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Feb 4, 2020

प्यार है इक निशान क़दमों का-मुक्ति १९७७

दर्शन पर कोई गीत सुने काफ़ी दिन हो गए हैं. ऐसे
गीत अवश्य सुनना चाहिए जिससे हीलियम गैस थोड़ी
नियंत्रण में रहे और मन का गुब्बारा ज्यादा ऊपर ना
उड़ के ज़मीन के नज़दीक रहे.

संगीत भक्त इतने सारे gem गिनवा देते हैं कि उसके
बाद तरह तरह के जैम और मुरब्बे याद आने लगते हैं
और मुंह में पानी आने लगता है.

सुनते हैं एक उम्दा बोलों वाला गीत फिल्म मुक्ति से
जिसे आनंद बक्षी ने लिखा है. इसकी धुन आर डी बर्मन
ने बनाई है और इसे रफ़ी ने गाया है. इसे फिल्म के
टाईटल्स पर फिल्माया गया है.



गीत के बोल:

मिल जाती है संसार में संसार से मुक्ति
मिलती नहीं मर के भी मगर प्यार से मुक्ति

प्यार है इक निशान क़दमों का
प्यार है इक निशान क़दमों का
जो मुसाफ़िर के बाद रहता है
प्यार है इक निशान क़दमों का
जो मुसाफ़िर के बाद रहता है
भूल जाते हैं लोग सब लेकिन
कुछ ना कुछ फिर भी याद रहता है
प्यार है इक निशान क़दमों का

रोक लेती हैं राह में यादें
जब भी राहों से हम गुज़रते हैं
रोक लेती हैं राह में यादें
जब भी राहों से हम गुज़रते हैं
खो गये क़हक़हों में जो उनको
आँसुओं में तलाश करते हैं
दिल पे हल्की सी चोट लगती है
दर्द आँखों से टूट बहता है

प्यार है इक निशान क़दमों का

कुछ भी तो कम नहीं हुआ देखो
ज़ख्म हैं फूल हैं बहारें हैं
कुछ भी तो कम नहीं हुआ देखो
ज़ख्म हैं फूल हैं बहारें हैं
तुम नहीं हो मगर तुम ही तुम हो
सब तुम्हारी ही यादगारें हैं
टूट जाने से टूट जाते हैं
दिल के रिश्ते ये कौन कहता है

प्यार है इक निशान क़दमों का

ये ग़लत है के मरने वालों को
ज़िंदगी से निजात मिलती है
ये ग़लत है के मरने वालों को
ज़िंदगी से निजात मिलती है
इस बहाने से ग़म के मारों को
और लम्बी हयात मिलती है
माना ज़ंजीरें टूट जाती हैं
आदमी फिर भी क़ैद रहता है
भूल जाते हैं लोग सब लेकिन
कुछ ना कुछ फिर भी याद रहता है

प्यार है इक निशान क़दमों का
जो मुसाफ़िर के बाद रहता है
…………………………………………………
Pyar hai ek nishan-Mukti 1977

Artists: Pehchano kaun ?

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Oct 2, 2018

कभी कुछ खोया कभी कुछ पाया-जिंदगी एक जुआ १९९१

बहुत दिनों के बाद एक बार फिर से सभी पाठकों का स्वागत है.
आशा है पिछले पोस्ट पढ़ कर आप सभी ने आनंद उठाया होगा.

अंतरात्मा मनुष्य की सबसे बड़ी पथप्रदर्शक है. जब तक मनुष्य
इस बात को समझ पाता है उम्र ढल जाती है. हम उन सयानों की
बात नहीं कर रहे जो पैदाइशी सर्व-ज्ञानी होते हैं. ये तो बात है एक
आम मनुष्य की.

अंतरात्मा शब्द का किसी ज़माने में हमें अर्थ पता नहीं होता था.
जिन जिन शब्दों में शुरू में अंतर लगा होता उनसे हम अनुमान
लगाया करते कि इसका अर्थ क्या होगा. अंतर्राज्यीय, अंतर्राष्ट्रीय
जैसे शब्द समाचारों और अख़बारों में खूब सुनाई और दिखलाई देते
थे. फिर एक दिन हमने संधि विच्छेद करके समझने की कोशिश
की- अंतर+आत्मा. इससे कुछ कुछ समझ आया कि ये विशेष किस्म
की आत्मा है. उस समय तक कोई बाबाजी, ज्ञानीजी से हमारा
संपर्क नहीं हुआ था और ज्ञान की स्रोत सीमित थे और बाबागिरी
की इंडस्ट्री भी उतना फली फूली नहीं थी.

समय बड़ा बलवान है और ये धीमे धीमे सब उजागर करता चलता
है चाहे वो शब्द का अर्थ हो या किसी का चरित्र.

सुनते हैं एक जीवन दर्शन वाला गीत. गीत ९० के दशक की फिल्म
जिंदगी एक जुआ से है जिसमें नायक अपनी कहानी गीत के ज़रिये
कह रहा है.




गीत के बोल:

आज हमने सबक वो पढ़ डाला
जिसको दुनिया किताब कहती है
और एक ऐसा काम कर डाला
जिसको दुनिया हिसाब कहती है

कभी कुछ खोया कभी कुछ पाया
कभी कुछ खोया कभी कुछ पाया
कभी कुछ खोया कभी कुछ पाया
जब पा लिए खुश हो गए
जब खो दिया दिल रो दिया
इसी खोने पाने का नाम जिंदगी है
बिना खोये पाए नाकाम जिंदगी है
.........................................................
Kabhi kuchh khoya-Zindagi ek jua 1991

Artists: Anil Kapoor, Shakti Kapoor, Madhuri Dixit

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May 4, 2018

दर्पण झूठ ना बोले-दर्पण १९७०

ये फिल्म दर्पण का शीर्षक गीत है. मन्ना डे ने इसे गाया है.
आनंद बक्षी की रचना है और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का संगीत.
नायक अपनी कार में चला जा रहा है और पार्श्व में ये गीत
बज रहा है.

