबाश में चली
देखा तो यहीं है, ढूंढा तो नहीं है
पल जो ये जाने वाला है
आने वाला पल जाने वाला है
हो सके तो इसमें जिंदगी बिता दो
पल जो ये जाने वाला है

एक बार वक्त से, लम्हा गिरा कहीं
एक बार वक्त से, लम्हा गिरा कहीं
वहाँ दास्ताँ मिली, लम्हा कही नहीं
थोडा सा हँसा के, थोडा सा रुला के
पल ये भी जाने वाला है

आने वाला पल जाने वाला है
हो सके तो इसमें जिंदगी बिता दो
पल जो ये जानेवाला है
आने वाला पल जाने वाला है
आने वाला पल जाने वाला है
..............................................................................
Aane wala pal jaane wala hai-Golmaal 1979

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Jun 12, 2015

कहाँ तक ये मन को-बातों बातों में १९७९

गीतकार योगेश ने कुछ अच्छे और संजीदा गीत लिखे हैं फिल्मों
के लिए. ज्यादा मात्रा में उन्हें अवसर नहीं मिले लेकिन जितना
भी काम है उनका सराहनीय है. सलिल चौधरी ने शायद सबसे
ज्यादा उनकी सेवाएं ली हैं. उसके अलावा राहुल देव बर्मन और
राजेश रोशन ने उन्हें याद किया गीतों के लिए. राजेश रोशन
ने अमित खन्ना के साथ भी काफी काम किया और इस फिल्म
के लिए योगेश का गीतकार के रूप में चयन होना निर्देशक या
निर्माता की वजह से हो सकता है.

‘बातों बातों में’ सन ७९ की एक चर्चित फिल्म है और इसके गीत
बहुत बजे हुए हैं. किशोर कुमार के संजीदा गीतों में इसे शुमार
किया जाता है. आज आप भी आनंद उठायें इसका.



गीत के बोल:

कहाँ तक ये मन को अँधेरे छलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे

कभी सुख, कभी दुःख, यही ज़िन्दगी है
ये पतझड़ का मौसम, घड़ी दो घड़ी है
नए फूल कल फिर डगर में खिलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे

भले तेज़ कितना हवा का हो झोंका
मगर अपने मन में तू रख ये भरोसा
जो बिछड़े सफ़र में तुझे फिर मिलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे

कहे कोई कुछ भी, मगर सच यही है
लहर प्यार की जो, कहीं उठ रही है
उसे एक दिन तो, किनारे मिलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे

कहाँ तक ये मन को अँधेरे छलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे
……………………………………………..
Kahan tak ye man ko-Baaton baaton mein 1979

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Jul 3, 2011

आज से पहले आज से ज़्यादा-चितचोर १९७५

७० के दशक में मारधाड़ और ढिशुम ढिशुम वाली फ़िल्में ज्यादा बनना
शुरू हो गयीं। इनके साथ साथ कोमेडी, हलकी फुलकी साफ़ सुथरी और
पारिवारिक फ़िल्में और कला फ़िल्में भी बनती रहीं। कुछ फ़िल्में बेहद
सफल रहीं। शोले के दौर में ही एक फिल्म आई-चितचोर जिसने धूम
मचाई और जगह जगह सिल्वर जुबली मनाई। इसी फिल्म से एक काफ़ी
लोकप्रिय गीत आज सुनवाते हैं आपको जो येसुदास की आवाज़ में है। गीत
में आपको अमोल पालेकर, विजयेन्द्र घाटगे और ज़रीना वहाब एक बाल
कलाकार मास्टर राजू के साथ दिखाई देंगे।




गीत के बोल:

आज से पहले, आज से ज़्यादा,
खुशी आज तक नहीं मिली।
इतनी सुहानी, ऐसी मीठी,
घड़ी आज तक नहीं मिली।

इसको संयोग कहें या किस्मत का लेखा,
हम जो अचानक मिले हैं।
मनचाहे साथी पाकर हम सब के चेहरे,
देखो तो कैसे खिले हैं।
इन तकदीरों को जोड़ दे ऐसी,
कड़ी आज तक नहीं मिली।

