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Jul 17, 2011

झननन झन झननन झन बाजे पायलिया-रानी रूपमती १९५९

आपको फिल्म रानी रूपमती से कानों की कसरत करवाने वाला
एक और मधुर गीत सुनवाते हैं. ये लता और रफ़ी का गाया युगल
गीत है जिसे भारत भूषण और निरूपा राय पर फिल्माया गया है.
भारत व्यास के बोल है और श्रीनाथ त्रिपाठी का संगीत है. विडियो
में आपको मांडू की ऐतिहासिक इमारतें दिखाई देंगी.






गीत के बोल :


अमिय हलाहल मदभरे श्वेत श्याम रतनार
जियत मरत झुकि झुकि परत जेहि चितवत एक बार

झननन झन झननन झन झननन बाजे पायलिया
झननन झन झननन झन झननन बाजे पायलिया
पिया से मिलन चली आज कामिनिया
झननन झन झननन झन झननन बाजे पायलिया
झननन झन झननन झन झननन

ओ ओ ओ ओ ओ
रात अन्धेरी डर लागे रसिया
रात अन्धेरी डर लागे रसिया
पास कैसे आऊँ तोरे मनबसिया
पपीहा बोले
पपीहा बोले अम्रित घोले जियरा डोले हौले हौले हौले
झननन झन झननन झन झननन बाजे पायलिया
झननन झन झननन झन झननन बाजे

सज सिंगार कोई नार नवेली
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
सज सिंगार कोई नार नवेली
निडर डगर में चली है अकेली
ऋतु बसन्त आई अलबेली
डार डार बोले कारी कोयलिया
झननन झन झननन झन झननन बाजे पायलिया
झननन झन झननन झन झननन

ल : ओ ओ ओ ओ ओ
प्यार जगा है देखो कण कण में
प्यार जगा है देखो कण कण में
रास रसा है मन मधुबन में
बजे मंजीरे
बजे मंजीरे जमुना तीरे मैं तो चली रे धीरे धीरे धीरे
झननन झन झननन झन झननन बाजे पायलिया

झननन झन झननन झन झननन बाजे
बाजे पायलिया
झनन झन झन बाजे पायलिया
झनन झनन बाजे पायलिया
झन झन बा झन झन बा झन झन बा
आ आ आ आ आ आ आ
झनन झनन झनन झनन बाजे
झनन झनन झनन झनन बाजे
झनन झनन झनन झनन बाजे

आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
बा आ आ आ आ जे
बा आ आ आ आ जे
बा आ आ आ आ जे
हा आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
झननन झन झननन झन झननन बाजे
....................................
Jhananan jhan baaje-Rani Roopmati 1957

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नुक्ताचीं है गम-ए-दिल-मिर्ज़ा ग़ालिब १९५५

पिछली एक पोस्ट में सहगल का गाया हुआ "नुक्ताचीं..." आपने सुना।
१९५४ में एक फिल्म आई 'मिर्ज़ा ग़ालिब' जिसमे ग़ालिब की रचनाएँ
कई कलाकारों ने गयीं। संगीत तैयार किया गुलाम मोहम्मद ने जिनकी
पहचान बढ़ाने में इस फिल्म के संगीत का बड़ा योगदान रहा। फिल्म में
भारत भूषण और सुरैया मुख्य भूमिकाओं में हैं। बतौर श्रोता मैं इस फिल्म
के गीतों से बहुत प्रभावित रहा। इस फिल्म के साथ बहुत सी नामचीन हस्तियाँ
जुड़ीं जिनका जिक्र किसी और गीत के साथ।



गीत के बोल:

नुक्ताचीं है गम-ए-दिल उसको सुनाये न बने
उसको सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ, बात बनाये न बने
बात बनाये न बने
बात बनाये न बने

नुक्ताचीं है गम-ए-दिल

गैर फिरता है लिए यूँ तेरे खत को के अगर
कोई पूछे के ये क्या है तो छुपाये न बने तो
तो छुपाये न बने