सत्य कड़वा होता है इस वजह से जनता को इसे सुनना पसंद
नहीं होता. सत्य का मार्ग कंटकाकीर्ण है अतः उस पर कदम
बढाने में हर किसी की सांस फूलती है. बहुत हिम्मत वाले भी
इस पर चल कर दुनिया के रुख की वजह से अपना साहस खोते
नज़र आते हैं. अंत में विजय शूरवीरों की ही होती है. जीवन
में इस प्रकार की जंग का निरंतर सामना करने वाले को हम
शूरवीर नहीं तो और क्या कहेंगे.

सत्य के मार्ग पर मीठी गोलियाँ और चॉकलेट नहीं मिला करती.
इस पर नरम नरम गद्दे और बिछौने बी नहीं होते. धिक्कार और
घृणा अवश्य मुफ्त प्राप्त होती रहती है कदम कदम पर.






गीत के बोल:

दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले
दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले
जो सच था तेरे सामने आया
हंस ले चाहे रो ले
दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले
दर्पण झूठ ना बोले

बंधन तोडा जा सकता है
जग को छोड़ा जा सकता है
बंधन तोडा जा सकता है
जग को छोड़ा जा सकता है
अपने आप से भाग रहे हो
अपने आप से भाग रहे हो
तुम हो कितने भोले हो
दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले

दूर किनारा टूटी नैया
लेकिन पूछे ये पुरवैया
दूर किनारा टूटी नैया
लेकिन पूछे ये पुरवैया
अपने आप बने तुम मांझी
अपने आप बने तुम मांझी
फिर काहे मन डोले
दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले

ऐसी हैं जीवन की बतियाँ
या तो ये मन मींच ले अँखियाँ
ऐसी हैं जीवन की बतियाँ
या तो ये मन मींच ले अँखियाँ
या फिर ना घबराये जब
सच्चाई घूंघट खोले

दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले
जो सच था तेरे सामने आया
हंस ले चाहे रो ले
दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले
दर्पण झूठ ना बोले दर्पण झूठ ना बोले
……………………………………………………….
Darpan jhooth na bole-Darpan 1970

Artist: Sunil Dutt

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Dec 8, 2017

ये ज़िंदगी के मेले-मेला १९४८

सन १९४८ की चर्चित फिल्म मेला से एक माइलस्टोन सोंग सुनते
हैं आज. ये रफ़ी के कैरियर के शुरुआत सालों का एक बड़ा हिट
गीत है.

दिलीप कुमार और नर्गिस अभिनीत मेला का निर्देशन एस यू सनी
ने किया था. उनके निर्देशन वाली ये दूसरी फिल्म थी. इसके पहले
उन्होंने सन १९४७ की फिल्म शांति का निर्देशन किया था. सनी के
निर्देशन वाली बाबुल भी चर्चित फिल्म है जो १९५० में आई थी. 




गीत के बोल:

ये ज़िंदगी के मेले
ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे
अफ़सोस हम न होंगे
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले

दुनिया है मौज-ए-दरिया  क़तरे की ज़िंदगी क्या
दुनिया है मौज-ए-दरिया  क़तरे की ज़िंदगी क्या
पानी में मिल के पानी  अंजाम ये के पानी
पानी में मिल के पानी  अंजाम ये के पानी
दम भर को सांस ले ले 
दम भर को सांस ले ले
ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे
अफ़सोस हम न होंगे
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले

होंगी यही बहारें  उल्फ़त की यादगारें
होंगी यही बहारें  उल्फ़त की यादगारें
बिगड़ेगी और बनेगी दुनिया यही रहेगी
बिगड़ेगी और बनेगी दुनिया यही रहेगी
होंगे यही झमेले 
होंगे यही झमेले
ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे
अफ़सोस हम न होंगे
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले

इक दिन पड़ेगा जाना  क्या वक़्त  क्या ज़माना
इक दिन पड़ेगा जाना  क्या वक़्त  क्या ज़माना
कोई न साथ देगा  सब कुछ यहीं रहेगा
कोई न साथ देगा  सब कुछ यहीं रहेगा
जायेंगे हम अकेले
जायेंगे हम अकेले
ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे
अफ़सोस हम न होंगे
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले
ये ज़िंदगी के मेले ये ज़िंदगी के मेले
………………………………………………..
Ye zindagi ke mele-Mela 1948

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Mar 6, 2017

जिन्दगी का सफ़र-सफ़र १९७०

१९७० की फिल्म सफर का कथानक बाकी फिल्मों से अलग है.
फिल्मों के कथानक अलग होने में फिल्म का अंत एक बड़ी
भूमिका निभाता है. अमूमन तीन तरीके के अंत हमें देखने को
मिलते हैं-सुखान्त, दुखांत और कन्फ्यूजांत. तीसरे किस्म के
अंत में दर्शक समझ नहीं पाता हँसे कि रोये इसलिए वर्गीकरण
इस प्रकार से किया गया है.

जीवन दर्शन पर इन्दीवर का ये गीत लोकप्रिय है और इस फिल्म
के सभी गीत हिट हुए थे मन्ना डे के गाये गीत को मिला कर.
फिल्म में संगीत कल्याणजी आनंदजी का है. 