सपना हो जाए वो पूरा, जो हमने देखा,
ये मेरे दिल की दुआ है।
ये पल जो बीत रहे हैं, उसके नशे में,
दिल मेरा गाने लगा है।
हम इसी खुशी को ढ़ूँढ़ रहे थे,
यही आज तक नहीं मिली
..............................
Aaj se pehle aaj se Zyada-Chitchor 1975

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Dec 3, 2010

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा-चितचोर १९७६

७० के दशक में सन ७५ की ढिशुम ढिशुम वाली शोले
के बाद पब्लिक ने बहुत से ढिच्क्युन ढिच्क्युन आवाजों
वाली मार धाड़ भरी फ़िल्में देखी। उसी के साथ साथ
कुछ साफ़ सुथरी और पारिवारिक घरेलू किस्म की फिल्में
भी बनती रहीं। सन १९७६ में आई और गाँव की प्रष्ठभूमि
पर बनी चितचोर भी ऐसी ही एक फिल्म है। सीधी साधी
कहानी और कर्णप्रिय गीतों वाली इस फिल्म को जनता
ने बेहद पसंद किया। आइये इस फिल्म का लोकप्रिय गीत
सुनें जो येसुदास का गाया हुआ है। बोल और संगीत दोनों
रवीन्द्र जैन के हैं। गीत से एक नया शब्द सीखने को मिला
-चन्द्रमधु ।



गीत के बोल:

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा
मैं तो गया मारा आ के यहाँ रे
उस पर रूप तेरा सादा
चन्द्रमधु आधा आधा जवाँ रे

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा
मैं तो गया मारा आ के यहाँ रे
आ के यहाँ रे

जी करता है मोर कि पैरों में
पायलिया पहना दूँ
कुहू कुहू गाति कोयलिया को
फूलों क गहना दूँ

यहीं घर अपना बनाने को, पंछी करे देखो
तिनके जमा रे तिनके जमा रे

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा
मैं तो गया मारा आ के यहाँ रे
आके यहाँ रे

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
लोग भी फूलों जैसे
आ जाये इक बार यहाँ जो
जायेगा फिर कैसे
झर झर झरते हुए झरने, मन को लगे हरने
ऐसा कहाँ रे ऐसा कहाँ रे

उसपर रूप तेरा सादा
चन्द्रमधु आधा, आधा जवाँ रे
आधा जवाँ रे

परदेसी अन्जान को ऐसे
कोई नहीं अपनाता
तुम लोगों से जुड़ गया जैसे
जनम जनम का नाता
अपने धुन में मगन डोले, लोग यहाँ बोले
दिल की ज़बाँ रे दिल की ज़बाँ रे

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा
मैं तो गया मारा आ के यहाँ रे

उसपर रूप तेरा सादा
चन्द्रमधु आधा
आधा जवाँ रे

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Oct 30, 2009

दो दीवाने शहर में-घरोंदा १९७७

घरोंदा फ़िल्म एक संघर्षरत युवक की कहानी है जो आशियाने की
तलाश में तरह तरह के प्रयत्न करता है। बड़े शहरों में सामान्य
वेतन वाले कर्मचारी के लिए अपने मकान की कल्पना करना एक
दिवा स्वप्न जैसा है। सीमित संसाधनों के चलते वो प्रयास करने
की स्थिति में भी नहीं होता और किराये के मकान में ज़िन्दगी
गुजार देता है। ये गाना उन दिनों में आया था जब हमारे बाज़ारों
में करोंदा नाम का खाद्य पदार्थ मिला करता था। उपवासी जनता
साबूदाने का काफ़ी प्रयोग करती थी । कुछ मनचले युवक इस गाने
को यूँ पहचाना करते- फ़िल्म करोंदा से साबूदाना वाला गाना। तो
जनाब गाने याद रहने की एक अजीबोगरीब वजह है ये। दूसरी वजह
ये है की इस गाने में गायक भूपेंद्र का साथ दिया है रुना लैला ने
जो बांग्लादेश की प्रसिद्ध गायिका हैं और बहुत ही तबियत से गाने
गाती हैं। बंगला संगीत जगत उनको हिन्दी फिल्मों के पहले से
जानता है। गीत में अमोल पालेकर और ज़रीना वहाब कलाकार हैं।