नुक्ताचीं है गम-ए-दिल

मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उसपे बन आये कुछ ऐसी के बिन आये न बने
उसपे बन आये कुछ ऐसी के बिन आये न बने
के बिन आये न बने

नुक्ताचीं है गम-ए-दिल

इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब
इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब
के लगाये न लगे और बुझाये न बने
और बुझाये न बने

नुक्ताचीं है गम-ए-दिल उसको सुनाये न बने
उसको सुनाये न बने
.......................................................................
Nuktacheen hai gham-e-dil-Mirza Ghalib 1955

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Mar 7, 2010

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है-मिर्ज़ा ग़ालिब १९५४

उनींदी सी नायिका ये ग़ज़ल गा रही है। सुरैया और तलत महमूद
की गाई इस मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल को संगीतबद्ध किया है संगीतकार
गुलाम मोहम्मद ने । ये काफी चर्चित गीत है और अक्सर इसको रेडियो
वाले पुराने फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम में जगह दिया करते हैं। मूल ग़ज़ल
में कुछ शेर और हैं जिनको फ़िल्मी संस्करण में जगह नहीं मिली है।

गीत के आखिर में नायिका के भाव कुछ यूँ हो गए हैं जैसे उसने कड़वा
करेला चबा लिया हो। फिल्म में मिर्ज़ा ग़ालिब की भूमिका निभाई है
भारत भूषण ने और उनके चेहरे के भाव संयमित हैं।



गीत के बोल:


दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही, ये माजरा क्या है

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है

मैं भी मुह में ज़ुबान रखता हूँ
मैं भी मुह में ज़ुबान रखता हूँ
काश पूछो की मुद्दा क्या है

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है

जान तुम पर निसार करता हूँ
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

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Jan 15, 2010

मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना-चन्द्रकांता १९५६

आज इस दशाब्दी का पहला सूर्य ग्रहण है। सूर्य ग्रहण के दिन
सारे चाँद वाले गाने याद आ रहे हैं। कम्पूटर भी शायद चाँद को
याद कर रहा है। ऐसे समय बहुत से गीत याद आ रहे हैं, जो सबसे
पहले याद आया वो प्रस्तुत है इधर, फिल्म चन्द्रकान्ता से जो सन
१९५६ में आई थी। भारत भूषण और बीना राय इस फिल्म के
प्रमुख कलाकार हैं। फिल्म का निर्देशन जी पी सिप्पी ने किया था।
ये जी पी सिप्पी शोले फिल्म वाले हैं। फिल्म में संगीत एन दत्ता
का है और बोल लिखे हैं साहिर लुधियानवी ने। साहिर के बारे में कहा
जाता है कि वे गाना कैसा बन रहा है उसपर नज़र रखा करते थे,
शायद इसी वजह से उनके लिखे अधिकांश गीत हमें मधुर सुनाई देते
हैं। कभी कभी उनका दखल ज्यादा हो जाया करता था। जिस संगीतकार
को उनके इस स्वाभाव से कोई शिकायत नहीं थी वे उनके साथ लगातार
काम करते रहे। एन दत्ता ऐसा ही एक नाम है। ये एक निराशावादी गीत
है और कई मदिराप्रेमियों को मैंने सुरूर में आने के बाद इसको सुनते हुए
देखा है।




गीत के बोल:

मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ ना मिला
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

मैं वो नगमा हूँ जिसे प्यार कि महफ़िल ना मिली
मैं वो नगमा हूँ जिसे प्यार कि महफ़िल ना मिली
वो मुसाफिर हूँ जिसे कोई भी मंजिल ना मिली
वो मुसाफिर हूँ जिसे कोई भी मंजिल ना मिली
ज़ख्म पायें हैं बहारों की तमन्ना की थी

मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

किसी गेसू किसी आँचल का सहारा भी नहीं
किसी गेसू किसी आँचल का सहारा भी नहीं
रास्ते में कोई धुन्धला सा सितारा भी नहीं
रास्ते में कोई धुन्धला सा सितारा भी नहीं
मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी

मैंने चाँद और सितारों कि तमन्ना की थी
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ ना मिला
मैंने चाँद और सितारों कि तमन्ना की थी

मेरी राहों से जुदा हो गयीं राहें उनकी
मेरी राहों से जुदा हो गयीं राहें उनकी
आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उनकी
आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उनकी
जिनसे इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी

मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले
प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले
चैन चाह तो उमड़ते हुए तूफ़ान मिले
चैन चाह तो उमड़ते हुए तूफ़ान मिले
डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी

मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ ना मिला
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

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Dec 23, 2009

सुध बिसर गई आज-संगीत सम्राट तानसेन १९६२

१९६२ का साल भी काफ़ी समृद्ध वर्ष रहा फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में। एक और
गुणी संगीतकार जो आखिरी के वर्षों में केवल धार्मिक और पौराणिक फिल्मों तक
सिमट कर रह गए वो हैं- एस एन त्रिपाठी जिनका पूरा नाम श्रीनाथ त्रिपाठी है।
इस फ़िल्म के निर्देशक भी वे स्वयं हैं।

संगीत सम्राट तानसेन फ़िल्म को वो प्रशंसा नहीं मिली दर्शकों की, जो इसी विषय
पर बनी फ़िल्म बैजू बावरा को प्राप्त हुई, हालांकि फ़िल्म बैजू बावरा में तानसेन के
ऊपर दृश्य कम थे। एक तुलना जैसी बात हो जाती है जब भी उसी विषय पर बाद
में फ़िल्म आती है। अनारकली फ़िल्म और मुग़ल ऐ आज़म का अलग रहा। दोनों ही
हिट फ़िल्में रही । अनारकली पहले आई और मुग़ल ऐ आज़म बाद में , लेकिन बाद
में आई फ़िल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान बना दिए। फ़िल्म में एक कारक नहीं
वरन कई कारण होते हैं उसको सफल बनने में। एक भी अवयव कहीं कमज़ोर रह
जाए तो वो तकलीफ देता है। कई अच्छी अच्छी फ़िल्में केवल बेकार संपादन की वजह
से पिट गयीं।

ये जो गीत है इसमे भारत भूषण आपको नज़र आयेंगे। भारत भूषण को फ़िल्म
बैजू बावरा से अपार प्रसिद्धि हासिल हुई थी। बैजू बावरा फिल्म में उन्होंने बैजू का
किरदार निभाया था । इस गीत को गाया है मन्ना डे और रफ़ी ने। बोल लिखे हैं
शैलेन्द्र ने जिन्होंने फ़िल्म के अनुरूप बढ़िया लेखन किया है।
"हर राग में पीर है किसके मन की ?"



गीत के बोल:

सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की

सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की

आई गई बात बीते दिनन की

सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की

बिखरे सपन सारे विघ्ना से हम हारे
बिखरे सपन सारे विघ्ना से हम हारे
आंसुओं में डूबी हैं पलकें नयन की
पलकें नयन की

सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की

जियरा के दो टूट, गयी प्रेरणा रूठ
जियरा के दो टूट, गयी प्रेरणा रूठ

घुट घुट गई सूख
सरिता सुरन की
सरिता सुरन की

हा आ आ, सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की
आई गई बात बीते दिनन की

सुध बिसर गई आज

ध नि सा म, म ग म ध, ध म ध स
नि स ग, स नि स नि, ध नि ध, म ध म
ग म ध म ध नि स नि ध प म,
नि ध प म, नि ध प म

सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की

हाय रे कलाकार जाने न संसार
हर राग में पीर है किसके मन की
हर राग में पीर है किसके मन की
हाय, किसके मन की

सुध बिसर गई आज
अपने गुनन की

सुध बिसर गयी आज
अपने गुनन की
आ ही गयी बात बीते दिनन की

सुध बिसर गयी
आज अपने गुनन की
....................................
Sudh bisar gayi-Sangeet Samrat Tansen 1962