गीत के बोल:

जिन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
जिन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

जिन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया
मौत से भी मोहब्बत निभायेंगे हम
रोते-रोते जमाने में आये मगर
हंसते हंसते जमाने से जायेंगे हम
जायेंगे पर किधर है किसे ये खबर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

ऐसे जीवन भी हैं जो जिए ही नहीं
जिनको जीने से पहले ही मौत आ गयी
फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं
जिनको खिलने से पहले खिजां खा गई
है परेशान नजर थक गए चारागर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

जिन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
..........................................................
Zindagi ka safar-Safar 1970

Artist: Rajesh Khanna, Sharmila Tagore

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Mar 4, 2017

जब दिल में नहीं है खोट-बैंक मैनेजर १९५९

एक फिलोसोफिकल गीत सुनते हैं फिल्म बैंक मैनेजर से. ये
बात सभी पर लागो है चाहे ओ आम आदमी हो या बैंक का
कोई कर्मचारी.

अनवर फर्रुखाबादी की रचना है और मदन मोहन का संगीत.
गीत में दो ही अंतरे हैं. तीसरा अन्तर शायद आपको फिल्म
वर्ज़न में सुनने को मिल जाए.



गीत के बोल:

जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता है
नादान यहाँ पे करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता है
नादान यहाँ पे करता है वो भरता है
हो ओ ओ जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता है

कहाँ चला है ठोकर खाने ये रस्ते हैं अनजाने
एक पाप छुपाने की खातिर सौ पाप ना कर दीवाने
एक पाप छुपाने की खातिर सौ पाप ना कर दीवाने
क्यूँ जीते जी तू मौत का सौदा करता है
नादान यहाँ पे करता है वो भरता है
हो ओ ओ ओ जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता है

तेरा मालिक है रखवाला तुझे तुझे मिल जायेगा उजाला
कहते हैं मिटाने वाले से बढ़ कर है बचाने वाला
कहते हैं मिटाने वाले से बढ़ कर है बचाने वाला
फिर मूरख अपने हाथों क्यूँ मरता है
नादान यहाँ पे करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता हैउझे

जब साफ़ तेरा दिल है किस बात की फिर मुश्किल है
भगवान है तेरी रक्षा को इन्साफ तेरी मंजिल है
भगवान है तेरी रक्षा को इन्साफ तेरी मंजिल है
इस राह में तू डर डर के कदम क्यूँ धरता है
नादान यहाँ पे करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता है
नादान यहाँ पे करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूँ डरता है
………………………………………………………….
Jab dil mein nahin hai khot-Bank Manager 1959

Artist: Pata nahin kaun

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Feb 17, 2017

जिन्दगी के सफ़र में-आप की कसम १९७४

आदमी ठीक से देख पाता नहीं और परदे पे मंज़र बदल जाता
है. ये बात आज भी प्रासंगिक है. मोबाइल कान में लगा कर
अर्ध-मूर्छित से सड़क पर चलते हुए लोगों पर तो एकदम सटीक
बैठती है ये बात.


आनंद बक्षी के जीवन के फलसफ़े पर लिखे हुए सबसे बेहतरीन
गीतों में से एक है फिल्म आप की कसम में जिसे किशोर कुमार
ने गाया है. राजेश खन्ना पर इसे फिल्माया गया है. गीत में नायक
के जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुज़र जाता है. गीत में रेलगाड़ी भी
दिखलाई देती है और कुछ वाचाल संगीत प्रेमी इसे रेलगाड़ी हिट
भी कहा करते हैं.



गीत के बोल:

जिन्दगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम
वो फिर नहीं आते वो फिर नहीं आते

फूल खिलते हैं लोग मिलते हैं मगर
पतझड में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग एक रोज जो बिछड़ जाते हैं
वो हजारों के आने से मिलते नहीं
उम्रभर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते वो फिर नहीं आते

आँख धोखा है क्या भरोसा है सुनो
दोस्तों शक दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने ना दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो रुठ कर उनको जाने ना दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हजारो सलाम
वो फिर नहीं आते वो फिर नहीं आते

सुबह आती है रात जाती है यूँ ही
वक्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और परदे पे मंजर बदल जाता है
एक बार चले जाते हैं जो दिन रात सुबह शाम
वो फिर नहीं आते वो फिर नहीं आते
……………………………………………………..
Zingagi ke safar mein-Aap ki kasam 1974

Artists: Rajesh Khanna

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Nov 14, 2016

गरीबों का पसीना बह रहा है-नया आदमी १९५६

आज सुनते हैं एक रिवोल्यूशनरी गीत फिल्म नया आदमी से.  इसे
लिखा है राजेंद्र कृष्ण ने. कहते हैं किसी गरीब की हाय नहीं लेना
चाहिए, ये बात जिन्हें जीवन के कड़वे अनुभव है उन्हें अच्छी तरह
से मालूम होगी.

किसी भी चीज़ को हल्का आंकना मानव की भूल है. एक कहावत
है घूरे के भी दिन फिरते हैं, एकदम सटीक बैठती है समय के साथ.
जो आज रजा है वो कल फ़कीर हो सकता है और जो गरीब है वो
अमीर बन सकता है. कुदरत के करिश्मों के बारे में कौन जानता है
भला. ये मनुष्य को अचंभित करते आये हैं और करते रहेंगे.