गीत के बोल :

भूपेंद्र : दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढते हैं एक आशियाना ढूँढते हैं
रुना : दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढते हैं एक आशियाना ढूँढते हैं

रुना: इन भूलभुलइया गलियों में, अपना भी कोई घर होगा
अम्बर पे खुलेगी खिड़की या, खिड़की पे खुला अम्बर होगा
भूपेंद्र: इन भूलभुलइया गलियों में, अपना भी कोई घर होगा
अम्बर पे खुलेगी खिड़की या, खिड़की पे खुला अम्बर होगा

असमानी रंग की आँखों में
रुना: असमानी या आसमानी?
भूपेंद्र: असमानी रंग की आँखों में
बसने का बहाना ढूंढते हैं, ढूंढते हैं
रुना: आबोदाना ढूंढते हैं, एक आशियाना, ढूंढते हैं

दोनों: दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढते हैं एक आशियाना ढूँढते हैं
दो दीवाने शहर में,

रुना: हा आ आ आ आ
भूपेंद्र: जब तारे ज़मीं पर चलते हैं
रुना: तारे, और ज़मीं पर?
भूपेंद्र: of course
भूपेंद्र: जब तारे ज़मीं पर चलते हैं
रुना: हूँ हूँ हूँ...
भूपेंद्र: आकाश ज़मीं हो जाता है
रुना: आ आ आ
भूपेंद्र: उस रात नहीं फिर घर जाता, वो चांद यहीं सो जाता है
रुना: जब तारे ज़मीं पर चलते हैं
आकाश ज़मीं हो जाता है
उस रात नहीं फिर घर जाता, वो चांद यहीं सो जाता है
भूपेंद्र: पल भर के लिये
रुना: पल भर के लिये
भूपेंद्र: पल भर के लिये, इन आँखों में, हम एक ज़माना ढूंढते हैं, ढूंढते हैं
रुना: आबोदाना, ढूंढते हैं एक आशियाना, ढूंढते हैं
...................................
Do deewane shahar mein-Gharonda 1977

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Jun 2, 2009

एक अकेला इस शहर में-घरोंदा १९७७

आज एक दर्द भरा गीत गुलज़ार का लिखा हुआ फिल्म घरोंदा से।
टूटा हुआ सा नायक महानगर में अपने सपनों के घर की तलाश
में है। उसकी भावनाएं किस तरह से बाहर आती हैं आइये जानने
के लिए सुनें ये गीत। गायक हैं भूपेंद्र । गीत के बोल हैं गुलज़ार के
जिसको संगीतबद्ध किया है जयदेव ने। अमोल पालेकर नाम के
कलाकार पर ये गीत फिल्माया गया है।

किस म्युनिसिपेलटी के बंद हो चुके नल की मानिंद आंसू एक मिनट
में एक वाले अंदाज़ में निकलने का मतलब है दर्द की इन्तहा हो चुकी है
और आंसुओं का स्टॉक खत्म हो गया है.
................



गाने के बोल:

एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढता है, आशियाना ढूँढता है

दिन खाली खाली बर्तन है
दिन खाली खाली बर्तन है, और रात है जैसे अंधा कुआँ
इन सूनी अन्धेरी आँखों में, आँसू की जगह आता हैं धुआं
जीने की वजह तो कोई नहीं, मरने का बहाना ढूँढता है

एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढता है, आशियाना ढूँढता है
एक अकेला इस शहर में

इन उम्र से लम्बी सड़कों को
इन उम्र से लम्बी सड़कों को, मन्ज़िल पे पहुँचते देखा नहीं
बस दौड़ती फिरती रहती हैं, हम ने तो ठहरते देखा नहीं
इस अजनबी से शहर में, जाना पहचाना ढूँढता है

एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढता है, आशियाना ढूँढता है
एक अकेला इस शहर में

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