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Dec 20, 2009

बचपन की मोहब्बत को-बैजू बावरा १९५२

ज़ख्म जब हरे होते हैं तो उनमे से टीस उभरती है। अपनी भावनाओं को
कोई कितना भी दबाये वो बाहर आने का ज़रिया ढूंढ निकालती हैं। बात
मुझ पर भी लागू होती है । यादें जब बाहर निकलती हैं तो चायनीज नूडल
की भांति हाथ से फिसलना शुरू कर देती हैं और कुर्सी मेज़ के इर्द गिर्द
जमा हो जाती हैं।

इस गीत के साथ कुछ यादें जुडी हुई हैं। जब जब इसको सुनता हूँ मुझे
अपनी बदकिस्मती पर रंज होने लगता है। मेरी पसंद के गीत मैं इस
ब्लॉग में शामिल करता रहा हूँ उसी कड़ी में ये पेश है बैजू बावरा का गीत।
शकील बदायूनी के अच्छे गीतों में इसको गिना जा सकता है।



गीत के बोल:


हो जी हो, ओ ओ ओ ओ
बचपन की मोहब्बत को, दिल से ना जुदा करना

बचपन की मोहब्बत को, दिल से ना जुदा करना
जब याद मेरी आये, मिलने की दुआ करना

बचपन की मोहब्बत को, दिल से ना जुदा करना
जब याद मेरी आये, मिलने की दुआ करना

घर मेरी उम्मीदों का, सूना किये जाते हो
हो जी हो, ओ ओ ओ ओ
दुनिया ही मुहब्बत की, लूटे लिए जाते हो
जो ग़म दिए जाते हो, उस ग़म की दवा करना

बचपन की मोहब्बत को, दिल से ना जुदा करना
जब याद मेरी आये, मिलने की दुआ करना

सावन में पपीहे का, संगीत चुराऊँगी
हो जी हो, ओ ओ ओ ओ
फ़रियाद तुम्हें अपनी, गा गा के सुनाउंगी
आवाज़ मेरी सुन के, दिल थाम लिया करना

बचपन की मोहब्बत को, दिल से ना जुदा करना
जब याद मेरी आये, मिलने की दुआ करना

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Dec 15, 2009

बदली बदली दुनिया है मेरी-संगीत सम्राट तानसेन १९६२

एक कर्णप्रिय युगल गीत लता और महेंद्र कपूर का गाया हुआ
सुनिए जो धीमा है और हलके हलके आपको आनंदित करता
है। इसे लिखा है शैलेन्द्र ने और धुन बनाई है एस एन त्रिपाठी
ने। ये फिल्म सन १९६२ में आई थी और इसमें तानसेन की
भूमिका में भारत भूषण हैं। अनीता गुहा नाम की अभिनेत्री
परदे पर दिखाई देंगी आपको जिन्होंने फिल्म में हंसा नाम के
चरित्र की भूमिका निभाई थी।



गीत के बोल:

बदली बदली दुनिया है मेरी
जादू है ये क्या तेरे नैनन का
बनके कजरा अँखियों में रहा
एक सुंदर सपना बचपन का
बनके कजरा अँखियों में रहा
एक सुंदर सपना बचपन का

कहती थी सदा दिलकी धड़कन
कहती थी सदा दिलकी धड़कन
तू बैठ बिछाके अपने नयन
सच्ची है अगर ये तेरी लगन
लौट आएगा साथी जीवन का

बदली बदली दुनिया है मेरी

मेरे गीतों के चंचल स्वर
मेरे गीतों के चंचल स्वर
आए होंगे बादल बनकर
बरसे होंगे इस आँगन पर
देके संदेस मेरे मन का

बदली बदली दुनिया है मेरी

इस रात को चाँद तले ये मिलन
इस रात को चाँद तले ये मिलन
चुप देख रहा है नील गगन
दौहरायेगा ये मद-मस्त पवन
संगीत हमारी धड़कन का