गीत के बोलों पर गौर करें तो आपको ये आज के समय में भी
प्रासंगिक लगेगा. इस गीत को बने ६० साल हो गयी हैं यानि कि
३ पीढ़ियों ने इस गीत को सुन लिया है.




गीत के बोल:

गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है
ये पानी बहते बहते कह रहा है
कभी वो दिन भी आएगा
ये पानी रंग लाएगा ये पानी रंग लाएगा
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है

ये बूँदें देख लेना एक दिन तूफ़ान लायेंगी
ज़मीन तो है ज़मीन ये आसमान को भी हिलाएंगी
गरीबों के घरों तक चल के हुड भगवान आएगा
ये पानी रंग लाएगा ये पानी रंग लाएगा
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है

सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी है
बदलते हैं सभी के दिन पुराणी ये कहानी है
ज़माना एक दिन गिरते हुओं को उठाएगा
ये पानी रंग लाएगा ये पानी रंग लाएगा
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है

अगर जल कर किसी मजबूर ने फ़रियाद कर डाली
तो कुदरत के खजाने देखना हो जायेंगे खाली
ज़मीन फट जायेगी
ज़मीन फट जायेगी सूरज का गोला टूट जायेगा
ये पानी रंग लाएगा ये पानी रंग लाएगा
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है
ये पानी बहते बहते कह रहा है
कभी वो दिन भी आएगा
ये पानी रंग लाएगा ये पानी रंग लाएगा
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है
गरीबों का पसीना बह रहा है
..................................................................
Gareebon ka paseena beh raha hai-Naya Aadmi 1956

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Oct 1, 2016

दुनिया एक कहानी रे भैया-अफसाना १९५१

सन १९५१ की फिल्म अफसाना से एक दर्शंनवादी गीत सुनते हैं जो
एक मेले में गाया जा रहा है. दुनिया के बारे में बतलाता ये गीत दो
हिस्सों में प्रकट होता है. गीत के अंत में बिछुडे हुओं को एक दूसरे
याद आ जाते हैं.

सरस्वती कुमार दीपक का लिखा हुआ गीत है जिसे रफ़ी ने गाया है.
आकर्षक धुन में बंधा ये गीत तैयार किया है हुस्नलाल भगतराम ने.
बी आर चोपड़ा की फिल्मों में आपको ऐसा एक आध गीत ज़रूर ही
मिलेगा, जीवन के किसी भी पहलू पर हो मगर मिलेगा ज़रूर. मेले
में इस गीत को कौन कलाकार गा रहा है उसे पहचानने में मेरी मदद
करें.



गीत के बोल:

दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
तूने कह दी मैंने कह दी दुनिया एक कहानी
इस दुनिया के मेले में कोई राजा कोई रानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी

इस मेले में हार जीत है और मेले का मेल
इस मेले में उड़न खटोले हाथी घोड़े रेल
कहीं हिंडोले कहीं तमाशे तरह तरह के खेल
इस मेले में पाना खोना जीवन बहता पानी रे भैया
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी

हरियल ले लो फरियल ले लो ले लो चन्दा तारा
आओ चुन्नू आओ मुन्नू
आओ चुन्नू आओ मुन्नू ले लो नया गुब्बारा
मुनिया रानी
मुनिया रानी हमें बता दो क्या है नाम तुम्हारा
कास कर डोर पकड़ना बिटिया मत करना नादानी
इस धागे में बंधी रहेगी तेरी प्रीत पुरानी रे भैया
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी

आई यहाँ कल कहाँ हमें ले जाएगी तकदीर
कौन कहे किसकी आँखों में कब भर आये नीर
एक बार जो खींची प्रीत की मिटती नहीं लकीर
एक बार जो खींची प्रीत की मिटती नहीं लकीर
भूल ना जाना भटक ना जाना माया आणि जानी रे भैया
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी

पार्ट २

दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
तूने कह दी मैंने कह दी दुनिया एक कहानी
इस दुनिया के मेले में कोई राजा कोई रानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी

दूर देश से पंछी आया
दूर देश से पंछी आया मिलता नहीं बसेरा
अभी तक उसकी आँखों में छाया हुआ अँधेरा
आंधी ने तिनके तिनकों को चारों ओर बखेरा
बनी हुई है एक अफसाना तेरी याद पुरानी रे भैया
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
दुनिया एक कहानी रे भैया दुनिया एक कहानी
...................................................................................
Duniya ek kahani re bhaiya-Afsana 1951

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Sep 29, 2016

वक़्त से दिन और रात-वक्त १९६५

वक्त की करामात ही तो है किसी ब्लॉग पर गुड और मक्खियों
का संगम मिलता है तो कहीं कुत्ता भी नहीं फटकता. वीरान पड़ी
बस्ती की पहचान ऐसे ही होती है.

वक्त अच्छे अच्छों को हिला देता है. राजा को रंक बनाता है तो
इसके उलट भी करिश्मे दिखला देता है. निवाला हाथ में ही रह
जाता है, मुंह तक नहीं पहुँच पाता ऐसी भी स्तिथि आ जाती है.

आज की जिंदगी की रफ़्तार काफी ज्यादा है और किसी के पास
वक्त के बारे में सोचने का समय नहीं है. वक्त जब हिलाता है
तभी दिमाग में हलचल होती है थोड़ी सी.

आइये सुनें साहिर की रचना रवि के संगीत निर्देशन में जिसे गाया
है मोहम्मद रफ़ी ने. फिल्म का शीर्षक गीत है और पार्श्व में बजता
है.

वक्त एक बहुसितारा फिल्म है जिसमें बलराज साहनी, शशि कपूर,
अचला सचदेव, सुनील दत्त, राजकुमार, साधना, शर्मिला टैगोर जैसे
कलाकार मौजूद हैं. फिल्म आज भी याद कि जाती है और क्लासिक
की सूची में शुमार है.



गीत के बोल:

कल जहाँ बसतीं थीं खुशियाँ
आज है मातम वहाँ
वक्त लाया था बहारें
वक्त लाया है खिज़ां

वक़्त से दिन और रात
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै ग़ुलाम
वक़्त का हर शै पे राज
वक़्त से दिन और रात
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै ग़ुलाम
वक़्त का हर शै पे राज

वक्त की गर्दिश से है
चाँद तारों का निजाम
वक्त की गर्दिश से है
चाँद तारों का निजाम
वक्त की ठोकर में है
क्या हुकूमत क्या समाज
वक्त की ठोकर में है
क्या हुकूमत क्या समाज

वक़्त से दिन और रात
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै ग़ुलाम
वक़्त का हर शै पे राज

वक़्त की पाबन्द हैं
आती जाती रौनके
वक़्त की पाबन्द हैं
आती जाती रौनके
वक़्त है फूलों की सेज
वक़्त है काँटों का ताज
वक़्त है काँटों का ताज

वक़्त से दिन और रात
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै ग़ुलाम
वक़्त का हर शै पे राज

आदमी को चाहिये
वक़्त से डर कर रहे
आदमी को चाहिये
वक़्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी
वक़्त का बदले मिजाज़
वक़्त का बदले मिजाज़

वक़्त से दिन और रात
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै ग़ुलाम
वक़्त का हर शै पे राज
……………………………………………..
Waqt se din aur raat-Waqt 1965

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Sep 16, 2016

नदियाँ चले चले रे धारा-सफ़र १९७०

७० के दशक के पूर्वार्ध में बनी फिल्मों में दार्शनिक, आशावादी
और प्रेरणादायी गीत शामिल किये जाते थे. हर फिल्म में तो
नहीं मगर हर तीसरी चौथी फिल्म में एक गीत ऐसा मिल जाता
था जिसमें कोई सन्देश होता था आम जनता के लिए.

फिल्म सफर में ये गीत नायक पर नहीं फिल्माया गया है. कहानी
के अनुसार गाने वाला नायक को गीत के माध्यम से एक सन्देश
दे रहा है. गौरतलब है जीवन के फलसफे पर नायक द्वारा भी
एक गीत गाया जाता है फिल्म में. इन्दीवर का लिखा गीत मन्ना डे
गा रहे हैं. संगीत कल्याणजी आनंदजी का है.



गीत के बोल:

नदिया चले चले रे धारा
चंदा चले चले रे तारा
तुझको चलना होगा
तुझको चलना होगा

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं हैं
आँधी से तूफां से डरता नहीं हैं
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंज़िल को तरसेगी तेरी निगाहें
तुझको चलना होगा
तुझको चलना होगा

पार हुआ वो रहा जो सफ़र में
जो भी रुका घिर गया वो भंवर में
नाव तो क्या बह जाये किनारा
बड़ी ही तेज समय की हैं धारा
तुझको चलना होगा
तुझको चलना होगा
……………………………………………….
Nadiya chale chale re dhara-Safar 1970

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Aug 5, 2016

चाँदी के चंद टुकड़ों के लिए-सट्टा बाजार १९५९

फिल्म सट्टा बाजार से एक उपदेशात्मक गीत सुनते हैं
आज. इसे गुलशन बावरा ने लिखा है. गीत लिखा गया
होगा १९५८ या १९५९ में. फिल्म रिलीज़ हुई  है १९५९
एँ. अगर उस साल ऐसी स्तिथि थी तो अब अनुमान
लगा लीजिए आज क्या हाल होगा. अपने मतलब के
लिए कोई भी किसी का गला घोंटने को तैयार खड़ा है.

हर आदमी को मुफ्त में धन चाहिए. दूसरे का धन और
माल कैसे मिल जाए यही फितरत है अधिकाँश जनता की.
चाहे वो आपके करीबी हों, मित्र हों, बाबागिरी की लाइन
के लोग हों या तथाकथित अवतार हों.

पैसे ऐंठने के लिए तरह तरह की स्कीम मिल जायेगी
आपको ज़माने में. कोई पुचकार के ऐंठता है, कोई मूर्ख
बना के तो कोई डरा धमका के ले लेता है.



गीत के बोल:

चाँदी के चंद टुकड़ों के लिए
ईमान को बेचा जाता है
ईमान को बेचा जाता है
मस्जिद मे ख़ुदा और मंदिर मे
भगवान को बेचा जाता है
भगवान को बेचा जाता है

यहाँ ऐसे भी कुछ कलियाँ हैं
जो ना बोले ना मुंह खोले
दौलत के तराज़ू मे इनको
खुद सेंकनेवाले ही तौलें
सय्यादों की इस बस्ती मे
अनजान को बेचा जाता है
अनजान को बेचा जाता है

चाँदी के चंद टुकड़ों के लिए
ईमान को बेचा जाता है
ईमान को बेचा जाता है

हर चीज़ का सौदा होता है
हर चीज़ यहाँ पे बिकती है
धनवान के आगे निर्धन क्या
अब सारी खुदाई झुकती है
बेबस इनसानों के हर इक
अरमान को बेचा जाता है
अरमान को बेचा जाता है