बदली बदली दुनिया है मेरी
.............................
Badli badli duniya hai meri-Sangeet samrat Tansen 1962

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Oct 28, 2009

इंसान बनो- बैजू बावरा १९५२

ज्यादा बारूद खर्च करने से स्वर्ण पदक नहीं मिला करते ।
इसलिए इस गीत के साथ ज्यादा विवरण न देते हुए केवल
इसके बोल दे रहा हूँ । ये उन सभी के लिए है जो चुपचाप
आके ब्लॉग पे नज़र मार जाते हैं और दूसरे तीसरे दिन
वो गाना यू-ट्यूब से गायब मिलता है। कुछ ख़ास सदस्यों के
विडियो यू-ट्यूब पर कायम रहते हैं जिन्होंने एम्बेडिंग को
डिसएबल कर रखा है । सोचता हूँ केवल म्यूजिक
कम्पनी के विडियो का लिंक ही दिया करुँ जो कमसे कम
कायम तो रहेगा । उस भली आत्मा का धन्यवाद् जिसने
बैजू बावरा का मेरा पसंदीदा गीत यू-ट्यूब पर लोड किया।

ब्लॉग जगत पर भी ड्रामा तो वही है जो दूसरी जगह होता
है । आख़िर आदमी तो वही है चाहे ब्लॉग पे हो या
स्नानघर में । अब मेरे पास दूसरे ब्लॉग रचनाकारों की
तरह न इतना टाइम है न फुर्सत कि ४-५ छद्म आइ. डी.
बना के वाह वाह लिखता फिरूं ।

ब्लॉग जगत की 'उड़ती वस्तुएं' और 'एलिएन' शायद
इस ब्लॉग को दूसरे ग्रह का मसाला मानते हैं, इसलिए
यहाँ टिप्पणियां ज्यादा नहीं है । वैसे मैं उनको धन्यवाद्
देना चाहूँगा इस ब्लॉग को साफ़ सुथरा बनाये रखने में
योगदान देने के लिए । टिप्पणी दे उसका भला, जो ना दे
उसका भी भला।



गाने के बोल:

निर्धन का घर लूटने वालों
लूट लो दिल का प्यार
प्यार वो धन है जिसके आगे
सब धन हैं बेकार
ओ ...............

इंसान बनो
कर लो भलाई का कोई काम
इंसान बनो

दुनिया से चले जाओगे
रह जाएगा बस नाम
इंसान बनो

हो, इस बाग़ में सूरज भी निकलता है लिए गम
फूलों की हँसी देख के रो देती है शबनम

कुछ देर की खुशियाँ हैं तो कुछ देर का मातम
किस नींद में हो ?
किस नींद में हो, जागो ज़रा, सोच लो अंजाम

इंसान बनो

हो, लाखों यहाँ शान अपनी दिखाते हुए आए
दम भर के लिए लाज गए धूप में साए

वो भूल गए थे के ये दुनिया है सराय
आता है कोई,
आता है कोई सुबह तो, जाता है कोई शाम

इंसान बनो

हो, क्यूँ तुमने लगाये हैं यहाँ ज़ुल्म के डेरे
धन साथ न जाएगा, बने क्यूँ हो लुटेरे

पीते हो गरीबों का लहू शाम सवेरे
ख़ुद पाप करो,
ख़ुद पाप करो, नाम हो शैतान का बदनाम

इंसान बनो
कर लो भलाई का कोई काम
इंसान बनो

दुनिया से चले जाओगे
रह जाएगा बस नाम
इंसान बनो

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Aug 12, 2009

दिल की तमन्ना थी-ग्यारह हज़ार लड़कियां १९६२

भारत भूषण की छबि एक विनम्र और भोले नायक की बनी हुई है।
अगर आप पढने का चश्मा लगते हैं तो इस विडियो को चश्मा लगा
के ही देखें। दूर से आपको लगेगा कि शम्मी कपूर या जॉय मुखर्जी हैं
जो रोमांटिक गीत गा रहे हैं। इस गीत में माला सिन्हा और भारत भूषण
रोमांस करते नज़र आयेंगे आपको। ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित
इस फ़िल्म के बारे में ज्यादा मसाला नहीं मिलेगा आपको पढने को ।
इस गीत को मजरूह ने लिखा, एन दत्ता ने स्वरबद्ध किया और रफ़ी ने
गाया है। रफ़ी और आशा के गाये लगभग ७०० युगल गीतों में करीब
२००-३०० कर्णप्रिय हैं। आप इस गीत को पहले १०० में शामिल कर सकते
हैं।