चाँदी के चंद टुकड़ों के लिए
ईमान को बेचा जाता है
ईमान को बेचा जाता है

ऐ मालिक तूने लिख़ी है
पत्थर की कलम से तक़दीरें
मजबूर मुसव्विर देख रहा
ये खून-ऐ-जिगर की तस्वीरें
इनसान के हाथों ही अब तो
इनसान को बेचा जाता है
इनसान को बेचा जाता है

चाँदी के चंद टुकड़ों के लिए
ईमान को बेचा जाता है
ईमान को बेचा जाता है
........................................................
Chandi ke chand tukdon ke liye-Satta Bazar 1959

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Jun 13, 2010

दूर है किनारा-सौदागर १९७३

१९७३ की फिल्म सौदागर फिल्म से संगीतकार रवीन्द्र जैन ने अपना हिंदी
फिल्मों का संगीतमय सफ़र शुरू किया था। सौदागर राजश्री प्रोडकशंस की
एक फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने मन्ना डे का एक गीत शामिल
किया जो एक मल्लाह पर फिल्माया गया था। एक गंभीर किस्म का गीत
आपको सुनाये बहुत दिन हो गए। आज इसका भी आनंद उठाइए।

नायक द्वारा धिक्कारे जाने के बाद नायिका दूसरा विवाह करती है और अपने
शौहर के साथ ससुराल जा रही है। कुछ पिछली यादें उसके जेहन में उठती
हैं। उन यादों के और भविष्य की आशंकाओं के बीच उलझी नायिका गीत के
प्रवाह के साथ साथ अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही है। ऐसे गीतों के लिए
मन्ना डे के सिवा दूसरा गायक मिलना शायद मुश्किल है।


गीत के बोल:

दूर है किनारा
दूर है किनारा
गहरी नदी की धारा
टूटी तेरी नैया, मांझी
खेते जाओ रे
रे नैया, खेते जाओ रे

दूर है किनारा, हो

आंधी कभी तूफ़ान कभी
कभी मझधार
ओ मांझी रे, हे हे मांझी रे
आंधी कभी तूफ़ान कभी
कभी मझधार
जीत है उसी की जिसने
मानी नहीं हार
माझी , खेते जाओ रे

दूर है किनारा

डूबते हुए को बहुत है
तिनके का सहारा
ओ माझी रे, हे हे माझी रे
डूबते हुए को बहुत है
तिनके का सहारा

मन जहाँ मान ले माझी
हे मन जहाँ मान ले माझी
वहीँ है किनारा
माझी, खेते जाओ रे

दूर है किनारा
गहरी नदी की धारा
टूटी तेरी नैया, फिर भी
खेते जाओ रे
ए ए नैया खेते जाओ रे
ओ माझी, खेते जाओ रे
....................................................
Door hai kinara-Saudagar 1973

Artist: Nuta, Amitabh Bachchan, Padma Khanna

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Mar 4, 2010

माटी कहे कुमार से-अधिकार १९५४

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात
कितना सही कहा है मनुष्य के बारे में। इसके आगे की
पंक्तियाँ कुछ यूँ हैं-

देखत ही छुप जाएगा , ज्यों सारा परभात

ये कबीर वचनामृत है। उन्ही का एक दोहा और है-

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे |
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोहे


इस दोहे पर आधारित कुछ फ़िल्मी गीत और गैर फ़िल्मी गीत
मुझे बेहद पसंद हैं। आपके लिए पेश है अविनाश व्यास का
संगीत के संवारा एक गीत फिल्म अधिकार से जो सन १९५४ की
फिल्म है। इस गीत में मुख्य स्वर है शंकर दासगुप्ता का। आदमी की
औकात बतलाता ये गीत मेले के सारे तमाशे भी दिखलाता चलता है।
सुन्दर गीत की रचना के लिए अविनाश व्यास को शत शत नमन।



गीत के बोल:

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे |
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोहे

हरिओम, हरिओम
हरिओम, हरिओम

माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना

हे, दो दिन के जग के मेले में
आज रहे कल जाना
कल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना

ए बाबूजी,बाबूजी,बाबूजी,बाबूजी,बाबूजी,बाबूजी,
ए बाबू टोपीवाला
ओ भैया पगड़ी वाला
ले लो ये मेरी कंठी माला रे
ले लो ये मेरी कंठी माला
ले लो ये मेरी कंठी माला रे
ले लो ये मेरी कंठी माला

मेरी माला में छिप जाए
सब गड़बड़ घोटाला
सेठ साहब को मिले सेठानी
और लल्ली को लाला

ओ बाबू टोपीवाला
ओ भैया पगड़ी वाला

हे, वही सुखी है जिसने प्यारे
फेरा मन का जाना
फेरा मन का जाना

माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना

मेरा पान बनारस वाला
हल्का कत्था चूना
जी, हल्का कत्था चूना
जिसने खा ली एक गिलौरी
छैला बन गया जूना
ए जी, छैला बन गया जूना
सौंफ सुपारी ख़ुशबू ठंडक
काला पीला चूना
मोगा, मंडवा, मकई, बनारस
बंगला देसी, पूना
लोगे कौन नमूना बाबू
लोगे कौन नमूना
ओये, लोगे कौन नमूना बाबू
लोगे कौन नमूना

हे हे हे हे हे हे हे हे
भांति भांति के लोग लगाते
डेरा नया पुराना
डेरा नया पुराना

माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना

हे, चले आओ,चले आओ चले आओ चले आओ
चके वाले चले आओ
रूपये वाले चले आओ
पैसे वाले चले आओ

मेरी प्यारी दुकान सबसे न्यारी दुकान
मेरी प्यारी दुकान सबसे न्यारी दुकान
देखो देखो नाच रहा है
ये अलबेला बन्दर
ये अलबेला बन्दर
जाने किसी का जीव समाया
कठपुतली के अन्दर
कठपुतली के अन्दर
नाचे राजा, ओ नाचे रानी
नाचे मस्त कलंदर

हे हे हे हे हे हे हे हे
नचा रहा है नचाने वाला
सबको नाच लुभावना
सबको नाच लुभावना

माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना

हे हे हे हे

माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
माटी में मिल जाना रे भाई
माटी में मिल जाना
.................................................................
Maati kahe kumhar se-Adhikar 1954

Artist: Unknown

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Feb 10, 2010

दाने दाने पे लिखा है-बारिश १९५७

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम-इस कहावत को दोहराता
ये गीत फिल्म बारिश में है जो सन १९५७ की फिल्म है। इस गीत को
लिखा है राजेंद्र कृष्ण ने और धुन बनाई है सी रामचंद्र ने। गीत स्वयं
सी रामचंद्र ने गाया है जो चितलकर के नाम से गया करते थे। परदे
पर होंठ हिला रहे हैं देव आनंद जिनको अधिकतर आपने किशोर के
गीतों पर होंठ खिलते और गर्दन हिलाते हुए देखा होगा। गीत के शुरू में
बजने वाला मोउथ ओरगन का टुकड़ा आपको 'आना मेरी जान सन्डे
के सन्डे" की याद दिलाएगा। पतंग कबूतर, नदी का किनारा, निरमा के
अंडरवेअर, बनियान सभी कुछ है इस गीत में।



गीत के बोल:

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

कोई कितना अमीर हो या कितना गरीब
खाए उतना ही जितना है उसका नसीब
कोई कितना अमीर हो या कितना गरीब
खाए उतना ही जितना है उसका नसीब
आगे मालिक के चलता नहीं कोई दाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

तेरी किस्मत की लिखी हुयी है किताब
तेरे एक एक दिन का है उसमे हिसाब
तेरी किस्मत की लिखी हुयी है किताब
तेरे एक एक दिन का है उसमे हिसाब
तेरे बस में ना सुबह है ना तेरी शाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

कभी गर्मी की मौज कभी बारिश का रंग
ऐसे चक्कर को देख सारी दुनिया है दांग
कभी गर्मी की मौज कभी बारिश का रंग
ऐसे चक्कर को देख सारी दुनिया है दांग
चाँद सूरज ज़मीन सब उसके गुलाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम
लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम

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Dec 23, 2009

जब तक मैंने समझा-भीगी पलकें १९८२

जीवन के थपेड़ों को सहते सहते कभी कभी यूँ लगता है जैसे ये गीत
हमारे लिए लिखा गया हो। फिल्म भीगी पलकें उन कुछ फिल्मों में
से एक है जो मुझे बहुत पसंद हैं। ये गीत सबसे ज्यादा पसंद है मुझे
इस फिल्म से। किशोर कुमार के गाये सर्वश्रेष्ठ दर्दीले गीतों में इसको
शामिल किया जा सकता है। एम् जी हशमत के बोलों को धुन दी है
जुगल किशोर-तिलक राज ने। इस फिल्म में स्मिता पाटिल और
राज बब्बर ने यादगार अभिनय किया है। ये गीत राज बब्बर पर ही
फिल्माया गया है। बैकग्राउंड में गीत बजता है और राज बब्बर अपने
जीवन के फ्लेशबैक में पहुँच जाते हैं।



गीत के बोल:

जब तक, मैंने समझा, जीवन क्या है
जीवन बीत गया
जीवन बीत गया

जब तक, मैंने समझा, जीवन क्या है
जीवन बीत गया
जीवन बीत गया

खुशियों के हर फूल से मैंने
गम का हार पिरोया
प्यार तमन्ना की थी जीवन की
प्यार को पा के खोया
अपनों से खुद तोड़ के नाता
अपनेपन को रोया
अपनेपन को रोया

जब तक मैंने समझा अपना क्या है
सपना टूट गया
सपना टूट गया

जब तक, मैंने समझा, जीवन क्या है
जीवन बीत गया
जीवन बीत गया

जीवन के किस मोड़ पे आ के
दूर हव वो दिल से
आंधी समय की उड़ा के ले गयी
मेरे नशेमन के तिनके

वादे करके प्यार वफ़ा के
बिछड़े साथी मिल के
बिछड़े साथी मिल के

जब तक मैंने समझा साथ क्या है
साथी छूट गया
साथी छूट गया

जब तक, मैंने समझा, जीवन क्या है
जीवन बीत गया
जीवन बीत गया

टूटे रिश्ते याद में उनकी
क्यों भीगी हैं पलकें
टूटे रिश्ते याद में उनकी
क्यों भीगी हैं पलकें
बिखरे बिखरे दिल के टुकड़े
उनकी खातिर तड़पें
प्यासी ऑंखें पी जाएँ आंसू
आँखों से ना ढलकें
आँखों से ना ढलकें

जब तक मैंने समझा आंसू क्या हैं
दामन भीग गया
दामन भीग गया

जब तक, मैंने समझा, जीवन क्या है
जीवन बीत गया
जीवन बीत गया
.......................................................
Jab tak maine samjha-Bheegi Palkein