गाने के बोल:

र:अपना भी कोई साथी होता
अपना भी कोई साथी होता, हम भी बहकते चलते-चलते

र: दिल की तमन्ना थी मस्ती में, मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता, हम भी बहकते चलते-चलते

र:हो, दिल की तमन्ना थी मस्ती में, मंज़िल से भी दूर निकलते
दोनों:अपना भी कोई साथी होता, हम भी बहकते चलते-चलते
हो, दिल की तमन्ना थी

आ: होते कहीं, हम और तुम, ख्वाबों की रँगीन वादी में गुम
होते कहीं, हम और तुम, ख्वाबों की रँगीन वादी में गुम
र: फिर उन ख्वाबों की वादी से, उठते आँखें मलते-मलते

दोनों:दिल की तमन्ना थी मस्ती में, मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता, हम भी बहकते चलते-चलते
हो, दिल की तमन्ना

र: हँसती ज़मीं, गाते कदम, चलते नज़ारे, चलते जो हम
हँसती ज़मीं, गाते कदम, चलते नज़ारे, चलते जो हम
आ: रुकते हम तो रुक-रुक जाता, ढलता सूरज ढलते-ढलते

दोनों:दिल की तमन्ना थी मस्ती में, मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता, हम भी बहकते चलते-चलते
हो, दिल की तमन्ना


र: और शाम-ऐ-गम बनके अगर दुःख के अंधेरे करते सफल
आ: राहों के दीपक बन जाते प्यार भरे दिल जलते जलते

दोनों:दिल की तमन्ना थी मस्ती में, मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता, हम भी बहकते चलते-चलते
हो, दिल की तमन्ना
...........................................
Dil ki tamanna thi masti mein-Gyarah Hazaar ladkiyan 1962

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May 25, 2009

झूमती चली हवा-संगीत सम्राट तानसेन १९६२

मुकेश का गाया ये एक सदाबहार गीत है। फ़िल्म में तानसेन बने
भारत भूषण इसे गा रहे हैं परदे पर। उन्हें कौन याद आया ये जानने
के लिए आपको फ़िल्म देखनी पड़ेगी । गीत शैलेन्द्र का लिखा हुआ है
और धुन बनाई है एस. एन. त्रिपाठी ने।



गीत के बोल:

झूमती चली हवा
झूमती चली हवा, याद आ गया कोई
बुझती बुझती आग को, फिर जला गया कोई

झूमती चली हवा ...

खो गई हैं मंज़िलें, मिट गये हैं रास्ते
खो गई हैं मंज़िलें, मिट गये हैं रास्ते
गर्दिशें ही गर्दिशें, अब हैं मेरे वास्ते
अब हैं मेरे वास्ते
और ऐसे में मुझे, फिर बुला गया कोई
झूमती चली हवा ...

चुप हैं चाँद चाँदनी, चुप ये आसमान है
चुप हैं चाँद चाँदनी, चुप ये आसमान है
मीठी मीठी नींद में, सो रहा जहान है
सो रहा जहान है
आज आधी रात को, क्यों जगा गया कोई

झूमती चली हवा ...

एक हूक सी उठी, मैं सिहर के रह गया
एक हूक सी उठी, मैं सिहर के रह गया
दिल को अपना थाम के आह भर के रह गया
आह भर के रह गया
चाँदनी की ओट से मुस्कुरा गया कोई

झूमती चली हवा ...
..................................
Jhoomti chali hawa-Sangeet samrat Tansen 1962

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