Artists: Raj Babbar, Smita Patil

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Nov 27, 2009

दीवाना आदमी को बनाती हैं -काली टोपी लाल रुमाल १९५९

सबसे पहली इंसानी जरूरत है-दो वक्त की रोटी। दुनिया में सबसे ज्यादा
जद्दो-जेहद रोटी के लिए ही है।  इसपर भी एक गाना है हिन्दी फ़िल्म
संगीत के खजाने में।  ये एक दार्शनिक किस्म का गीत है और जीवन से
जुड़े हुए प्रमुख दृश्य इस गाने में समाहित हैं।  परदे पर इसको गुजरे
ज़माने के कलाकार गा रहे हैं। 

रोटियां क्या क्या नहीं करवा लेती मनुष्य से। कहते हैं इश्वर जीव के संसार
में आगमन के पूर्व ही उसके दाना पानी का इंतजाम कर देता है।  वो आएगी
किस जरिये से ये एक अबूझ पहेली होती है। कोई भूखा मरता है तो कोई
ज्यादा खा के।

मजरूह के लेखन पर जनता ने किताबें नहीं लिखी, प्रशंसा में हजारों पोस्ट
नहीं लिखे ब्लॉग पर। प्रसिद्धि भी शायद किस्मत का खेल है। मजरूह ने
जितना भी लिखा संतुलित लिखा। उनके लेखन में बेवजह की कड़वाहट या
जरूरत से ज्यादा दर्शनवाद कभी महसूस नहीं हुआ। जरा गौर कीजिये
इसके आखिरी अंतरे पर: इंसान को चाँद में नज़र आती हैं रोटियां...




<span style="font-weight: bold;">गाने के बोल:</span>

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
ख़ुद नाचती हैं सबको नचाती हैं रोटियाँ

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां

बूढा चलाये खेल तो पापों से झूल के
बच्चा उठाये बोझ खिलौने को भूल के
बच्चा उठाये बोझ खिलौने को भूल के

देखा न जाए जो
देखा न जाए जो वो दिखाती हैं रोटियां
दिखाती हैं रोटियां

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां

बैठी है जो ये चेहरे पर मलके जिगर का खून
दुनिया बुरा कहे इन्हे पर मैं तो ये कहूं

कोठे पे बैठ ओ,
कोठे पे बैठ आंख लड़ती हैं रोटियां

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां

कहत अता एक फ़कीर के रखना ज़रा नज़र
रोटी को आदमी ही नहीं खाते बेखबर

अक्सर को आदमी को
अक्सर को आदमी को भी खाती हैं रोटियां
खाती हैं रोटियां

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां

तुझको पते की बात बताऊँ मैं जानेमन
क्यूँ चाँद पे पहुँचने की है लगन

इंसान को चाँद में
इंसान को चाँद में नज़र आती हैं रोटियां

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां

ख़ुद नाचती हैं सबको नचाती हैं रोटियाँ

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां
......................................
Deewana aaadmi ko banati hain-Kali Topi Laal Rumal 1959

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Nov 14, 2009

सजन रे झूठ मत बोलो -तीसरी कसम १९६६

जादू वो जो सर चढ़ कर बोले। ये गीत अलौकिक गीतों में से एक है।
शैलेन्द्र ने सरल सुलभ भाषा में ज़िन्दगी का फलसफा कह डाला है।
इसकी धुन इससे बढ़िया शायद नहीं बनाई जा सकती थी। गति,
गायकी, संगीत  सब नियंत्रित है। इस गीत को आप तीसरी कसम का
सर्वश्रेष्ठ गीत कह सकते हैं। जरूरी नहीं की दुखद गीत ही सबसे बढ़िया
गीत हो किसी कथानक में। ऐसे गीतों के लिए किसी नामचीन कलाकार
की जरूरत नहीं है परदे पर। किसी पर भी फिल्माया गया हो, ऐसे गीत
अमर हो जाते हैं। मुकेश की आवाज़ में दर्द का स्थायी भाव था इसलिए
उनके गाये हुए रोमांटिक गीतों के अलावा सभी गीतों में आपको गंभीरता
का एहसास होता है।

यूँ कहिये अगर इस गीत को किसी शास्त्रीय संगीत के जानकर गायक
द्वारा गवाया जाता तो वो इसमे छैना मुरकी तो डाल देता मगर इसकी
आत्मा का कचूमर निकाल देता । भले ही राज कपूर के बहाने ये गीत
मुकेश से गवा लिया गया हो मगर कल्पना कीजिये इस गीत को किसी
और आवाज़ में, संभव नहीं है ।


गाने के बोल:

सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है
न हाथी है न घोड़ा है
वहां पैदल ही जाना है

सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है
न हाथी है न घोड़ा है
वहां पैदल ही जाना है

सजन रे झूठ मत बोलो

तुम्हारे महल चौबारे
यहीं रह जायेंगे सारे

तुम्हारे महल चौबारे
यहीं रह जायेंगे सारे

अकड़ किस बात की प्यारे
अकड़ किस बात की प्यारे
ये सर फिर भी झुकाना है


सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है

भला कीजे भला होगा
बुरा कीजे बुरा होगा

भला कीजे भला होगा
बुरा कीजे बुरा होगा

वही लिख लिख के क्या होगा
वही लिख लिख के क्या होगा

यहीं सब कुछ चुकाना है

सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है

लड़कपन खेल में खोया
जवानी नींद भर सोया

लड़कपन खेल में खोया
जवानी नींद भर सोया

बुढापा देख कर रोया
बुढापा देख कर रोया

वही किस्सा पुराना है

सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है
न हाथी है न घोड़ा है
वहां पैदल ही जाना है

सजन रे झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है
...........................................................................
Sajan re jhooth mat bolo-Teesri kasam 1966

Artists-Raj Kapoor, Waheeda Rehman

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